: इंदौर जिले का प्रभारी मंत्री बनने के पीछे मुख्यमंत्री मोहन यादव की मंशा क्या है,विजया पाठक
Thu, Jan 2, 2025
इंदौर जिले का प्रभारी मंत्री बनने के पीछे मुख्यमंत्री मोहन यादव की मंशा क्या है,विजया पाठक
व्यवसायिक राजधानी का प्रभार होने से प्रभारी मंत्री को होता है वित्तीय लाभ
प्रदेश के इतिहास में पहली बार मुख्यमंत्री बने किसी जिले के प्रभारी, स्थानीय नेताओं में उत्पन्न हो रहा रोष
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इन दिनों चर्चा का केन्द्र बने हुये हैं। एक तरफ जहां मोहन सरकार के एक वर्ष पूरे होने को लेकर चर्चाएं हो रही हैं वहीं दूसरी तरफ हल्ला इस बात को लेकर भी है कि इस एक वर्ष में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की संपत्ति में अकूत इजाफा हुआ है। संपत्ति में इजाफा होने की सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव ने लाभ वाले सभी विभागों को अपने हाथ में रखा है। फिर बात चाहे नर्मदा घाटी की हो, गृह विभाग की हो या फिर प्रभार के जिले की। चर्चा इस बात को लेकर भी है कि इंदौर जिले के प्रभारी मंत्री के रूप में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने विगत एक वर्ष में करोड़ों रुपये का लाभ प्राप्त किया है। यह लाभ उन्हें इंदौर जिले के अंदर होने वाले विकास कार्य, पदोन्नति, पदस्थापना और ट्रांसफर-पोस्टिंग के माध्यम से प्राप्त हुआ है। इंदौर जिले के भाजपा नेताओं में इस बात को लेकर खासा रोष भी है। सभी अंदर ही अंदर इस बात से काफ़ी तकलीफ़ में है कि आखिर मुख्यमंत्री मोहन यादव की यह मनमानी कब तक चलेगी? जाहिर है कि मुख्यमंत्री यादव ने कुछ माह पहले ही खुद के पास इंदौर जिले के प्रभार रखा था तभी से मुख्यमंत्री व मंत्रियों के बीच गहमा-गहमी का दौर चल रहा है।
प्रदेश में पहली बार किसी मुख्यमंत्री ने लिया जिले का प्रभार
राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो मध्यप्रदेश की स्थापना के बाद से लेकर अभी तक का इतिहास अगर देखा जाये तो यह पहला अवसर है जब मध्यप्रदेश के किसी मुख्यमंत्री ने जिले का प्रभार अपने पास रखा है। यही नहीं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का यह निर्णय किस उद्देश्य के साथ लिया गया है यह भी जगजाहिर हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार मुख्यमंत्री पूरे प्रदेश का मुखिया होता है। ऐसे में किसी जिले का प्रभार लेना न तो नियमानुसार ठीक है और न ही संवैधानिक रूप से उचित है क्योंकि मुख्यमंत्री को पूरे समय प्रदेश के विकास और जनकल्याण की दिशा में कार्य़ करना होता है। ऐसे में जिले का प्रभार लेकर वे कैसे अन्य जिलों के साथ न्याय कर सकते हैं। लेकिन अब मुख्यमंत्री यादव ने यह जिम्मेदारी ली है तो उम्मीद है कि वह इसकी भूमिका का निर्वहन भी ठीक ढंग से करेंगे।
आखिर इंदौर शहर का प्रभार लेने के पीछे मंशा क्या है?
मध्यप्रदेश के इतिहास में बने अब तक के मुख्यमंत्रियों में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव में संवेदनशीलता और गंभीरता कम दिखाई पड़ती है। यही कारण है कि उन्होंने कुर्सी हाथ में लगते ही सारी चीजों को अपने हिसाब से चलाना आरंभ कर दिया। फिर बात चाहे मंत्रालय वितरण की हो या फिर जिले के प्रभार की। आईएएस अफसरों की पोस्टिंग से लेकर कलेक्टर्स की पोस्टिंग भी सभी कार्य मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मर्जी और इच्छानुसार ही हो रहे हैं। शायद यही वजह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने पास मिनी मुंबई नाम से प्रसिद्ध इंदौर जिले को प्रभार के तौर पर अपने पास रखा है। क्योंकि इस जिले में प्रदेश के अन्य जिलों की तुलना में व्यवसायिक गतिविधियां कई गुना अधिक होती है। ऐसे में साफतौर पर पता चलता है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की ज़िले का प्रभार लेने के पीछे क्या मंशा है।
ऐसे ज़िले का लेते जो पिछड़े हैं
अभी तक जो भी घटनाक्रम सामने आया उसके अनुसार देखा जाये तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को अगर किसी ज़िले का प्रभार लेना ही था तो उन्हें किसी ऐसे ज़िले का प्रभारी मंत्री बनना चाहिए था जो विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से अछूता हो या पिछड़ा हो। अगर वे किसी जनजातीय या पिछड़े ज़िले के प्रभारी मंत्री बनते तो निश्चित ही स्थानीय लोगों को इसका लाभ मिलता, ज़िले का विकास होता और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ आमजन तक पहुंचता। लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ऐसा करना बिलकुल उचित नहीं समझा और उन्होंने मंशानुरूप प्रभार के जिलों को बहुत सटीक योजना के साथ मंत्रियों में बांटा।
विकास कार्यों में करते हैं हस्तक्षेप
मोहन यादव के पास जब से इंदौर ज़िले का प्रभार गया है, उन्होंने ज़िले में पहले से चल रहे विकास कार्य़ों पर रोड़ा लगाना आरंभ कर दिया है। फिर बात चाहे मेट्रो की हो या फिर अन्य निर्माण कार्यों की। उनके इस हस्तक्षेप के कारण न तो ज़िले में विकास के कार्यों को गति मिल रही है और ना ही इंदौर ज़िले में उस ढंग से नये प्रोजेक्ट स्वीकृत हो पा रहे हैं। इन बातों से कहीं न कहीं जनता और स्थानीय नेताओं के बीच दूरियां बढ़ने से पार्टी को ही नुकसान उठाना पड़ सकता है।
: सिर्फ कैलेंडर के बदलने से नहीं बदलेंगे हालात (आलेख : बादल सरोज)
Thu, Jan 2, 2025
सिर्फ कैलेंडर के बदलने से नहीं बदलेंगे हालात
(आलेख : बादल सरोज)
नववर्ष की शुभकामनायें, और जैसा कि कहे जाने का रिवाज़ है उसके साथ कि, यह नया साल – 2025 – आपके लिए पिछले सभी वर्षों की अपेक्षा बेहतर हो, आप और आपके परिजन स्वस्थ और सानंद रहें और उत्तरोत्तर प्रगति करें। सभी शंकाएं, कुशंकाएं, आशंकाएं दूर रहें ; यकीन संभावनाओं में बदलें, उम्मीदें असलियत बनें और वह दुनिया, जिसमे रहना अभिशाप-सा लगता है, एक अच्छी दुनिया बने। इसी के साथ यह भी कि सामाजिक रूप से उपयोगी बनें रहें, आदमी/औरत से इंसान बनने की ओर अग्रसर होते रहें!! भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘कुछ लिखकर सो, कुछ पढ़कर सो, जिस जगह सवेरे जागा तू, उससे कुछ आगे बढ़कर सो’ के अंदाज में हर दिन जीते रहें । जाती हुई बरस धूल, गुबार के बादल, मलबे के पहाड़ और गज़ा से लेकर सीरिया होते हुए उधर यूक्रेन तक चीखों के कोहराम और इधर बाराबंकी से अजमेर होते हुए संभल और लोकतंत्र से संविधान की तरफ बढ़ती लपटों की तपिश और गड़े मुर्दों के उखाड़े जाने से उड़ती गर्द छोड़कर गयी है। ट्रम्प जैसे अशुभ अमंगलकारियों के सर पर ताज रख कर गयी है। पिछली 9-10 हजार वर्षों में काफी हद तक सजी, संवरी, सुसंस्कृत और मानवीय बनी सभ्यता पिछली सदी की एक दहाई के फासीवादी अपवाद को छोड़कर कभी इतनी मुश्किल में नहीं रही जितनी 21वीं सदी की इस दूसरी दहाई में, उसमें भी विशेष तौर से पिछले बरस में हुई है। हालात दक्षिण एशिया के मकबूल शायर अहमद फ़राज़ के कहे “न शब ओ रोज़ ही बदले हैं न हाल अच्छा है/ किस बरहमन ने कहा था कि ये साल अच्छा है” की जिज्ञासा से काफी आगे बढ़कर क़तील शिफ़ाई के शेर “जिस बरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है/ उस को दफ़नाओ मिरे हाथ की रेखाओं में” की झुंझलाहट तक आ गयी लगती है। तरक्कियां ही धुंधलके में नहीं आई हैं, पिछाहटें भी सुर्खरू होती दिखने लगी है। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी के भस्मासुरी अवतार तक पहुंच चुके साम्राज्यवाद के श्वदंत – कैनाइन टीथ – न सिर्फ और नुकीले और पैने हुए हैं, बल्कि नख से शिख तक बड़े-बड़े नाखून भी उग आये हैं। इतिहास गवाह है कि साम्राज्यवाद अपनी जीवनी शक्ति बढाने के लिए समाज में युद्धों, गृहयुद्धों के अलावा नस्लवाद, रंगभेदवाद, इधर मनुवाद, तो उधर कबीला और क्षेत्रवाद की खरपतवार रोपता है, उसे खाद-पानी देता है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि जिन यहूदियों को नाजी दुष्ट अडोल्फ़ हिटलर ने अकल्पनीय नृशंसता का शिकार बनाकर दुनिया और उसकी इंसानियत को दहला दिया था, आज उन्हीं यहूदियों के नाम पर साम्राज्यवादी अमरीका और उसके लगुओं-भगुओं की गोद में बैठकर यहूदीवाद – ज़िओनिज्म – दुनिया के लिए खतरा बनकर उभर रहा है। दहशत और बर्बरता का वैश्वीकरण किया जा रहा है। ज्ञान और विकासोन्मुखी चेतना के प्रकाश स्तम्भ – लाइट हाउस – गिराए जा रहे हैं। बांग्ला कविता के जनक माने जाने वाले चंडीदास ने जिसे “साबार ऊपर मानुष सत्य, ताबार ऊपर नाही” कहकर जिस मनुष्य को सबसे बड़ा सत्य बताया था और उसके ऊपर कुछ भी नहीं है, तक कहा था, आज वही मनुष्य विपदा में है। उत्तर, दक्षिण में बंटी मानी जाने वाली दुनिया में आठों दिशाओं की इंसानियत जिन्दा रहने की फ़िक्र में जकड़ी हुई ‘ये जीना भी कोई जीना है’ के व्यामोह में फँसी है। जिन्दगी मुहाल हुई पड़ी है और जिस पूंजीवाद को निर्विकल्प और अब तो यही चलेगा वाली व्यवस्था करार दिया जाता है, उसके बाजे बजे हुए हैं। सदियों तक कभी सीधे, तो कभी टेढ़े पूरे विश्व की लूट करके, अमीर बने कथित विकसित देशों की आबादी का कहीं तिहाई, कहीं चौथाई हिस्सा कराह रहा है। जब रोशनियों के नीचे इतना अंधेरा है, तो पहले से ही मोमबत्तियों और लालटेनों और जुगनुओं पर गुजर करने वाले देशों में घटाटोप कितना घुप्प होगा, समझा जा सकता है। दुःख और वंचनाओं के भूमंडलीकरण की मुख्य वजह मुनाफे की हवस है और अब तो इसने पृथ्वी के अस्तित्व तक को खतरे में डाल दिया है। इधर, मजदूर वर्ग से सारे हक़ अधिकार छीन उसे 1886 से पहले की दशा में पहुंचाने की साजिशें रची जा रही हैं। किसानों और उनके गाँवों की हालत जिस दिशा में धकेली जा रही है, वह वारेन हेस्टिंग्स की इंग्लैंड की संसद को दी उस रिपोर्ट की याद दिलाती है, जो वर्ष 1770 के बंगाल, बिहार, ओडिसा के अकाल में 1 करोड़ लोगों के मारे जाने के बाद उसने भेजी, तो उसमें लिखा था कि “एक तिहाई जमीन जंगल बन गयी है, जहां जंगली जानवर रहने लगे हैं।“ इसके बाद भी मालगुजारी पिछले वर्षों की तुलना में अधिक वसूल की गयी थी। कारिंदों की लूट इसके अलावा थी। यह वही दौर था, जिसमें यूरोप और आस्ट्रेलिया के लिए नील पैदा करने के नाम पर किसान और खेती दोनों को और बर्बाद किया गया था।खेती का वही कम्पनीकरण अब कार्पोरेटीकरण का नाम धरकर आ गया है। इस पर प्रमुदित और बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला बने मध्यमवर्ग की हालत ‘हलुआ मिला न माड़े, दोऊ दीन से गए पांड़े’ जैसी होती जा रही है। अच्छे दिन आने के मंत्रोच्चार में गाफिल हुआ यह पढ़ा-लिखा हिस्सा फैज़ लुधियानवी का साहब का शेर “तू नया है तो दिखा सुब्ह नई शाम नई/ वर्ना इन आँखों ने देखे हैं नए साल कई” दोहराते-दोहराते बेजार हो गया है, इतना थक हार गया है कि हैडलेस चिकन बना हुआ है, कुछ सूझे नहीं सूझ रहा। इस वर्ष 1 जनवरी से शुरू होने वाली नई साल में भारत के संविधान के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। आजादी भले 15 अगस्त 1947 को मिल गयी थी, मगर स्वतंत्रता को यथार्थ में उतारने के नक़्शे ने 26 जनवरी 1950 को ही सूरज की पहली किरण देखी थी। अपनी अनेक सीमाओं और सुधार की कई गुंजाइशों के बावजूद धरती के इस हिस्से के अनगिनत ग्रंथों में यही एकमात्र किताब है, जिसने सबको एक किया, थोड़ा-बहुत नेक किया और आज तक किये हुए है। नए साल की आमद से पहले ही इस संविधान के द्वारा दिए गए लोकतंत्र का चीरहरण किया जा रहा है, इसमें लिखे मानवाधिकारों और मूलभूत अधिकारों का अपहरण किया जा रहा है। समता, समानता और धर्मनिरपेक्षता की धज्जियां पहले ही उडाई जा चुकी हैं। इरादा संविधान में लिखे शब्दों को अक्षर-अक्षर चींथकर उनकी जगह मनुस्मृति की कालिख पोतने का है। मगर ऐसा और ऊपर लिखे सब कुछ जैसा करने के लिए सत्ता और सामर्थ्य के गुरूर में चूर इधर और उधर के हुक्मरान जानते हैं कि मनुष्य से ज्यादा शक्तिशाली और कोई नहीं होता ; उसके लिए जीवन के मायने जनकवि मुकुट बिहारी सरोज के मुक्तक “जिंदगी केवल न जीने का बहाना/ जिंदगी केवल न साँसों का खजाना/ जिंदगी सिन्दूर है पूरब दिशा का/ जिदगी का काम है सूरज उगाना।“ की तरह होते हैं। देश-दुनिया में हो रहे आंदोलन और संघर्ष इसके गवाह हैं। ये संघर्ष अब रूपये-पैसे की लड़ाई से आगे बढ़ते हुए श्रीलंका जैसे राजनीतिक बदलाव की कामयाबियों में भी रूपांतरित हो रहे हैं।नया वर्ष इसी तरह के उभारों को और ऊंचाईयां देने का वर्ष होना चाहिए ; इन्हें तेज करके ही बचाई जा सकती है मनुष्यता, यहीं हैं जो बचा सकते हैं इस मनुष्यता को पनाह देने वाली पृथ्वी को!!, क्योंकि “सिर्फ कैलेंडर के बदलने से नहीं बदलेगा/ यूँ अपने आप तो बिलकुल भी नहीं बदलेगा!!”
: सालीचौका,क्रिकेट टूर्नामेंट कप 2025 का 9 जनवरी से शुभारंभ
Thu, Jan 2, 2025
क्रिकेट टूर्नामेंट कप 2025 का 9 जनवरी से शुभारंभ
सालीचौका।ठंड के मौसम में सबसे ज्यादा खेल जगत से जुड़े खिलाड़ी जिनमें सबसे लोकप्रिय क्रिकेट आजकल हर युवा की जुबान पर चढ़ा हुआ है।इस खेल को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य और युवाओं में खेल भावना को जागृत रखने के भाव को ध्यान में रखते हुए। अंग्रेजी कलेंडर के नये साल में क्रिकेट कप 2025 शुरू हो रहा है ।जो कि सालीचौका नगर परिषद क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम आमढाना सांवरी के प्राथमिक शाला स्कूल के बगीचा वाले ग्राउंड में इसका शुभारंभ 9 जनवरी 2025 दिन गुरुवार से होने जा रहा है।जिसके शुभारंभ के मुख्य अतिथि गाडरवारा विधानसभा क्षेत्र 121 के विधायक और मध्यप्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री राव उदय प्रताप सिंह मुख्य अतिथि होंगे।वहीं विशिष्ट अतिथि में नर्मदा शुगर मिल के संचालक विनीत माहेश्वरी भाईसाब होंगे।युवा पार्षद जितेंद्र राय वही विधायक पुत्र राव अनुज प्रताप सिंह मौजूद रहेंगे।उक्त क्रिकेट विधायक कप में मैन ऑफ द मैच फाइनल नायरा पेट्रोल पंप नांदनेर पराग तिवारी, मैन ऑफ द सीरीज आनंद पेट्रोल पंप सालीचौका आनंद चौकसे।प्रथम पुरस्कार के रूप में 51111₹ की राशि एवं शील्ड,द्वितीय पुरस्कार 31111₹ शील्ड रहेगी।टीमों के लिए एंट्री फीस 2111₹ रखी गई है।उक्त विशेष विधायक कप क्रिकेट प्रतियोगिता सौजन्य से जय जगदंबा राइस मिल पोडार,नर्मदा शुगर मिल (NSM)पोडार,तिरुपति राइस मिल पोडार,जय बजरंग टेंट एवं फ्लावर डेकोरेशन मनोज वर्मा आमढाना सावरी बजरंग होटल & केटरिंग पवन पटेल लालभैया,विशेष सहयोगी पार्षद गणेश शर्मा,भगवानदास पटेल,यसवंत पटेल,प्रशांत मिश्रा,जय बजरंग क्रिकेट क्लब युवा टीम आमढाना साँवरी ।