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गांधी सभी यक्ष प्रश्नों के उत्तर : गांधी जयंती पर एक कविता

Aditi News Team

Thu, Oct 2, 2025

गांधी सभी यक्ष प्रश्नों के उत्तर

( गांधी जयंती पर एक कविता)

गांधी आज भी खड़े हैं

किसी सूनी सड़क के मोड़ पर,

जहाँ झुग्गियाँ धुएँ से काली हैं,

और बच्चे किताब की जगह

ईंटें ढो रहे हैं।

वे चुपचाप देखते हैं

कि कितनी तेज़ रफ्तार है विकास की,

पर कितनी धीमी है न्याय की चाल।

वे सुनते हैं

भाषणों के शोर,

और उसके बीच दबे

किसानों की आहें।

गांधी फिर से चलते हैं

हमारी गलियों में,

जहाँ कचरे के ढेर हैं,

नालियों में बहती गंदगी है

और लोग कहते हैं

स्वच्छ भारत।

गांधी संसद की दहलीज़ पर खड़े होकर

आज के नेताओं से कहते

राजनीति सेवा है,

इसे सौदेबाज़ी मत बनाओ।

पार्टी से पहले देश को रखो।

सत्ता का लोभ त्याग दो।

वे अदालत के बाहर खड़े होकर कहते

सत्य की रक्षा करने वाले मंदिर

अब विलंब क्यों करते हैं?

न्याय जितना तेज़ होगा

समाज उतना ही मजबूत होगा।

गांधी किसानों के बीच जाते,

और उनके हाथ पकड़कर कहते

हल का सम्मान करो,

भूमि से ही राष्ट्र का भविष्य पनपता है।

लाभ लालच से नहीं,

परिश्रम से खोजो।

गांधी

सिर्फ तस्वीरों का कैनवास नहीं थे,

न ही सिर्फ सिक्कों पर छपी परछाई।

वे थे

किसी बुनकर की हथकरघा धुन,

किसी आश्रम का शांत चरखा,

किसी सत्याग्रही का अडिग कदम।

आज

जब नफ़रत की आग

हर ओर धधकती है,

वे पूछते हैं

क्या सत्य का पथ इतना कठिन हो गया

कि कोई उस पर चलना नहीं चाहता?

गांधी आज भी प्रासंगिक हैं,

क्योंकि उनके विचार

हमारे हर संघर्ष का उत्तर रखते हैं।

भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी,

असमानता, प्रदूषण,

सबके सामने वे खड़े होकर कहते

आत्मावलोकन करो,

सत्य का मार्ग चुनो,

स्वच्छ रहो, सादगी अपनाओ,

दूसरों की सेवा करो।

यही स्थायी उपाय है।

गांधी

भीड़ में खो नहीं सकते,

क्योंकि उनका अकेलापन ही

उनकी पहचान है।

वे आज भी

हर भूखे के निवाले में हैं,

हर दबे स्वर के साहस में हैं,

हर उस मुस्कान में हैं

जो विपरीत परिस्थितियों के बीच भी

जगमगाती है।

गांधी जयंती

केवल तिथि नहीं है,

यह दर्पण है

जिसमें हमें देखना है

कि हमने कितना अपनाया

और कितना भुलाया।

यदि हम सचमुच

उनके होने को समझना चाहें,

तो झाँकना होगा

अपने ही भीतर

जहाँ एक अहिंसा अब भी सोई है,

जहाँ एक सत्य अब भी प्यासा है।

गांधी वहीं मिलेंगे,

जहाँ किसी की मदद बिना दिखावे के की जाएगी,

जहाँ किसी को धर्म नहीं,

मानव मानकर अपनाया जाएगा।

गांधी जयंती पर

प्रण यही हो

कि उन्हें पत्थर की मूर्तियों से निकालकर

जीवन की धड़कनों में बसाएँ।

क्योंकि गांधी कोई बीता हुआ नाम नहीं,

वे प्रश्न हैं

और उत्तर भी।

गांधी जयंती पर

यह सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं,

बल्कि आत्मसंवाद है।

क्योंकि गांधी अब भी पूछते हैं

क्या तुम मुझे

फिर से जीवित करोगे

अपने आचरण में?

सुशील शर्मा

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