आरतियों का इतिहास एवं उनके लेखक : डा. एस. के. अरेला(स्वामी सत्य प्रज्ञानंद)
Aditi News Team
Tue, Jul 28, 2026
आरतियों का इतिहास एवं उनके लेखक
डा. एस. के. अरेला(स्वामी सत्य प्रज्ञानंद)
हम सनातनियों में पूजा-पाठ हेतु ईश्वरीय स्तुति के रूप में आरती करने का विधान प्राचीन काल से ही रहा है। यद्यपि उसके रूप और विधि समय समय पर परिवर्तित होती रही है। वेदों में अग्नि अनुष्ठानों से उत्पन्न, ये स्तुतियां मुख्य रूप से 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच रची गई थी । सबसे प्रसिद्ध आरतियों के इतिहास और उनके रचनाकारों का विवरण नीचे दिया गया है:
प्रमुख आरतियां और उनके रचयिता
*1.ओम जय जगदीश हरे* भगवान विष्णु की आरती जिसको पं. श्रद्धाराम शर्मा (फिल्लौरी, पंजाब के एक साहित्यकार ने सन 1870 में लिखी थी। इसे सार्वभौमिक आरती के रूप में बनाया गया था। और उसी समय से धीरे धीरे यह आरती प्रसिद्धि होती चली गई।
*2.ओम जय शिव ओंकारा*
भगवान शिव की आरती, गुजरात के संत स्वामी शिवानंद द्वारा लगभग 16 वीं शताब्दी में लिखी गई थी। स्वामी शिवानंद (आरती के लेखक): ये 16वीं शताब्दी में गुजरात (सूरत) में जन्मे और काशी में रहे संत थे, जिन्होंने आरतियों की रचना की। इनको एक ओर प्रसिद्ध स्वामी शिवानंद (1883-1963) के मध्य वेदांत के विद्वान से अलग हैं।
*3.जय अम्बे गौरी देवी माता दुर्गा की आरती
स्वामी शिवानंद (वामदेव पांड्या)1601 ई. में पहली बार गुजरात के अंबाजी मंदिर में गाई गई थी। और उसी समय से यह आरती इतनी प्रसिद्धि हुई कि सर्वत्र इस आरती द्वारा देवी दुर्गा की पूजा होने लगी।
*4.जय गणेश देवा* भगवान गणेश जी की आरती छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास द्वारा 1640 से 1670 ई के मध्य महाराष्ट्र राज्य में रची गई थी।
*5.आरती कीजै हनुमान लला की* बजरंगबली हनुमान की प्रसिद्ध आरती के रचयिता के संबंध में इतिहास और विद्वानों के बीच दो मुख्य मत प्रचलित हैं:
*I.. स्वामी रामानंद (14वीं-15वीं शताब्दी)* - सर्वाधिक स्वीकृत मत इतिहासकारों और अकादमिक विद्वानों के अनुसार, इस आरती के वास्तविक लेखक स्वामी रामानंदाचार्य (स्वामी रामानंद) हैं। इसकी रचना 14वीं या 15वीं शताब्दी के दौरान (अनुमानित 1350 से 1450 ईस्वी के बीच) मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के समय की गई थी। स्वामी रामानंद उत्तर भारत में रामभक्ति की धारा लाने वाले महान संत थे। उन्होंने ही वैष्णव सम्प्रदाय में हनुमान जी की इस प्रसिद्ध स्तुति को ब्रज और अवधी मिश्रित भाषा में लिखा था।
*II .गोस्वामी तुलसीदास (16वीं शताब्दी)* - जनश्रुति मत सनातन परंपरा और कई धार्मिक ग्रंथों में इसे गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना माना जाता है। माना जाता है कि इसकी रचना 16वीं शताब्दी (विक्रम संवत 1631 या 1574 ईस्वी के आसपास) में रामनवमी के दिन की गई थी। इसका प्रमाण यह है कि इस आरती की अंतिम पंक्तियों में स्पष्ट रूप से तुलसीदास जी का नाम आता है:
"लंक विध्वंस किये रघुराई। तुलसीदास स्वामी गाई॥"
*6.श्री राम स्तुति "श्री रामचन्द्र कृपालु भजमन"* महान संत और महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखी गई है। इसकी रचना 16वीं शताब्दी (अनुमानित वर्ष 1570 से 1600 ईस्वी के बीच) में की गई थी। यह प्रसिद्ध स्तुति मुख्य रूप से तुलसीदास जी द्वारा रचित काव्य ग्रंथ *'विनय पत्रिका'* से ली गई है. 'विनय पत्रिका' में यह 45वें पद के रूप में संकलित है।
*7. "अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली"*
यह मूल रूप से एक पारंपरिक लोक रचना है, जिसका कोई एक आधिकारिक लिखित रिकॉर्ड नहीं मिलता। सनातन परंपरा में इसे सदियों से मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक) गाया जाता रहा है।हालाँकि, आधुनिक इतिहास और मीडिया में इससे जुड़े दो महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं:
*I. पहली बार सार्वजनिक रूप से यह आरती पहली बार जन-जन तक आधुनिक रूप में वर्ष 1964 में पहुँची।जिसका माध्यम वर्ष 1964 में बनी धार्मिक हिंदी फिल्म *'नवरंग'* या कई रिकॉर्ड्स के अनुसार फिल्म 'नवरोज' / 'नवरात्रि' में इस आरती को शामिल किया गया था।इसके लेखक अथवा गीतकार भारत व्यास थे। जब इस पारंपरिक आरती को फिल्मी पर्दे पर लाया गया, तब इसके मूल लोक-गीत के शब्दों को तराशने और इसे व्यवस्थित रूप देने का श्रेय महान हिंदी कवि और गीतकार भरत व्यास को दिया जाता है।इस प्रसिद्ध फिल्मी संस्करण को महान संगीत निर्देशक *चित्रगुप्त* ने संगीतबद्ध किया था और इसे मोहम्मद रफी तथा आशा भोंसले ने अपनी आवाज दी थी।
*II. इस आरती का आध्यात्मिक इतिहास की या किसने लिखी (पारंपरिक मत): ग्रामीण उत्तर भारत के लोक-मानस और शाक्त परंपरा (दुर्गा/काली के उपासक संतों) द्वारा मध्यकाल या आधुनिक काल की शुरुआत में इसे रचा गया था। संगीत जगत के कुछ भजनों के क्रेडिट्स में इसके पारंपरिक संस्करण को व्यवस्थित करने का श्रेय गुरु जी राम लाल शर्मा या सरल कवि जैसे स्थानीय संतों को भी दिया जाता है।
*9. "गगन मै थाल रवि चंद दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती॥"*
सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी द्वारा रचित इस अमर आरती का नाम "गगन मै थाल" है। उन्होंने इसकी रचना वर्ष 1506 या 1508 में ओडिशा के पुरी स्थित प्रसिद्ध श्री जगन्नाथ मंदिर में की थी।इस दिव्य और ब्रह्मांडीय आरती के पीछे का इतिहास और मुख्य विवरण इस ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। गुरु नानक देव जी अपनी पहली धार्मिक यात्रा (जिसे 'उदासी' कहा जाता है) के दौरान पुरी के जगन्नाथ मंदिर पहुंचे थे।शाम के समय मंदिर के पुजारी भगवान जगन्नाथ की भव्य आरती की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने एक बड़ी थाली में जलते हुए दीये, फूल, धूप और मोती सजाए थे। पुजारियों ने गुरु नानक जी को भी इस आरती अनुष्ठान में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया।जब आरती शुरू हुई, तो गुरु नानक जी उस पारंपरिक थाली-दीपक की आरती में शामिल होने के बजाय मंदिर परिसर में ही बैठ गए और गहरे ध्यान में लीन हो गए।आरती का आध्यात्मिक संदेश जब पुजारियों ने उनसे पूछा कि वे आरती में क्यों खड़े नहीं हुए, तब गुरु नानक देव जी ने राग धनाश्री में इस शबद (भजन) का उच्चारण किया:
"गगन मै थाल रवि चंद दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती॥"
फिर इसका सरल अर्थ गुरु नानक जी ने समझाया कि उस अकाल पुरख (परमेश्वर) की आरती तो पूरी प्रकृति और ब्रह्मांड हर पल खुद कर रहे हैं। उसके लिए किसी छोटी इंसानी थाली की जरूरत नहीं है:आकाश (गगन) भगवान की विशाल आरती की थाली है।सूरज और चांद उस थाली में जलने वाले महा-दीपक हैं।ब्रह्मांड के अनगिनत तारे और नक्षत्र उस थाली में जड़े हुए अनमोल मोती हैं।मलय पर्वत से आने वाली सुगंधित हवा (मलययानलो) भगवान के लिए धूप का काम कर रही है।पूरी वनस्पति और जंगल के फूल प्रभु को अर्पित की गई मालाएं हैं। अतः यह हमारी प्राचीनतम आरती है।
नोट: यह दुर्लभ जानकारी आपको किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगी। इसके संग्रह के लिए मैने अनेकों श्रोतों से इसकी जानकारी एकत्रित की है। अतः आप इसे अवश्य पढ़ें।
धन्यवाद
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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
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