Sunday 9th of August 2026

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कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ससंघ के चातुर्मास कलश की हुई भव्य स्थापना,

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कुंडलपुर में देशभर से उमड़े श्रद्धालु : कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ससंघ के चातुर्मास कलश की हुई भव्य स्थापना,

Aditi News Team

Sun, Aug 9, 2026

कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज ससंघ के चातुर्मास कलश की हुई भव्य स्थापना, देशभर से उमड़े श्रद्धालु

कुण्डलपुर (दमोह)। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र कमेटी के तत्वावधान में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर महाराज, मुनि श्री पवित्र सागर महाराज ससंघ के चातुर्मास कलश की स्थापना समारोह श्रद्धा,भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ सम्पन्न हुई। इस अवसर पर महाराष्ट्र,उ.प्र., राजस्थान,दिल्ली,मध्यप्रदेश के विभिन्न नगरों जिसमें सागर, दमोह, हटा, पथरिया, जबलपुर, कटनी, सतना, ललितपुर, बीना, अशोकनगर विदिशा भोपाल सहित देश के विभिन्न नगरों से हजारों श्रद्धालु एवं युवा , महिला मंडल,बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' एवं कुण्डलपुर तीर्थ क्षेत्र के प्रचार मंत्री जय कुमार जैन जलज ने बताया प्रातः काल बड़े बाबा आदिनाथ भगवान के दिव्य दरबार में अभिषेक, शांतिधारा, पूजन तथा चातुर्मास स्थापना से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों ने सम्पूर्ण तीर्थक्षेत्र को धर्ममय वातावरण से अनुप्राणित कर दिया।धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर महाराज ने कहा कि जैन परंपरा में वर्षायोग और चातुर्मास का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।यह केवल संतों के लिए साधना, स्वाध्याय, तप और आत्मानुशासन का काल नहीं, बल्कि गृहस्थों के लिए भी आत्मचिंतन, संयम, भक्ति, आराधना और जीवन को नई दिशा देने का श्रेष्ठ अवसर है। वर्षाकाल में सूक्ष्म जीवोँ की संख्या बड जाती है, अहिंसा धर्म का पालन हो सके इसलिये सभी महावृती संत एक ही स्थान पर धर्म की आराधना करते है, ऐसे मेँ धार्मिक पर्वों की अधिकता और संतों का सान्निध्य वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है, जिससे धर्म के प्रति जनमानस का आकर्षण स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।

उन्होंने कहा कि जिस नगर या क्षेत्र में चातुर्मास करने वाले महाव्रती पिच्छीधारी संत विराजते हैं, वहां धर्म की चेतना स्वतः जागृत हो जाती है। संतों का सान्निध्य व्यक्ति के भीतर परिवर्तन का माध्यम बनता है। गृहस्थ भले स्वयं संयमी न हो, लेकिन यदि वह नियमित रूप से संयमी संतों के संपर्क में रहेगा तो उसके भीतर भी त्याग और संयम के संस्कार अवश्य ही विकसित होंगे। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के वचनों का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि त्यागी का सान्निध्य स्वयं त्याग की प्रेरणा देता है।

मुनि श्री ने कहा कि वे किसी से तुरंत त्याग करने का आग्रह नहीं करते। पहले त्यागियों के पास आना प्रारंभ कीजिए, परिवर्तन अपने आप होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे पके हुए खरबूजे के पास रखे कच्चे खरबूजे भी धीरे-धीरे अपना रंग बदल लेते हैं, वैसे ही संयमी और तपस्वी संतों का सान्निध्य गृहस्थ के अंतरंग को बदल देता है। मुक्ति मार्ग में संयमी साधक आगे बढ़ते हैं और सम्यग्दृष्टि गृहस्थ उनके पदचिह्नों पर चलकर अपने जीवन को पवित्र बनाने का प्रयास करते हैं। लक्ष्य दोनों का आत्मकल्याण ही होता है, केवल उनकी वर्तमान अवस्था अलग-अलग होती है।

सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि का अंतर स्पष्ट करते हुए मुनि श्री ने कहा कि दोनों संसार में रहते हैं, परंतु दृष्टिकोण अलग होता है। मिथ्यादृष्टि संसार को ही सब कुछ मानता है, जबकि सम्यग्दृष्टि संसार में रहते हुए भी उसे अंतिम सत्य नहीं मानता और उसके संयम की ओर अग्रसर होने की भावना रहती है। यही भाव उसे आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ाता है। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज की नई पीढ़ी में प्रतिभा और उत्साह की कमी नहीं है, लेकिन सही मार्गदर्शन के अभाव में अनेक युवा दुविधा, तनाव और मानसिक अशांति से जूझ रहे हैं। उच्च शिक्षा, आकर्षक वेतन और आधुनिक सुविधाएँ होने के बावजूद जीवन में शांति नहीं है, क्योंकि वे अपनी इच्छाओं, भावनाओं और जीवन की दिशा का सही मूल्यांकन नहीं कर पा रहे हैं। यदि व्यक्ति अपनी इच्छाओं की समीक्षा करे, दिनचर्या को अनुशासित बनाए, भावनाओं पर नियंत्रण रखे और श्रेष्ठ संगति अपनाए, तभी जीवन में वास्तविक सुख और शांति का अनुभव संभव है।मुनिश्री ने प्रेरक संदेश देते हुए कहा, "ग्रंथों को पढ़ो या न पढ़ो, लेकिन अपने आपको अवश्य पढ़ो।" उन्होंने कहा कि संसार की प्रत्येक भाषा सिखाने वाले शिक्षक मिल जाएंगे, लेकिन जीवन की पुस्तक पढ़ना केवल भाव-विज्ञान का विषय है। अपने अंतर्मन को समझने की शिक्षा ज्ञानी गुरु ही दे सकते हैं। आधुनिक तकनीक और मशीनें केवल बाहरी जानकारी दे सकती हैं, किंतु ज्ञानी गुरु की दिव्य दृष्टि व्यक्ति के बाह्य और आंतरिक दोनों पक्षों को सहज ही पहचान लेती है।

उन्होंने समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का स्मरण करते हुए कहा कि उन्होंने कभी किसी का बायोडाटा या कुंडली नहीं देखी। उनकी दिव्य दृष्टि ही व्यक्ति की पात्रता, संस्कार और भावों को पहचान लेती थी। उसी आधार पर वे प्रत्येक व्यक्ति को उसके अनुरूप मार्गदर्शन प्रदान करते थे। यही संत परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह मनुष्य के भीतर छिपी आध्यात्मिक संभावनाओं को जागृत करती है। बड़े बाबा आदिनाथ भगवान के दरबार में भव्य अभिषेक, शांतिधारा एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न हुए। चातुर्मास कलश स्थापना समारोह में मंगलाचरण की मनमोहक प्रस्तुतियां, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने समां बांधां।देशभर से आए श्रद्धालुओं ने, 25सेअधिक महिला मंडलों ने उत्साहपूर्वक आचार्य श्री विद्यासागर जी, आचार्य समयसागर जी महाराज की पूजन में सहभागिता कर अर्घ समर्पित कर धर्मलाभ प्राप्त किया। कुशल निर्देशन प्रतिष्ठाचार्य वाणी भूषण विनय भैया बंड़ा संचालन में श्रद्धा ,भक्ति का अर्घ अर्पित करते हुए अपनी भावना अनुरूप बिना बोली लगाये कलश स्थापित किए गए ।चातुर्मास कलश का सौभाग्य प्रमुख कलश श्रेष्ठी सर्व श्री सीए. कवीश जैन जी दिल्ली , बड़े बाबा कलश प्रशांत जी मुंबई, ज्ञानकलश चंद्रकुमार जैन सराफ अध्यक्ष कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी, गुरुवर छोटे बाबा कलश उत्तमचंद जी कोयला परिवार कटनी, श्रीधर स्वामी कलश उत्तमचंद जी बेगमगंज चौ.मनोज जैन मीनू, सिद्धि कलश आरके जैन महामंत्री अन्य कलश अशोक सराफ प्रमोद सराफ पटेरा, पदमचंद खली वाले, अजय जैन निरमा,सेठ शीलचंद नोहटा, अमित त्यागी, पदमचंद जुझार, संतोष सिंघई पूर्व अध्यक्ष सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु जनों को सौभाग्य मिला। संचालन अमित पड़रिया, अजय अहिंसा ने किया।

इस अवसर पर समाज के अनेक पदाधिकारी, विभिन्न नगरों से आए श्रद्धालु परिवार, सेवाभावी कार्यकर्ता एवं त्यागी वृत्ति वाले परिवार भी उपस्थित रहे। सम्पूर्ण आयोजन श्रद्धा, अनुशासन और भक्ति के वातावरण में सम्पन्न हुआ।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

कुंडलपुर सिद्धक्षेत्र

निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज

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