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July 21, 2024
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कुंडलपुर,इच्छा के निरोध का नाम तप कहा है,आचार्य श्री समयसागर जी महाराज

इच्छा के निरोध का नाम तप कहा है,आचार्य श्री समयसागर जी महाराज

कुंडलपुर दमोह। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा शारीरिक मानसिक और आत्मिक यह तीन प्रकार की शांति है ।भूख लगती है प्यास लगती है तो उस क्षुधा पिपासा के शमन के लिए जलपान किया जाता है भोजन आदि किए जाते हैं। उसके माध्यम से कुछ क्षण के लिए शारीरिक जो भूख है वह मिट जाती है तृषा मिट जाती है। किंतु उसके बाद पुनः भूख लगती है इसके उपरांत भरपेट भोजन कर लिया मन के अनुरूप ही स्वादिष्ट भोजन किया इसके बाद भी इच्छा का निरोध नहीं हो पाता। किसी ने कहा महाराज भोजन कर लिया उसके बाद हम 2 घंटे के लिए भोजन का त्याग करते हैं तो यह तप के अंतर्गत आता है कि नहीं ।भरपेट भोजन कर लिया लगभग तीन-चार घंटे लगेंगे डाइजेस्ट होने में उसके पहले एक आध घंटे नहीं लिया तो वह तप के अंतर्गत आएगा ।तो ग्रहस्थ के तप में श्रमण के तप में अंतर क्या है ।दूसरी बात यह है भरपेट भोजन करने के उपरांत अब इच्छा तो है नहीं जब इच्छा नहीं तो इच्छा के निरोध का नाम तप कहा है ।तो निरोध किसका किया ना प्यास लग रही है ना भूख लग रही भोजन करने को बैठ गए भोजन कर लिया अंधों की टोपी चिंता बनी हुई है ।इच्छा का निरोध नहीं कर पा रहा है मानसिक इच्छा है। मन की भूख अभी भी लगी हुई है और उसके लिए वह प्रयत्न करता रहता है इसलिए तप उसको बोलते इच्छा का निरोध किया जाता जिसमें ।कई प्रकार की इच्छाएं होती हैं उनका निरोध ही किया जाता है मोक्ष की इच्छा का भी निरोध कर ले महाराज सब तैयार हो जाएंगे। हमें मोक्ष की क्या आवश्यकता क्योंकि इच्छा का निरोध तप का है। ऐसा नहीं किंतु जिन वस्तुओं के माध्यम से पाप कर्म का अर्जन होता है उसका निरोध होता है उसके संवर के लिए और पाप कर्म की निर्जरा के लिए तप किया जाता है ।वह वहिरंग तप 6 प्रकार का है अनशन अर्थात चारों प्रकार के आहार का त्याग होता है उनोदर का अर्थ भूख से कम लेना भरपेट नहीं लेना इसे उनोदर बोलते इसमें भी बहुत सारे भेद होते चले जाते। रसपरित्याग भी होता षटरस पकवान बनाकर के आप लेते तो उनोदर भी अच्छा लगता क्योंकि सरस भोजन है और नीरस भोजन है तो वह सोचता उपवास करना ही ठीक है। क्योंकि नीरस लिया नहीं जाता यह सब तप है तो अर्थ है गुरुदेव ने भी कहा था अनशन से भी महत्वपूर्ण उनोदर तप है। क्योंकि उपवास करके एकांत में बैठकर के आप स्वाध्याय में लगा सकते हैं जाप अनुष्ठान में लगा सकते हैं भगवान की स्तुति पाठ में उपयोग लगाया जा सकता है। वहां पर तो थाली देखने में नहीं आ रही है इसलिए अनशन तप आसानी से हो सकता है ।उसमें भी कठिनाई है प्रारंभ अवस्था से फिर भी उनोदर की अपेक्षा से तप सरल माना जाता है किंतु जब आप रसोई घर में पहुंच जाते हैं और थाली पर बैठ जाते हैं थाली पर बैठते ही भूख की उदीरणा होती ऐसा कहने में आता अर्थ यह है वहां पर भोजन सामग्री को देखते ही उदीरणा हो जाती है खाने की इच्छा जागृत होती उसको रोकना यह तप माना जाता ।अच्छी भूख लगी है मनचाही वस्तु वहां परोस दी गई है फिर भी मुझे एक ही ग्रास लेना है इस प्रकार संकल्प लेकर वह श्रमण आहार के लिए निकलते हैं इसको अनशन तप से भी महत्वपूर्ण माना। यह कठिन तप माना जाता और रस परित्याग इससे भी कठिन तप ।गुरुदेव का कहना था चौके में जाने के बाद थाली दिखाते हैं तो उस समय रस परित्याग करना। इसलिए कहा वहां कोई चीज दिखाई नहीं दे रही उसी का त्याग कर लेते रसगुल्ला नहीं है और कोई पकवान नहीं है तो उसका मैं आज त्याग कर लेता हूं यह रसपरित्याग नहीं माना जाता अच्छे-अच्छे व्यंजन देखकर उसी का त्याग करना चाहिए।

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