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जो है, जैसा है और जितना है, उसे वैसा ही प्रस्तुत करना सत्य : मुनि श्री समतासागर

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उत्तम सत्य धर्म को लेकर समतासागर जी महाराज ने कहा कि : जो है, जैसा है और जितना है, उसे वैसा ही प्रस्तुत करना सत्य : मुनि श्री समतासागर

Aditi News Team

Sun, Sep 20, 2026

जो है, जैसा है और जितना है, उसे वैसा ही प्रस्तुत करना सत्य : मुनि श्री समतासागर

कुण्डलपुर (दमोह)। दशलक्षण धर्म के पांचवें दिवस उत्तम सत्य धर्म की व्याख्या करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि सत्य केवल बोलने का विषय नहीं, बल्कि विचार, वचन और व्यवहार की प्रामाणिकता का नाम है। जो है, जैसा है और जितना है, उसे वैसा ही और उतना ही प्रस्तुत करना सत्य है। वस्तुस्थिति को बढ़ाकर, घटाकर या बदलकर प्रस्तुत करना असत्य है और असत्य अधर्म का कारण बनता है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जय कुमार जैन जलज ने बताया कि मुनि श्री ने सत्य को जीवन में उतारने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जिसकी वाणी में सत्य, व्यवहार में प्रामाणिकता, जिम्मेदारियों में ईमानदारी और दूसरों को अहित होंने से बचाने की भावना है, वही उत्तम सत्य धर्म की वास्तविक आराधना करता है।

मुनि श्री ने कहा कि दशलक्षण धर्म के प्रारंभिक चार धर्मों की साधना के बाद सत्य सहित आगे के धर्म आत्मकल्याण की दिशा में ले जाते हैं। सत्य जीवन का आधार है और क्षमा, नम्रता, ऋजुता तथा शुचिता जैसे धर्म भी सत्य की भूमि पर ही पुष्ट होते हैं। विचारों में सच्चाई, वचनों में सत्य और व्यवहार में ईमानदारी ही उत्तम सत्य धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है। जाने-अनजाने हुई भूल क्षमा की जा सकती है, लेकिन छल और झूठ व्यक्ति के विश्वास को समाप्त कर देते हैं।सत्य को व्यवहार से जोड़ते हुए उन्होंने सब्जी खरीदने वाले व्यक्ति और विक्रेता का उदाहरण दिया। दोनों ने एक-दूसरे को धोखा देने की योजना बनाई। खरीदार अंधेरे का लाभ लेकर कटा-फटा नोट चलाना चाहता था, जबकि विक्रेता खराब सब्जियां अंधेरे में बेच देना चाहती थी। दोनों अपने-अपने घर जाते समय इस बात से खुश थे कि उन्होंने दूसरे को ठग लिया। मुनि श्री ने कहा कि झूठों ने झूठों को धोखा दिया और दोनों खुश रहे—यही संसार का भ्रम है। वास्तव में दूसरे को धोखा देने के प्रयास में व्यक्ति स्वयं ही असत्य और भ्रम के जाल में फंस जाता है।उन्होंने कहा कि शास्त्रों में यथार्थ कथन को सत्य और असत् कथन को असत्य कहा गया है। इसलिए सत्य केवल शब्दों की शुद्धता नहीं, बल्कि यथार्थ जीवन जीने का नाम है। पूजन की पंक्तियों को व्यवहार में उतारना जरूरी है। कठोर, कर्कश और मर्मभेदी वचन भी सामने वाले के मन को चोट पहुंचा सकते हैं, इसलिए झूठ, परनिंदा और ऐसी वाणी का त्याग होना चाहिए जिससे किसी को पीड़ा या अहित पहुंचे।परनिंदा पर मुनि श्री ने कहा कि निंदा में क्षणिक आनंद भले मिल जाए, लेकिन उसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। आलोचना का वास्तविक अर्थ दूसरों के दोष गिनाना नहीं, बल्कि अपने अपराधों और दोषों को देखना है। दूसरे की निंदा को आलोचना समझना आत्मशुद्धि नहीं, बल्कि स्वयं के दोष बढ़ाने वाला व्यवहार है।सत्य धर्म को विश्वास और जिम्मेदारी से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि किसी ने विश्वासपूर्वक कोई अमानत या दायित्व सौंपा है तो उसे सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। संस्थाओं में समाज के विश्वास से दायित्व पाने वालों को स्वयं को मालिक नहीं, सेवक समझना चाहिए। समाज ने हमें सेवा का अवसर दिया है। सेवक सेवक होता है, मालिक नहीं। पदाधिकारी या ट्रस्टी के मन में जब मालिकियत का भाव आता है तो संस्था के मूल उद्देश्य प्रभावित होने लगते हैं। समाज की विरासत को सुरक्षित रखना और संस्था के उद्देश्य को आगे बढ़ाना ही सेवक का धर्म है।ईमानदारी का महत्व समझाने के लिए मुनि श्री ने सत्ययुग के लकड़हारे की कथा सुनाई। नदी में कुल्हाड़ी गिर जाने पर लकड़हारे ने सोने और चांदी की कुल्हाड़ियों को अपनी मानने से इनकार कर दिया और केवल अपनी लोहे की कुल्हाड़ी स्वीकार की। उसकी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर उसे तीनों कुल्हाड़ियां प्रदान की गईं।कलियुग की कथा के माध्यम से उन्होंने सत्य की सूक्ष्मता समझाते हुए कहा कि हर कथन का मूल्यांकन उसके अभिप्राय, परिस्थिति और परिणाम के आधार पर भी किया जाना चाहिए। नदी में पत्नी के गिर जाने पर जलदेवता ने पहले जलपरी को उसकी पत्नी बताकर सामने किया। व्यक्ति ने अपनी विवशता बताते हुए कहा कि एक पत्नी को संभालना ही कठिन है, तीन को कैसे संभालेगा। मुनि श्री ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि सत्य को केवल शब्दों से नहीं, उसके पीछे की भावना और परिस्थिति से भी समझना चाहिए।उन्होंने कहा कि मां सहज भाव से बच्चे से कभी कह देती है कि घर में लड्डू या कोई वस्तु समाप्त हो गई, जबकि बच्चा भी जानता है कि यह शाब्दिक अर्थ में पूरी तरह सच नहीं है। ऐसे कथन से किसी का अहित नहीं होता। इसके विपरीत ऐसा झूठ जिससे किसी परिवार पर संकट आए, किसी को नुकसान पहुंचे, आपत्ति-विपत्ति खड़ी हो या लोकापवाद फैले, गंभीर असत्य है। इसलिए ऐसी वाणी, जिससे हिंसा या किसी का अहित हो, सत्य धर्म के अनुकूल नहीं हो सकती।

मुनि श्री ने कहा कि संसार की अनेक वस्तुएं और परिस्थितियां अस्थायी हैं। उन्हें स्थायी सत्य मान लेना भी भ्रम है। वास्तविक सत्य वह है जो स्थायी और शाश्वत है। सत्य और धर्म की स्थापना के आदर्शों को पांडवों की विजय, सीता की प्रतिज्ञा और रामराज्य के प्रसंगों से समझा जा सकता है। भगवान महावीर का जीवन भी सत्य, अहिंसा और आत्मशुद्धि की इसी साधना का सर्वोच्च संदेश देता है।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

मुनि श्री समतासागर जी महाराज

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