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चातुर्मास केवल वर्षा ऋतु में एक स्थान पर निवास करने की परंपरा नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, साधना और संस्कारों का पर्व

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चातुर्मास आत्मपरिवर्तन, संयम और पुण्य जागरण का महापर्व है, समतासागर जी : चातुर्मास केवल वर्षा ऋतु में एक स्थान पर निवास करने की परंपरा नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, साधना और संस्कारों का पर्व

Aditi News Team

Sat, Aug 1, 2026

चातुर्मास आत्मपरिवर्तन, संयम और पुण्य जागरण का महापर्व है,निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज

कुण्डलपुर (दमोह)। चातुर्मास के पावन अवसर पर आयोजित प्रवचन श्रृंखला धर्मसभा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने कहा कि चातुर्मास केवल वर्षा ऋतु में एक स्थान पर निवास करने की परंपरा नहीं है, बल्कि आत्मचिंतन, संयम, साधना और संस्कारों के जागरण का महापर्व है। इन चार महीनों में आने वाला प्रत्येक पर्व, कल्याणक और धार्मिक आयोजन हमें भगवान महावीर, तीर्थंकरों और आचार्य परंपरा के आदर्शों से जोड़कर जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देता है।उन्होंने भगवान महावीर के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि राजगृह के विपुलाचल पर्वत पर भगवान का समवसरण अनेक बार लगा। इसका कारण किसी का निमंत्रण नहीं, बल्कि वहाँ के भव्य जीवों का प्रबल पुण्य था। जहाँ श्रद्धा, भक्ति और पुण्य का वातावरण बनता है, वहाँ संतों का सान्निध्य सहज ही प्राप्त होता है। इसी प्रकार आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर से बार-बार जुड़ना भी किसी व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं था, बल्कि वहाँ की साधना के अनुकूल वातावरण और श्रद्धालुओं की भावनाओं का परिणाम था। मुनि श्री ने कहा कि संत कभी अपनी सुविधा नहीं देखते। वे वहीं प्रवास करते हैं जहाँ धर्म की प्रभावना हो, साधना का वातावरण बने और समाज को आध्यात्मिक दिशा मिल सके। जिस भूमि पर संतों के चरण पड़ते हैं, वहाँ का प्रत्येक कण, प्रत्येक वृक्ष और प्रत्येक शिला भी पावन हो जाती है।उन्होंने दिगंबर परंपरा में पिच्छी की महत्ता समझाते हुए कहा कि यह केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि अहिंसा और जीवदया का सर्वोत्तम उपकरण है। इसका उपयोग अत्यंत मर्यादा और शास्त्रीय नियमों के अनुसार किया जाता है। आहारचर्या के समय साधु विशेष सावधानी रखते हैं ताकि किसी भी जीव को कष्ट न पहुँचे। मयूरपंख की पिच्छी केवल स्वाभाविक रूप से गिरे हुए पंखों से बनाई जाती है। यदि कहीं राष्ट्रीय पक्षी मयूर के साथ हिंसा होती है तो उसका कठोर विरोध होना चाहिए, परंतु सहज प्राप्त पंखों से निर्मित पिच्छी का उपयोग दिगंबर परंपरा की प्राचीन और शास्त्रसम्मत व्यवस्था है।उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप संवेदनशीलता, करुणा और आत्मसंयम है। केवल पूजा-अर्चना ही धर्म नहीं, बल्कि अपने व्यवहार में अहिंसा, धैर्य, क्षमा और विवेक को उतारना ही सच्ची साधना है।चातुर्मास की महत्ता बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि यह काल एक आध्यात्मिक यात्रा के समान है। संस्कार शिविर, दशलक्षण महापर्व, दीक्षा दिवस, शरद पूर्णिमा और दीपावली जैसे पर्व हमें विभिन्न तीर्थों और महापुरुषों के जीवन से जोड़ते हैं। भगवान महावीर राजगृह से पावापुरी पहुँचे, पर साधकों के लिए यह यात्रा केवल स्थानों की नहीं, बल्कि आत्मा को राग-द्वेष से मुक्त करने की यात्रा है। इन पर्वों का स्मरण हमें त्याग, तप, संयम और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।प्रवचन के दौरान एक जिज्ञासा का समाधान करते हुए मुनि श्री ने कर्म सिद्धांत को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने कहा कि अरिहंत भगवान अनंत सुख का अनुभव करते हैं, किंतु सिद्ध अवस्था प्राप्त होने तक वेदनीय कर्म का सूक्ष्म अस्तित्व रहता है। जैसे प्रखर प्रकाश के सामने मंद प्रकाश दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार शुभ कर्मों का प्रभाव इतना प्रबल होता है कि अशुभ कर्म प्रभावहीन हो जाते हैं। सिद्ध अवस्था में सभी कर्मों का पूर्ण क्षय होने पर आत्मा को अखंड, अबाध और अनंत सुख की प्राप्ति होती है। यही प्रत्येक जीव का अंतिम आध्यात्मिक लक्ष्य है।उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि चातुर्मास के प्रत्येक दिन को आत्मविकास का अवसर बनाएं। धर्मसभा में नियमित उपस्थित हों, संस्कार शिविरों में भाग लें, अभिषेक, शांतिधारा, वंदना, स्वाध्याय और सेवा के माध्यम से पुण्य संचय करें तथा भगवान महावीर के अहिंसा, संयम और करुणा के संदेश को अपने जीवन में उतारें। जब व्यक्ति स्वयं बदलता है, तभी परिवार, समाज और राष्ट्र में सकारात्मक परिवर्तन आता है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन 'विद्यावाणी' एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि चातुर्मास के अंतर्गत प्रतिदिन धर्मसभा,संपन्न हो रही है आगामी समय में संस्कार शिविर तथा विविध धार्मिक आयोजन बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न होंगे। देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु कुण्डलपुर पहुँचकर बड़े बाबा के दर्शन, अभिषेक, शांतिधारा, आहारचर्या ,संत सान्निध्य और धर्म लाभ प्राप्त कर रहे हैं। कुण्डलपुर तीर्थक्षेत्र कमेटी ने सभी धर्म श्रद्धालुओं से चातुर्मास के कार्यक्रमों में अधिकाधिक सहभागिता कर संयम, संस्कार और सेवा की इस पुण्यधारा से जुड़ने का आग्रह किया।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

कुण्डलपुर सिद्ध क्षेत्र

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