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February 25, 2024
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हटा,अन्त‍र्राष्ट्रीाय महिला दिवस पर‍ विशेष जिन्दगी के हर किरदार में कामयाबी के रंग भरती दीपाली

अन्त‍र्राष्ट्रीाय महिला दिवस पर‍ विशेष
जिन्दनगी के हर किरदार में कामयाबी के रंग भरती दीपाली
बुंदेलखण्डी की उपकाशी, रत्न्गर्भा हटा नगरी ने एक नहीं अनेक प्रतिभाओं को उभारा है, इनमें से एक नाम है दीपाली जो चूल्हा न चौका, बेटी, बहू, मां, बहिन सारे नाते रिस्तेउ को अपनाते हुए, मन में उंची उडान का सपना लेकर कुरीतियों की दहलीज को लांघती हुई, ऐसी उडान भरी कि आज समूचे भारत में हटा नगर उपकाशी का नाम रोशन कर रही है, प्रतिभा भी ऐसी निखरी जिसे एक नहीं कई पुरूस्काोरों से सम्माानित भी किया गया ।नगर के वरिष्ठ अधिवक्ता विनोद श्रीवास्त्व एवं सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती माधुरी श्रीवास्ततव की जयेष्ठ पुत्री दीपाली की प्राथमिक से लेकर हायर सेकेन्डतरी तक की पढाई हटा नगर में सम्पमन्नठ हुई, मध्यप्रदेश के छोटे से कस्बे हटा से ताल्‍लुक रखने वाली दीपाली का शुरू से ही कला और संस्कृति से खास लगाव रहा। छोटी जगह में रहने के बावजूद उन्होंने ख्वाब हमेशा बड़े बुने और इसके लिए उनका हौंसला बने उनके वकील पिता। दीपाली ने फिजिक्स में एमएससी और एमसीए करने के बाद कुछ समय एनआईटी में बतौर कम्प्यूटर इंजीनियर काम किया। फिर शादी के बाद बच्चों की परवरिश के लिए नौकरी छोड़ने का फैसला लिया। जिंदगी में कुछ अलग और क्रिएटिव करने की चाह रखने वाली दीपाली जी ने घर और परिवार की जिम्मेदारी के लिए अपनी नौकरी छोड़ एक गृहणी के रूप में जीवन बिताने का निर्णय तो ले लिया, लेकिन कला और संस्कृति का शौक अब भी उनके जेहन में जिंदा था। लिहाजा कुछ नया करने की चाहत और रंगों से प्रेम ने उन्हें कथकली मेकअप आर्टिस्ट के तौर पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।


रंगों ने उसकी ज़िंदगी को कुछ इस तरह रंगा कि उसे सारी दुनिया रंगीन नज़र आने लगी और फिर वो दुनिया को रंगती चली गई। जिसने भी उसके रंग देखे, वो दंग रह गया। रंगों की इस यात्रा ने कामयाबी के नए-नए आयाम भी देखे लेकिन अपने हुनर से एक विलुप्त होती कला को जीवंत बनाए रखने का उसका फितूर आज भी उसी शिद्दत से जारी है।
दीपाली सिन्हा ने अपने पैशन को प्रोफेसन बनाने का जब फैसला लिया, उस वक्त उनकी उम्र 40 साल थी। उम्र के इस पड़ाव पर लीक से हटकर अपने कैरियर के साथ इतना जोखिम लेने का जज्बा कम ही देखने को मिलता है।
रंगों की समझ और कला से लगाव व अपनी मेहनत और लगन के बूते दीपाली ने उत्तर भारत की पहली कथकली मेकअप आर्टिस्ट (‘चुट्टीकारन’) होने का गौरव हासिल किया। साइंस की पढाई के बाद कला के क्षेत्र में जाना एक चुनौती था, इससे भी दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने ऐसे समय में इसे सीखना शुरु किया, जिस उम्र में लोग अपने कामकाज और तमाम जिम्मेदारी से फ्री होकर आराम की जिंदगी जीने की चाहत रखते हैं। कथकली मेकअप के क्षेत्र दीपाली ने अपना नाम उत्त र भारत में रोशन किया। इसके लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित भी किया गया है लेकिन शून्य में अपने अस्तित्व को स्थापित करने का उनका ये सफर कभी इतना आसान भी नहीं रहा। कहते हैं महिलाओं की जिंदगी उस कच्ची मिट्टी की तरह होती है जो अलग-अलग सांचों में ढलकर अपने अलग-अलग रूप बदलती है। अपनी पहचान के लिए जिंदगी भर जद्दोजहद करनी पड़ती है।
दीपाली ने दक्षिण भारतीय अंदाज में मेकअप सीखने का फैसला लिया और साल 2011 में दिल्ली स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर कथकली ज्वाइन किया। दीपाली ने दो साल तक मेकअप आर्टिस्ट का काम सीखा।
दुनियाभर में मशहूर केरल का कथकली नृत्य 300 साल पुराना है। कथकली में कलाकार के आंखों के हाव-भाव जितनी अहम भूमिका निभाते हैं, उतना ही अहम रोल मेकअप का भी होता है। इसके लिए ख़ास मेकअप आर्टिस्ट होते हैं, जिन्हें ‘चुट्टीकारन’ कहा जाता है। इस कला में मेकअप चेहरे और चरित्र को बदलने में अपना जादुई असर डालता है। मेकअप आर्टिस्ट दीपाली सिन्हा बताती हैं कि कथकली मेकअप करना एक खास किस्म का हुनर है। मेकअप में वो जादू है, जो चरित्र के हिसाब से कलाकार का पूरा व्यक्तित्व बदल सकता है। नृत्य के हर एक किरदार को तैयार करने में 3 से 4 घंटे का समय लगता है। दीपाली कथकली मेकअप के लिए रंग भी खुद ही अपने घर में बनाती हैं।
उन्हें इंटरनेशनल सेंटर फॉर कथकली की ओर से सर्वश्रेष्ठ आर्टिस्ट के सम्मान से नवाजा गया गया। इसके पहले 2015 में उन्हें उत्तर भारत की सर्वश्रेष्ठ चुट्टी आर्टिस्ट का खिताब मिला। इंजीनियरिंग छोड़ अपने हुनर से कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में नाम कमाने वाली दीपाली को ब्रजभूमि फाउंडेशन द्वारा देश की सबसे प्रभावशील 51 महिलाओं में चुना गया है।

विलुप्त होती कला को बचाने की कवायद
दीपाली इस अनोखी और विलुप्त होती कला को जीवंत बनाने के लिए जी-जान से जुटी हुई हैं और अन्य लोगों को भी इससे जोड़ रही हैं। इस कला को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए दीपाली अलग-अलग राज्यों में इसका आयोजन भी करती हैं। उत्तर भारत में इस कला को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने कुछ साल पहले ‘शुभदीप’ नाम से एक स्कॉलरशिप भी शुरू की है। दीपाली की कुछ अलग और नया सीखने की ललक अब भी खत्म नहीं हुई है। उम्र के इस पड़ाव में भी वो बेहद मुश्किल समझी जाने वाली कथकली नृत्य विधा सीखने के साथ ही परफॉर्म भी कर रही हैं।

पर्यावरण की पुरोधा
कला और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय रहने वाली दीपाली प्रकृति से भी खासा लगाव रखती हैं। पिछले कई सालों से उन्होंने पर्यावरण को बचाने और लोगों को जागरुक करने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए उन्होंने वाकायदा एक संस्था वेस्ट मैनेजमैंट रीसायक्लिंग सोसाइटी (डब्लूमार्स) बनाई है, जिसका मकसद देश में प्लास्टिक वेस्ट के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना और उससे निजात पाने के तरीकों को लोगों तक पहुंचाना है। डब्लूमार्स सरकार की प्लास्टिक की पाबंदी पर सख्ती से लिए गए निर्णय का साथ देने के लिए प्रतिबद्ध है।
सामाजिक क्षेत्र में सराहनीय काम और व्यापी ‘कचरा प्रबंधन’ के कार्य के लिए दीपाली सिन्हा को कालिन्दी अवार्ड से सम्मानित भी किया गया है।
डब्लूमार्स संस्था देश में काफी समय से प्लास्टिक प्रबंधन पर कार्य कर रही है। इसके लिए संस्था समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम, युवाओं के लिए स्पर्धायें, स्कूलों में वर्कशापस आदि करवाती रहती है। गांधी जयंती के मौके पर डब्लूमार्स की तरफ से मध्यप्रदेश के 10 स्कूल में एक साथ अवेयरनेस कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस दौरान बच्चों का बच्चों का मनोबल बढाने के लिए ईनाम के रूप में सर्टिफ़िकेट और कपड़े के बैग बांटे गए। डब्लूममार्स देश के पांच राज्यों में काम कर भारत को प्ला स्टिक मुक्त बनाने की मुहिम में अपना कीमती योगदान दे रहा है।
वो समय के साथ धुंधली पड़ती कथकली की चमक को लोगों के बीच ले जाकर फिर से बिखेरने का प्रयास कर रही हैं, डब्लूमार्स संस्था के जरिए प्रदूषण के खिलाफ जंग छेड़ रही हैं वहीं ‘नारी शक्ति को प्रणाम’ संस्था की मध्यप्रदेश अध्यक्ष के तौर पर समाज की गुमनाम मगर असल नायिकाओं को सामने लाकर पहचान और सम्मान दिलाने के साथ ही उनका हौंसला अफजाई कर रही हैं।
दीपाली वर्तमान में देश की राजधानी दिल्लीं के इंदिरापुरम में अपना मुकाम बनायें हुए है, लेकिन सोशल साइड पर अपनी जन्मरभूमि हटा दमोह को उल्लेुख करना नहीं भूलती है, बुंदेली भाषा में बात करना उन्हेा अच्छाी लगता है, बुंदेली संस्कृलति परम्पररा को सदैव लेकर चलने की बात उन्होीने कही,

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