: सहस्त्रकूट जिनालय में1008 प्रतिमायें स्थापित की जा रही नवनिर्मित मानस्तंभ में प्रतिमायें स्थापित हुई
Sun, Jun 9, 2024
सहस्त्रकूट जिनालय में1008 प्रतिमायें स्थापित की जा रही
नवनिर्मित मानस्तंभ में प्रतिमायें स्थापित हुई
कुंडलपुर दमोह ।सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य विद्या शिरोमणि आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के सानिध्य में बड़े बाबा जिनालय का कलशारोहण एवं सहस्त्रकूट जिनालय वेदी प्रतिष्ठा का अभूतपूर्व आयोजन चल रहा है। 9 जून को प्रातः अभिषेक ,शांतिधारा ,नित्यमह पूजन उपरांत सहस्त्रकूट मानस्तंभ,मुनिसुब्रतनाथ जिनालय वेदी शुद्धि संस्कार के उपरांत मानस्तंभ में श्री जी की प्रतिमाओं की स्थापना आचार्य संघ के मंगल सानिध्य में की गई ।इसके पश्चात सहस्त्रकूट जिनालय में जिनविम्ब, जिन प्रतिमा स्थापित करने का क्रम प्रारंभ हुआ प्रतिमाएं गगन विहार करके सहस्त्रकूट जिनालय में पहुंचाई गई । प्रचारमंत्री जय कुमार जैन जलज ने बताया इस अवसर पर आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं आचार्य श्री समय सागर जी महाराज की संगीतमय पूजन की गई ।इस अवसर पर आचार्य विद्यासागर जी महाराज द्वारा रचित जापानी कविता हाईकू पुस्तक का मराठी एवं कन्नड़ भाषा में अनुवाद करके प्रकाशित दोनों पुस्तकों का विमोचन किया गया ।नव निर्मित बुंदेलखंड का प्रथम सहस्त्रकूट जिनालय में गगन विहार कर प्रतिमायें विराजित की जा रही हैं तब उस दृश्य का स्मरण हो गया जब आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के पडगाहन पर पूज्य बड़े बाबा गगन विहार करके नए मंदिर में विराजित हुए थे। सहस्त्रकूट जिनालय में प्रतिमा स्थापित करने का क्रम अगले दिन भी जारी रहेगा ।कल छहघरिया जिनालय में भगवान मुनिसुब्रतनाथ की प्रतिमा विराजित होगी ।इस अवसर पर पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा आत्मा का पतन आत्मगत परिणामों के द्वारा ही हुआ करता है और आत्मा का जो उत्थान है वह भी आत्मगत पवित्र परिणाम के द्वारा हुआ करता है ।यह आगम के माध्यम से हमें ज्ञात हो जाता है ।वस्तुतः प्रत्येक जीव स्वतंत्र परिणमन कर सकता है किंतु उसकी जो स्वतंत्रता है वह लुप्त हो चुकी है कर्माधीन परिणमन जब तक उस जीव का चलेगा तब तक वह बंधन का ही अनुभव करता है और बंधन का अनुभव करता हुआ संसारी प्राणी अनेक प्रकार के परिणाम कर लेता है । कलुषित भावों के माध्यम से उसका पतन होता है और कलुषित भावों के लिए ऐसे कौन से पदार्थ हैं जिनके माध्यम से वह आत्मा पतित होती चली जाती है। एक कारिका के माध्यम से इस विषय को थोड़ा सा विस्तार देना चाहते हैं। जिनेंद्र भगवान ने स्पष्ट कहा है कि इंद्रियों के माध्यम से उत्पन्न होने वाला जो सुख है वह ऐसा कहा है पांचो इंद्रियों के माध्यम से उत्पन्न होने वाला सुख हुआ करता है और वह सुख कैसा है मोह के दावानल को प्रज्वलित करने के लिए वह ईंधन का काम करता है ।आचार्य कहना चाहते हैं मोह रूपी जो दावाग्नि है उसको और प्रज्वलित करना है तो इंद्रिय सुख ईंधन का काम करता है। दीपक आपने जलाया है और दीपक जल रहा है तेल अथवा घी दीपक के लिए ईंधन का काम कर रहा है ।ईंधन के बिना अग्नि जलती नहीं ईंधन समाप्त हो जाए अग्नि बुझ जाती है किंतु दावाग्नि अनंत काल से वह अग्नि जल रही है ।अखंड रूप से एक क्षण भी उसका अभाव नहीं हुआ है अनंत काल तक अभी भी वह अग्नि शांत नहीं हो रही है क्योंकि उसको ईंधन प्रतिफल मिल रहा है। ईंधन डालते चले जाओ अग्नि को बुझाया संभव नहीं है। दुख की परंपरा का वह बीज है दुख समाप्त हो आप प्रभु के चरणों में आकर जुड़ोगे भगवान सुनने वाले नहीं वह सुनते नहीं कुछ करते नहीं उन्होंने जगत का जो स्वरूप है बोध हो चुका है संसारी प्राणी उपदेश देने से मानता नहीं ।क्योंकि जब तक अनुभव नहीं होगा तब तक वह ज्ञान प्रकट ही नहीं हो होता ।अनुभव अनंत काल से हो रहा है। दुख का अनुभव हो रहा है इसके उपरांत भी पंचेेंद्री के विषयों के प्रति जो आकर्षण बना हुआ है वह समाप्त नहीं हो रहा है उसको समाप्त करने के लिए भी जिनेंद्र भगवान की आराधना हमें करनी है। स़हस्त्रकूट का निर्माण हुआ है और उसमें विम्ब स्थापित हो रहे हैं उनका दर्शन करके हमें अपने मोह को शांत करना है। अपने आप शांत नहीं होगा ।क्योंकि वह अग्नि अपने आप जल नहीं रही है। अग्नि और उद्लित हो रही है उसको विषयों से मोड़ने की आवश्यकता है ।महाराज चारों ओर विषय दिखाई देते हैं हम क्या करें आंख खोलेंगे तो पांचो इंद्रियों के विषय आपके सामने उपस्थित हैं। किंतु उन पदार्थों को ग्रहण करने का भाव नहीं होना चाहिए। ग्रहण करना ठीक नहीं क्योंकि अपने से पृथक जो पदार्थ हैं वे अपने नहीं हो सकते तो अपना जो स्वरूप है उसको देखने के लिए आंख मूंदना होगा।
: कुंडलपुर में याग मंडल विधान का हुआ भव्य आयोजन इंद्र इंद्राणी ने भक्ति भाव से अर्घ्य चढ़ाएं
Sun, Jun 9, 2024
कुंडलपुर में याग मंडल विधान का हुआ भव्य आयोजन
इंद्र इंद्राणी ने भक्ति भाव से अर्घ्य चढ़ाएं
कुंडलपुर दमोह ।सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के चतुर्विध संघ के मंगल सानिध्य में सहस्त्रकूट जिनालय का वेदी प्रतिष्ठा समारोह एवं बड़े बाबा जिनालय का कलशारोहण समारोह का अभूतपूर्व आयोजन चल रहा है ।8 जून को श्री यागमंडल विधान का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। इस अवसर पर प्रतिष्ठाचार्य सम्राट ब्रह्मचारी विनय भैया बंडा ने विधि विधान से याग मंडल विधान की सभी क्रियाएं संपन्न कराई ।प्रातः अभिषेक ,शांति धारा, पूजन उपरांत याग मंडल विधान प्रारंभ हुआ। विधान में बैठे हजारों इंद्र इंद्राणियों ने अत्यंत भक्ति भाव से संगीत की स्वर लहरियों के बीच पूजन करते हुए प्रत्येक अर्घ्य चढ़ायें ।क्रमबद्ध श्रीफल सहित अर्घ्य चढ़ाने का सौभाग्य भी प्रत्येक को प्राप्त हुआ। । इस बीच पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक शांति धारा एवं पूजन विधान संपन्न हुई। मुनि संघ एवं आर्यिका संघ की आहार चर्या भी संपन्न हुई। इस अवसर पर परम पुज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा पूर्ण रूप से उस दीपक के द्वारा प्रकाश नहीं मिल पा रहा है दीपक की लौ स्थिर हो जाए पूरा का पूरा प्रकाश फैल जाता है ।इसी प्रकार वह आत्म तत्व में उपयोग केंद्रित है और वह केंद्रित एक अंतर मुहूर्त के लिए हो जाए तो केवल ज्ञान रूपी दीपक जलेगा और विश्व प्रकाशित हो सकता है। आज तक सब कुछ संसारी प्राणी ने कार्य किया है केवल पुनरावृत्ति करता चला जा रहा है ।किंतु आज तक कोई कार्य नहीं किया है परमात्म तत्व को नहीं जान पाया है बहुत विस्मय होता है। 33 सागर की आयु है सर्वार्थ सिद्धि और परम सुख लेश्या के साथ अहमिंद्र आदि होते हैं निरंतर तत्व चिंतन में उनका उपयोग लगा होता है। इसके उपरांत भी आत्म तत्व का संवेदन उन्हें नहीं हो सकता। क्यों ?क्योंकि संयम का अभाव है। द्वादशांग के पाटी होने के उपरांत भी समस्त पदार्थ को जानने की क्षमता रख रहे है भले परोक्ष रूप में हो इसके उपरांत भी आत्म तत्व का वीतराग संवेदन इसको बोलते उससे वह वंचित हैं। क्षायिक सम्यक दृष्टि भी हो सकते कोई बाधा नहीं और तेतीस सागर तक तत्व चिंतन में लीन होते हुए भी एक विशेष बात और कह रहा हूं वहां पर वासना नहीं है ।सोलहवे स्वर्ग तक तो भिन्न-भिन्न स्वर्ग में रहने वाले जो इंद्र आदिक है वह विचार से सहित हैं किंतु नव अनुदिश पंचउन्त्तर विमान में रहने वाले जो अहमहेंद्र हैं वे शुक्ल लेश्या के धारी होते हैं और वासना का अभाव रहता है। वासना संभव नहीं है इसके बावजूद भी असंयम पल रहा है बड़ी विचित्र दशा है ।33 सागर तक तत्व का चिंतन करने के बावजूद वहां से उतरकर जीव मनुष्य पर्याय को प्राप्त कर लेता है वह पुराने संस्कार हैं वह डिलीट हो जाते हैं ।33 सागर तक तत्व चिंतनमें लीन रहा यहां आने के उपरांत वासना जागृत होती है क्यों ?नौकर्म कर्म को फल देने के लिए जो निमित्त डिलीट हो जाते हैं ।33 सागर तक तत्व चिंतन में लीन रहा यहां आने के उपरांत वासना जागृत होती है ।नोकर्म कर्म को फल देने के लिए जो ऐसी सामग्री है उसके बीच में आता है तो अपने कर्म को रोक नहीं पाता अपने परिणामों को रोक नहीं पाता। 33 सागर संबंधी जो संस्कार थे वासना के अभाव में तत्व चिंतन किया था सारा का सारा विस्मृत में हो जाता। यहां आकर के वृषभ नाथ भगवान का जीव, भरत चक्रवर्ती का जीव, बाहुबली का जीव यह तीनों सर्वार्थ सिद्धी से अवतरित हुए हैं । यहां पर अवतरित होने के उपरांत 24 लाख पूर्व की जिनकी आयु है ऐसे वृषभ नाथ युग की आदि में मोक्ष मार्ग के नेता होने वाले हैं इसके उपरांत भी वह सारे के सारे तत्व चिंतन के संस्कार डिलीट हो चुके हैं। कर्मबंध से बचना चाहते हो तो नौकर्म से बचने का पुरुषार्थ करो।
: नक्षत्र का आई आई टी में चयन
Sun, Jun 9, 2024
नक्षत्र का आई आई टी में चयन
गाडरवारा । विगत दिवस घोषित हुए आईआईटी ( इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी) की प्रवेश परीक्षा के परिणाम में स्थानीय बीटीआई स्कूल से सेवानिवृत व्याख्याता सीबी शर्मा के पौत्र एवं स्थानीय शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉक्टर सुनील शर्मा के छोटे भाई संदीप शर्मा के सुपुत्र नक्षत्र का चयन हुआ है। उल्लेखनीय है कि आईआईटी देश सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्थान हैं। नक्षत्र की इस सफलता से परिजन एवं मित्रों में हर्ष है।