(वर्तमान के गणपति )
गणपति आए द्वार हमारे, फिर से सजे हैं पंडाल,
भक्ति के संग बजते डीजे, रोशनियों का जाल।
माथे तिलक, हाथ में मोबाइल, फोटो खिंचती जाए,
बप्पा के दरबार में देखो, सेल्फी खूब सजाए।
हे गणपति बप्पा!
तेरे आने का अर्थ बताएँ,
मन में थोड़ी भक्ति जगाएँ,
सिर्फ दिखावा छोड़ के बप्पा,
तुझको दिल से घर ले आएँ।
पहले मिट्टी की छोटी मूरत, आँगन में मुस्काती थी,
दादी माँ के हाथों से फिर, मोदक खुशबू आती थी।
अब ऊँची-ऊँची प्रतिमाएँ हैं, लाखों का खर्चा होता,
किसके घर में कितनी सजावट—इसका भी चर्चा होता।
बप्पा तो बस भाव के भूखे, सोना-चाँदी क्या लेना,
सच्चे मन से नाम पुकारो, इतना ही है उन्हें देना।
जिस बस्ती में बच्चे भूखे हों, वहाँ हजारों दीप जलाएँ,
किसी गरीब के घर खुशियाँ हों—बप्पा तब मुस्काएँ।
नदियाँ माँ हैं, उन्हें न मैला, बप्पा से इतना सीखें,
मूर्ति विसर्जन ऐसा हो कि, जल भी निर्मल दिखे।
शोर नहीं, संस्कार चाहिए, उत्सव ऐसा हो प्यारा,
गणपति के संग लौटे घर में, प्रेम और उजियारा।
गणपति केवल मूर्ति नहीं हैं,
वे बुद्धि-विवेक के दाता हैं,
जो विघ्न हमारे भीतर बैठे,
उनके सच्चे विधाता हैं।
आओ इस गणपति पर हम सब, एक नया संकल्प उठाएँ,
बप्पा की पूजा करने से पहले, इंसानियत निभाएँ।
कम दिखावा, अधिक सेवा हो, यही बने त्योहार,
“गणपति बप्पा मोरया” गूँजे, पर बदले जीवन का व्यवहार।
बप्पा आएँ मन के भीतर,
विघ्न सभी हर जाएँ,
इस गणपति पर केवल उत्सव नहीं,
हम खुद भी कुछ बदल जाएँ।