: सिर्फ कैलेंडर के बदलने से नहीं बदलेंगे हालात (आलेख : बादल सरोज)
Thu, Jan 2, 2025
सिर्फ कैलेंडर के बदलने से नहीं बदलेंगे हालात
(आलेख : बादल सरोज)
नववर्ष की शुभकामनायें, और जैसा कि कहे जाने का रिवाज़ है उसके साथ कि, यह नया साल – 2025 – आपके लिए पिछले सभी वर्षों की अपेक्षा बेहतर हो, आप और आपके परिजन स्वस्थ और सानंद रहें और उत्तरोत्तर प्रगति करें। सभी शंकाएं, कुशंकाएं, आशंकाएं दूर रहें ; यकीन संभावनाओं में बदलें, उम्मीदें असलियत बनें और वह दुनिया, जिसमे रहना अभिशाप-सा लगता है, एक अच्छी दुनिया बने। इसी के साथ यह भी कि सामाजिक रूप से उपयोगी बनें रहें, आदमी/औरत से इंसान बनने की ओर अग्रसर होते रहें!! भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘कुछ लिखकर सो, कुछ पढ़कर सो, जिस जगह सवेरे जागा तू, उससे कुछ आगे बढ़कर सो’ के अंदाज में हर दिन जीते रहें । जाती हुई बरस धूल, गुबार के बादल, मलबे के पहाड़ और गज़ा से लेकर सीरिया होते हुए उधर यूक्रेन तक चीखों के कोहराम और इधर बाराबंकी से अजमेर होते हुए संभल और लोकतंत्र से संविधान की तरफ बढ़ती लपटों की तपिश और गड़े मुर्दों के उखाड़े जाने से उड़ती गर्द छोड़कर गयी है। ट्रम्प जैसे अशुभ अमंगलकारियों के सर पर ताज रख कर गयी है। पिछली 9-10 हजार वर्षों में काफी हद तक सजी, संवरी, सुसंस्कृत और मानवीय बनी सभ्यता पिछली सदी की एक दहाई के फासीवादी अपवाद को छोड़कर कभी इतनी मुश्किल में नहीं रही जितनी 21वीं सदी की इस दूसरी दहाई में, उसमें भी विशेष तौर से पिछले बरस में हुई है। हालात दक्षिण एशिया के मकबूल शायर अहमद फ़राज़ के कहे “न शब ओ रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है/ किस बरहमन ने कहा था कि ये साल अच्छा है” की जिज्ञासा से काफी आगे बढ़कर क़तील शिफ़ाई के शेर “जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है/ उस को दफ़नाओ मिरे हाथ की रेखाओं में” की झुंझलाहट तक आ गयी लगती है। तरक्कियां ही धुंधलके में नहीं आई हैं, पिछाहटें भी सुर्खरू होती दिखने लगी है। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी के भस्मासुरी अवतार तक पहुंच चुके साम्राज्यवाद के श्वदंत – कैनाइन टीथ – न सिर्फ और नुकीले और पैने हुए हैं, बल्कि नख से शिख तक बड़े-बड़े नाखून भी उग आये हैं। इतिहास गवाह है कि साम्राज्यवाद अपनी जीवनी शक्ति बढाने के लिए समाज में युद्धों, गृहयुद्धों के अलावा नस्लवाद, रंगभेदवाद, इधर मनुवाद, तो उधर कबीला और क्षेत्रवाद की खरपतवार रोपता है, उसे खाद-पानी देता है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि जिन यहूदियों को नाजी दुष्ट अडोल्फ़ हिटलर ने अकल्पनीय नृशंसता का शिकार बनाकर दुनिया और उसकी इंसानियत को दहला दिया था, आज उन्हीं यहूदियों के नाम पर साम्राज्यवादी अमरीका और उसके लगुओं-भगुओं की गोद में बैठकर यहूदीवाद – ज़िओनिज्म – दुनिया के लिए खतरा बनकर उभर रहा है। दहशत और बर्बरता का वैश्वीकरण किया जा रहा है। ज्ञान और विकासोन्मुखी चेतना के प्रकाश स्तम्भ – लाइट हाउस – गिराए जा रहे हैं। बांग्ला कविता के जनक माने जाने वाले चंडीदास ने जिसे “साबार ऊपर मानुष सत्य, ताबार ऊपर नाही” कहकर जिस मनुष्य को सबसे बड़ा सत्य बताया था और उसके ऊपर कुछ भी नहीं है, तक कहा था, आज वही मनुष्य विपदा में है। उत्तर, दक्षिण में बंटी मानी जाने वाली दुनिया में आठों दिशाओं की इंसानियत जिन्दा रहने की फ़िक्र में जकड़ी हुई ‘ये जीना भी कोई जीना है’ के व्यामोह में फँसी है। जिन्दगी मुहाल हुई पड़ी है और जिस पूंजीवाद को निर्विकल्प और अब तो यही चलेगा वाली व्यवस्था करार दिया जाता है, उसके बाजे बजे हुए हैं। सदियों तक कभी सीधे, तो कभी टेढ़े पूरे विश्व की लूट करके, अमीर बने कथित विकसित देशों की आबादी का कहीं तिहाई, कहीं चौथाई हिस्सा कराह रहा है। जब रोशनियों के नीचे इतना अंधेरा है, तो पहले से ही मोमबत्तियों और लालटेनों और जुगनुओं पर गुजर करने वाले देशों में घटाटोप कितना घुप्प होगा, समझा जा सकता है। दुःख और वंचनाओं के भूमंडलीकरण की मुख्य वजह मुनाफे की हवस है और अब तो इसने पृथ्वी के अस्तित्व तक को खतरे में डाल दिया है। इधर, मजदूर वर्ग से सारे हक़ अधिकार छीन उसे 1886 से पहले की दशा में पहुंचाने की साजिशें रची जा रही हैं। किसानों और उनके गाँवों की हालत जिस दिशा में धकेली जा रही है, वह वारेन हेस्टिंग्स की इंग्लैंड की संसद को दी उस रिपोर्ट की याद दिलाती है, जो वर्ष 1770 के बंगाल, बिहार, ओडिसा के अकाल में 1 करोड़ लोगों के मारे जाने के बाद उसने भेजी, तो उसमें लिखा था कि “एक तिहाई जमीन जंगल बन गयी है, जहां जंगली जानवर रहने लगे हैं।“ इसके बाद भी मालगुजारी पिछले वर्षों की तुलना में अधिक वसूल की गयी थी। कारिंदों की लूट इसके अलावा थी। यह वही दौर था, जिसमें यूरोप और आस्ट्रेलिया के लिए नील पैदा करने के नाम पर किसान और खेती दोनों को और बर्बाद किया गया था।खेती का वही कम्पनीकरण अब कार्पोरेटीकरण का नाम धरकर आ गया है। इस पर प्रमुदित और बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला बने मध्यमवर्ग की हालत ‘हलुआ मिला न माड़े, दोऊ दीन से गए पांड़े’ जैसी होती जा रही है। अच्छे दिन आने के मंत्रोच्चार में गाफिल हुआ यह पढ़ा-लिखा हिस्सा फैज़ लुधियानवी का साहब का शेर “तू नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई/ वर्ना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई” दोहराते-दोहराते बेजार हो गया है, इतना थक हार गया है कि हैडलेस चिकन बना हुआ है, कुछ सूझे नहीं सूझ रहा। इस वर्ष 1 जनवरी से शुरू होने वाली नई साल में भारत के संविधान के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। आजादी भले 15 अगस्त 1947 को मिल गयी थी, मगर स्वतंत्रता को यथार्थ में उतारने के नक़्शे ने 26 जनवरी 1950 को ही सूरज की पहली किरण देखी थी। अपनी अनेक सीमाओं और सुधार की कई गुंजाइशों के बावजूद धरती के इस हिस्से के अनगिनत ग्रंथों में यही एकमात्र किताब है, जिसने सबको एक किया, थोड़ा-बहुत नेक किया और आज तक किये हुए है। नए साल की आमद से पहले ही इस संविधान के द्वारा दिए गए लोकतंत्र का चीरहरण किया जा रहा है, इसमें लिखे मानवाधिकारों और मूलभूत अधिकारों का अपहरण किया जा रहा है। समता, समानता और धर्मनिरपेक्षता की धज्जियां पहले ही उडाई जा चुकी हैं। इरादा संविधान में लिखे शब्दों को अक्षर-अक्षर चींथकर उनकी जगह मनुस्मृति की कालिख पोतने का है। मगर ऐसा और ऊपर लिखे सब कुछ जैसा करने के लिए सत्ता और सामर्थ्य के गुरूर में चूर इधर और उधर के हुक्मरान जानते हैं कि मनुष्य से ज्यादा शक्तिशाली और कोई नहीं होता ; उसके लिए जीवन के मायने जनकवि मुकुट बिहारी सरोज के मुक्तक “जिंदगी केवल न जीने का बहाना/ जिंदगी केवल न साँसों का खजाना/ जिंदगी सिन्दूर है पूरब दिशा का/ जिदगी का काम है सूरज उगाना।“ की तरह होते हैं। देश-दुनिया में हो रहे आंदोलन और संघर्ष इसके गवाह हैं। ये संघर्ष अब रूपये-पैसे की लड़ाई से आगे बढ़ते हुए श्रीलंका जैसे राजनीतिक बदलाव की कामयाबियों में भी रूपांतरित हो रहे हैं।नया वर्ष इसी तरह के उभारों को और ऊंचाईयां देने का वर्ष होना चाहिए ; इन्हें तेज करके ही बचाई जा सकती है मनुष्यता, यहीं हैं जो बचा सकते हैं इस मनुष्यता को पनाह देने वाली पृथ्वी को!!, क्योंकि “सिर्फ कैलेंडर के बदलने से नहीं बदलेगा/ यूँ अपने आप तो बिलकुल भी नहीं बदलेगा!!”
: शिक्षा से वंचित करने की बड़ी साज़िश जगदीश पटेल,किसान सभा
Thu, Jan 2, 2025
शिक्षा से वंचित करने की बड़ी साज़िश जगदीश पटेल,किसान सभा
मध्य प्रदेश किसान सभा के संयुक्त सचिव जगदीश पटेल ने मध्य प्रदेश सरकार की जनविरोधी कार्यप्रणाली और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्र में सरकार के मंत्रियों के सवालों के जवाब गैर जिम्मेदाराना मानते हुए बयान जारी कर बताया कि सरकार ने बच्चों को शिक्षा से वंचित रखने पूरी तैयारी कर ली है।सरकार ने सी एम राइज स्कूल नाम दिया,कितना अच्छा नाम है न, सी एम राइज स्कूल के 15किलोमीटर के आसपास कोई शासकीय स्कूल नहीं होगा। हां पर उनके लुटेरे दलाल कार्पोरेट के निजी स्कूल कॉलेज जरूर होंगे जो आसपास के किसान मजदूर को लूटेंगे,किसान को जो थोड़ा बहुत बचेगा, और मजदूर अपना पेठ काटकर बच्चों को पढ़ाने की कोशिश करेगा।पर जवाबदेह,अरे खुद माननीय शिक्षा मंत्री उदय प्रताप जी ने शासकीय और निजी स्कूलों में दर्ज संख्या कम होने पर विधानसभा में एक सवाल के जवाब में बताया कि 0से 6साल के बच्चे हो ही नहीं रहे हैं उनकी जनसंख्या कम हो गई है जो ऐडमिशन लेते। जबकि हकीकत यह है 14साल में 12लाख बच्चे बढ़े हैं। ओर इस 14साल में पहली से आठवीं तक 46लाख विद्यार्थियों की कमी आई है। 0से 6साल तक के बच्चे 2016से अब तक 8साल में निजी एवं शासकीय स्कूलों में 22लाख बच्चे ऐडमिशन नहीं ले सके।कारण क्या है, समझिएसरकार ने मजरे टोले के हजारों स्कूल पहले ही बंद करा दिए, और 20हजार स्कूलो को मर्जर के नाम पर बंद किया जा चुका है। शासकीय स्कूलों को बर्बाद करने की साज़िश कार्पोरेट हित में सरकार ने धीमी गति से लागू की , जिसमें बीपीएल धारियों को निजी स्कूल में फीस माफी कर शासकीय स्कूलों में संख्या कम कराई ओर नियम बनाया 30विद्यार्थियों पर 1शिक्षक ,जो आज कई स्कूलों में देखा जा सकता है कक्षा 1से 5तक एक ही शिक्षक है।और अब नई भर्ती न करना और अतिथि शिक्षकों से काम निकाल रहे हैं , योजना के तहत 20हजार स्कूलों को मर्जर के नाम पर बंद कर दिए गए। अतिथियों को कुछ समय काटने तक अटकाकर रखना है। अतिथियों की वर्तमान पीढ़ी स्थाई नौकरी की आशा में बर्बाद हो गई है,और इस समय सी एम राइज स्कूल का ढिंढोरा पीटकर 15किलोमीटर की रेंज के शासकीय स्कूल समाप्त कर देना चाहते हैं ।500 शिक्षक मजदूर लगाकर शिक्षण कार्य करा रहे हैंमंत्री जी ने एक कार्यक्रम में संबोधित करते हुए बताया कि उनके संज्ञान में है कि 500शिक्षक स्कूल ही नहीं जाते वे मजदूर लगाकर दूसरों से कार्य करा रहे हैं जिसमें 100तो उनके गृह जिले में हैं, _**क्या_** *सरकारी शिक्षकों को बदनाम* कर शासकीय स्कूलों से जनता में घृणा फैला रहे हैं मंत्री जी, और ऐसा है तो मंत्री जी के संज्ञान में होते हुए कार्यवाही क्यों नहीं की, और अब करेंगे क्या ❓कितने नैतिक हैं मंत्री जी। क्या इन्हें पद पर बने रहने का अधिकार है ? मोहन जी को विचार करना चाहिए। उन्हें अपनी विफलता के लिए तत्काल इस्ती़फा देना चाहिए।प्राथमिक शाला के लिए कोई भर्ती नहींवर्तमान में 72हजार पद खाली है, केवल माध्यमिक स्कूलों के लिए अभी 10हजार पद भरने की वेकेंसी निकाली गई है, प्राथमिक शाला में भर्ती का कोई कालम नहीं है,प्रदेश में उच्च शिक्षा में स्थिति यह है कि 73प्रतिशत पद रिक्त हैं, कालेजों में 1400से ज्यादा पद रिक्त हैं जिससे छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। व्यापंम घोटाले के असली अपराधी पकड़े नहीं गए जिनमें सभी जानते हैं जिम्मेवार शामिल हैं। पेपर लीक होने के बाद भी कार्यवाही शिफर है, खेल के नाम पर क्रीड़ा शुल्क नौवीं एवं दसवीं के छात्रों से 120रु, 11वी 12वी के छात्रों से 200रु फीस वसूल रहे हैं जबकि 70प्रतिशत यानि 1742पद रिक्त पड़े हुए हैं, खेल टीचर की नियुक्ति ही नहीं है।इससे समझा जा सकता है कि सरकार देश की जनता को अशिक्षित करने की और निजी स्कूल कालेजों में आम जन को लूटने की पूरी योजना बना चुकी है।एक साज़िश के तहत किसान मजदूर दलित आदिवासी पिछड़े वर्ग की पीढी को अशिक्षित करने की तैयारी है, जिससे उनका दिमाग अपने हक की आवाज उठाने की जगह वे गुलाम बनाए रख सकें।मंत्री जी का विधानसभा में दिया जवाब का मतलब साफ है कि इस अंतराल में बच्चों का जन्म ही नहीं हुआ होगा।विचार करो खेती ही नहीं हमारे बच्चे भी अरे बच्चे फिर उन्हें शिक्षा और रोजगार भी ।कौन है हम कलेक्टर, मिनिस्टर, 300एकड़ के किसान, जो आज शिक्षा से वंचित रखने की साज़िश,, रोजगार समाप्त और जो भूमि किसानों के पास है वह नए भूमि अधिग्रहण बिल के जरिए हमारी जमीन जबरन कार्पोरेट के हवाले सरकार करने वाली है। हमारी खेती, जिस जगह पर देशी विदेशी कार्पोरेट ने उंगली रख दी समझ लो सरकार हमसे छीनकर उन्हें देगी,शासकीय उपक्रम अब अदानी अंबानी और हमारे बीच के मिल मालिक की निजी मिल्कियत हो गई, तो फिर सरकारी नौकरी कहां है जो हम सपने देख रहे हैं बच्चे डाक्टर इंजीनियर एवं अन्य डिग्री प्राप्त कर जैसे शिक्षक को साठ हजार, लाइनमैन को साठ हजार शासकीय चपरासी तक को पचास हजार पेमेंट मिलेगी वह भी गई, गांव गांव स्कूल बंद, कही कहीं 1शिक्षक भरोसे 5कक्षाएं।बिजली कम्पनी ठेकेदार दलालों के हाथ में जिसमें रु 8हजार लाइनमैन की तनख़ाह, प्राइवेट स्कूल 6हजार शिक्षक को, स्वस्थ्य विभाग मेडिकल कॉलेज शासकीय है न पर उसमें काम करने वाले स्वीपर, गार्ड जैसे कई युवा ठेकेडार के अन्दर में 8हजार 10हजार में लाइन लगी है।*_कभी सोचा अपने वारिसों के बारे में ❓_*नहीं सोचा तो अब विचार कीजिए और पूंजीवादी कार्पोरेट चोर लुटेरों को पहचानिए, उनका साथ देना बंद कीजिए अपना हक जो मार रहे हैं उनको जो संरक्षण दिए हुए हैं।उन्हें पहचानिए, अपने हक के लिए स्वयं आगे आइए औरों को भी समझाइए।
: कॉलेज चलो अभियान के प्रथम चरण में विद्यालय का विजिट
Fri, Dec 27, 2024
रिपोर्टर भागीरथ तिवारी
कॉलेज चलो अभियान के प्रथम चरण में विद्यालय का विजिट
आदर्श शिक्षण समिति द्वारा संचालित महात्मा गांधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय द्वारा उच्चशिक्षा विभाग के निर्देशानुसार एवं महाविद्यालय प्राचार्य डॉ यू एस परमार के मार्गदर्शन में कॉलेज चलो अभियान के प्रथम चरण में स्कूल कॉलेज कनेक्ट कार्यक्रम के अंतर्गत महाविद्यालय की टीम के द्वारा ठाकुर निरंजन सिंह उच्चतर माध्यमिक विद्यालय करेली का विजिट किया गया जिसमे कक्षा 11वी एवं 12वी सभी संकाय के छात्र छात्राओं को कॉलेज चलो अभियान के नोडल अधिकारी डॉ संजीव चौबे ने छात्र छात्राओ को नई शिक्षा नीति के अंतर्गत मेजर, माइनर,इलेक्टिव, विषयों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की एवं सहायक प्राध्यापक डॉ अनुपम पटेल ने कला संकाय में प्रवेश हेतु विषय संबंधित विस्तृत जानकारी प्रदान की कॉलेज चलो अभियान के तहत महाविद्यालय में प्रवेश हेतु प्रेरित किया इसी चरण में स्कूल के छात्र छात्राओं एवं अभिभावकों के लिए आओ जाने महाविद्यालय के आधार पर कॉलेज विजिट किया जाएगा इस अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य जीएस राजपूत एवं विद्यालय के छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।