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October 16, 2021
ADITI NEWS
धर्म

दमोह (हटा) चिता के आगे केवल चरित्र जाता है-आर्यिका रत्‍न श्री गुणमति माता जी,नन्‍हे बालक ने कंठस्‍थ सुनाया तत्‍वार्थ सूत्र मोक्ष शास्‍त्र

दमोह (हटा)आज उत्‍तम संयम पर्व है, भारतीय संस्‍कृति में संयम ही हमारे जीवन का आधार है, संयम वह नौका है जो हमारे जीवन का पार लगा देती है, संयम वह कवच है जो घातक बाणों को भी शरीर में प्रवेश नहीं होने देता, संयम धर्म को आत्‍मसात करके जीवन को निखारा व संवारा जा सकता है, यह बात आज श्री पार्श्‍वनाथ दिगम्‍बर जैन बडा मंदिर में दशलक्षण धर्म पर्व पर उत्‍तम संयम धर्म पर अपने मंगल प्रवचन देते हुए आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज की शिष्‍या आर्यिका रत्‍न श्री गुणमति माता जी ने कही उन्‍होने कहा कि दिन प्रतिदिन जीवन की ज्‍योत कम होती जा रही है, शरीर शिथिल हो रहा है, शरीर के गमन का समय आता जा रहा है, आने वाली मौत को मंगलमय बनाने के लिए जीवन में छोटे छोटे संयम धर्म को ग्रहण करे, जिनकी मृत्‍यु महान होती है उनका जीवन भी महान होता है, मृत्‍यु कभी अशुभ नहीं होती बशर्ते जीवन में नेक धर्म कार्य किये हो, जीवन की शाम होने के पहले जरूर है कि संयम का एक दीप प्रज्‍जवलित किया जाये ताकि आने वाले अंधेरे से बचा जा सके, कभी अपनी घर की छत पर जाकर सूर्यास्‍त का वह दृश्‍य देखना कि अस्‍त के समय सूर्य कितनी तेजी से आगे बढता है उसे कोई पकडना भी चाहे तो पकड नहीं सकता यह हाल जीवन का है, सूर्य का अस्‍त होना अंधो की रैली नहीं आंखो वालो की यात्रा है, जो हमारी जिन्‍दगी में कुछ संकेत देती है,
आर्यिका श्री ने कहा कि जो सांस हम धर्म के लिए, संयम के लिए पुण्‍य कार्य के संपादित के निमित, मोक्ष के निमित लेते है वहीं सांसे सार्थक है, कुछ लोग तो अपनी सांसे पाप, व्‍यसन में खर्च व्‍यर्थ कर रहे है, याद रखना पाप की कमाई यही पडी रह जाती है, सारा धन तिजोरी में ही रह जाता है, मृत्‍यु पर पत्‍नी दहलीज तक छोडने जाती है, परिजन श्‍मशान तक और शरीर चिता तक ही साथ जाता है चिता के आगे यदि कुछ जाता है तो वह उसका चरित्र ही होता है, धर्म कर्म के लिए कल का इंतजार नहीं करना चाहिए, अभी से ही अपने जीवन में छोटे छोटे संयम धर्म को ग्रहण करना प्रारंभ कर दो ताकि आपका जीवन और मृत्‍यु दोनों सार्थक हो सके,
दशलक्षण पर्व पर नगर के चारों जैन मंदिर में उत्‍सव का महौल है, आज मुख्‍य आयोजन में १० वर्षीय कक्षा ५ का छात्र आदित्‍य के द्वारा कंठस्‍थ संस्‍कृत में तत्‍वार्थ सूत्र का वाचन किया गया, श्रावक श्रेष्‍ठी बनने का सौभाग्‍य शिखरचंद आशीष जैन पटवारी परिवार को मिला, श्रावक श्रेष्‍ठी का सम्‍मान सकल जैन समाज के द्वारा किया गया एवं बालक आदित्‍य उनके पिता आलोक, रजनी व दादी पार्षद सुधा परिजनों का सम्‍मान दीपक, कविता, शशि दादी, वीरेन्‍द्र वकील, मीना, पारूल, रिधान, प्रांजल, प्रीति, आराधना, कल्‍पना, प्रियंका के द्वारा किया गया,

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