शिव और शक्ति का महामिलन: महाशिवरात्रि का विराट दर्शन
(महाशिवरात्रि पर विशेष आलेख -सुशील शर्मा)
महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का वह महासंवाद है जहाँ जड़ और चेतन, पुरुष और प्रकृति, तथा शून्य और अनन्त का मिलन होता है। यह उस परम तत्व के जागरण की रात्रि है, जिसे हम 'शिव' कहते हैं। जब हम शिव और शक्ति के मेल की बात करते हैं, तो यह केवल पौराणिक कथाओं का विवाह प्रसंग नहीं, अपितु ब्रह्मांडीय ऊर्जा के एकीकरण का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सूत्र है।
*पौराणिक संदर्भ: वैराग्य और गृहस्थ का अनूठा संगम*
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, महाशिवरात्रि वह पुण्य तिथि है जब देवाधिदेव महादेव ने माता पार्वती के साथ विवाह कर वैराग्य से गृहस्थी की ओर कदम बढ़ाया था। शिव, जो श्मशान वासी हैं, दिगंबर हैं, और जिनके लिए संपूर्ण संसार एक स्वप्न मात्र है; वे जब शक्ति (पार्वती) के साथ जुड़ते हैं, तो संसार में सृजन का सूत्रपात होता है।
इस कथा का मर्म यह है कि शिव जो कि शुद्ध चेतना हैं, वे तब तक निष्क्रिय हैं जब तक उनके साथ शक्ति का योग न हो। शिव के साथ शक्ति का यह मेल ही अर्धनारीश्वर के रूप को सिद्ध करता है। पौराणिक ग्रंथों में इस रात्रि को शिव के प्राकट्य की रात्रि भी माना गया है, जब वे ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ जिसका न आदि था और न अंत।
*आध्यात्मिक आयाम: शून्य से अनन्त की यात्रा*
आध्यात्मिक धरातल पर महाशिवरात्रि का अर्थ अत्यंत गूढ़ है। शिव शब्द का अर्थ है "वह जो नहीं है।" यानी वह शून्य, वह अंधकार जिससे प्रकाश की उत्पत्ति होती है। महाशिवरात्रि फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आती है, जो मास की सबसे अंधेरी रात मानी जाती है। आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधक के लिए यह रात्रि अंधकार से प्रकाश की ओर नहीं, बल्कि अंधकार के भीतर छिपे प्रकाश को पहचानने की रात्रि है।
इस रात पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार की स्थिति में होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर (ऊर्ध्वगामी) गमन करती है। इसीलिए इस रात्रि में जागरण का विधान है। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठने और जागते रहने से साधक अपनी कुंडलिनी शक्ति को सहस्रार चक्र तक पहुँचाने का प्रयास करता है। यह शिव (परमात्मा) और शक्ति (कुंडलिनी) के मिलन का ही सूक्ष्म रूप है।
*शिव के प्रतीकों का आध्यात्मिक रहस्य*
महादेव का स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही गहरा उनका आध्यात्मिक अर्थ है। उनके धारण किए हुए प्रत्येक प्रतीक में जीवन के गूढ़ रहस्य छिपे हैं:
*त्रिशूल:* यह केवल एक अस्त्र नहीं, बल्कि प्रकृति के तीन गुणों सत्व, रज और तम का प्रतीक है। यह जीवन के तीन दुखों (दैहिक, दैविक और भौतिक) के शमन का सूचक है। त्रिशूल के तीन फलक भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी होने का प्रमाण देते हैं।
*डमरू:* डमरू का नाद उस ब्रह्मांडीय ध्वनि 'ओंकार' का प्रतीक है जिससे सृष्टि का सृजन हुआ। विज्ञान जिसे 'बिग बैंग' कहता है, आध्यात्म उसे शिव का डमरू नाद मानता है। यह समय की लय और जीवन की गतिशीलता को दर्शाता है।
*नाग (वासुकी):* शिव के गले में लिपटा सर्प यह दर्शाता है कि जो विषैला है, जो मृत्यु का प्रतीक है, उसे भी योग और संयम से आभूषण बनाया जा सकता है। यह हमारी 'कुंडलिनी' शक्ति का भी प्रतीक है जो मूलाधार से उठकर शिव (सहस्रार) की ओर गमन करती है।
*चंद्रमा और गंगा:* मस्तक पर चंद्रमा मन की शांति और शीतलता का प्रतीक है, जबकि जटाओं से बहती गंगा ज्ञान की अविरल धारा है जो अहंकार के ताप को धो देती है।
*भस्म और तीसरा नेत्र:* शरीर पर भस्म यह स्मरण कराती है कि यह नश्वर देह अंततः मिट्टी है। तीसरा नेत्र विवेक और अंतर्दृष्टि का प्रतीक है, जो काम और अज्ञान को भस्म कर सत्य का साक्षात्कार कराता है।
*सामाजिक संदर्भ: समानता और लोक-कल्याण का आदर्श*
महाशिवरात्रि का सामाजिक संदेश अत्यंत क्रांतिकारी है। शिव की बारात में कौन नहीं है? देवता, गंधर्व, यक्ष, भूत-प्रेत, पिशाच, पशु-पक्षी और उपेक्षित समाज। शिव का व्यक्तित्व यह सिखाता है कि जो समाज के द्वारा त्याग दिया गया है, जो बीभत्स है या जो मुख्यधारा से बाहर है, महादेव उसे भी सप्रेम स्वीकार करते हैं।
यह पर्व समाज में समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण है। शिव न तो वर्ण व्यवस्था को मानते हैं, न ही वे किसी विशेष वर्ग के देव हैं। वे पशुपति हैं, वे नीलकंठ हैं जो दूसरों के कल्याण के लिए विष का पान कर लेते हैं। महाशिवरात्रि हमें सिखाती है कि समाज का कल्याण तभी संभव है जब हम अपने भीतर के विष (ईर्ष्या, क्रोध, लोभ) को रोकें और अमृत (प्रेम, करुणा) का वितरण करें।
*वर्तमान संदर्भ: भागदौड़ के बीच 'ठहराव' की खोज*
आज के इस आपाधापी भरे युग में, जहाँ मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद और अपनी ही पहचान खोने के संकट से जूझ रहा है, महाशिवरात्रि एक ठहराव का माध्यम बनती है। वर्तमान परिदृश्य में शिव की प्रासंगिकता और बढ़ गई है:
*पर्यावरण और प्रकृति:*
शिव का अभिषेक जल, बेलपत्र और मिट्टी से होता है। वे प्रकृति के रक्षक हैं। महाशिवरात्रि हमें अपनी जड़ों और प्रकृति की रक्षा का संदेश देती है।
*मानसिक शांति:*
शिव 'ध्यान' के अधिष्ठाता हैं। आज की युवा पीढ़ी जो व्याकुल है, उसके लिए शिव का 'मौन' और 'ध्यान' आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है।
*लिंगभेद से परे:*
अर्धनारीश्वर का रूप आज के दौर में स्त्री-पुरुष समानता की सबसे बड़ी वैचारिक नींव है। यह सिखाता है कि हर मनुष्य के भीतर शिव (विवेक) और शक्ति (भावना) दोनों का संतुलन होना आवश्यक है।
*शिव और शक्ति: सृष्टि का संतुलन*
शक्ति के बिना शिव 'शव' के समान हैं। शक्ति ही वह प्रेरणा है जो शिव की चेतना को क्रियाशील बनाती है। यदि शिव शब्द हैं तो शक्ति अर्थ है। यदि शिव प्रकाश हैं तो शक्ति उसकी प्रखरता है। महाशिवरात्रि हमें याद दिलाती है कि हमारे जीवन में कर्म (शक्ति) और ज्ञान (शिव) का संतुलन ही सफलता की कुंजी है।
यह रात्रि केवल एक व्रत या पूजा का अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के अंधकार को मिटाकर शिवत्व को प्राप्त करने का संकल्प है। जब भक्त महादेव पर जल चढ़ाता है, तो वह वास्तव में अपनी इंद्रियों को शांत करने का प्रयास कर रहा होता है।
*मुक्ति का मार्ग*
महाशिवरात्रि का अर्थ है "शिव की महान रात्रि।" यह वह समय है जब ब्रह्मांडीय और व्यक्तिगत ऊर्जा का लय होता है। शिव का अर्थ कल्याण है, और शक्ति का अर्थ सामर्थ्य। जब कल्याण और सामर्थ्य एक साथ मिलते हैं, तभी महाशिवरात्रि का पर्व चरितार्थ होता है।
यह पर्व हमें संदेश देता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी विषम हों, चाहे हम विष के घूँट ही क्यों न पी रहे हों, यदि हम अपने भीतर के 'शिव' को जागृत रखते हैं, तो हम हर प्रलय को पार कर सकते हैं।
इस महाशिवरात्रि पर, क्या हम केवल मंदिर जाकर घंटा बजाएंगे, या अपने भीतर के उन विकारों को भी त्यागेंगे जो हमें शिव बनने से रोकते हैं? क्या हम समाज के उस अंतिम व्यक्ति को गले लगाने का साहस जुटा पाएंगे, जिसे शिव ने अपनी बारात में शामिल किया था?
*महाशिवरात्रि, शिव और शक्ति का जागरण*
फाल्गुन की गहनतम रात्रि में
जब आकाश अपने ही अंधकार में डूबा रहता है
और दिशाएँ मौन साध लेती हैं,
तभी कहीं भीतर
एक सूक्ष्म ज्योति जन्म लेती है।
वह ज्योति किसी दीपक की नहीं,
वह किसी तारे की भी नहीं,
वह चेतना की वह पहली कंपन है
जिसे ऋषियों ने शिव कहा।
शिव
अर्थात् वह जो शून्य है
और उसी शून्य से
अनन्त की सरिताएँ बह निकलती हैं।
महाशिवरात्रि
केवल कैलास का उत्सव नहीं,
यह आत्मा के हिमालय पर
ध्यान की हिमरेखा खींचने की रात्रि है।
जब वैराग्य
अपनी भस्म से लिपटा हुआ
श्मशान की निस्तब्धता से उठता है
और शक्ति
हिमगिरि की पुत्री बन
करुणा की गंगा लिए
उसके समीप आती है,
तब सृष्टि का प्रथम स्पंदन होता है।
वह मिलन
केवल विवाह नहीं,
वह प्रकृति और पुरुष का
आदिम आलिंगन है।
शिव बिना शक्ति
निष्पंद, निर्जीव, निर्विकार
ज्यों शब्द बिना अर्थ।
शक्ति बिना शिव
दिशाहीन प्रवाह
ज्यों नदी बिना तट।
दोनों का संग
अर्धनारीश्वर की दीप्ति बन
ब्रह्मांड के मध्य खड़ा हो जाता है,
स्मरण दिलाता हुआ
कि संतुलन ही सृष्टि का प्राण है।
त्रिशूल उठता है
और समय की तीन धाराएँ
एक ही कर में सिमट जाती हैं।
भूत की पीड़ा
वर्तमान की ज्वाला
भविष्य की आशंका
सब एक बिंदु पर स्थिर।
डमरू बजता है
और नाद की लहरें
शून्य को भर देती हैं।
कण कण में कंपन
जैसे सृष्टि अभी अभी जन्मी हो।
गले में लिपटा नाग
संकेत देता है
कि भय भी आभूषण बन सकता है
यदि साधना की अग्नि
उसे संस्कारित कर दे।
जटाओं से उतरती गंगा
मन के ताप को शीतल करती है,
मस्तक का चंद्र
अहंकार की धूप में
एक शीतल छाया रचता है।
भस्म लिपटा शरीर
कहता है
यह देह क्षणभंगुर है
पर चेतना अमर।
और जब तीसरा नेत्र खुलता है
तो केवल काम नहीं
अज्ञान भी भस्म हो जाता है।
इस रात्रि में
जागरण केवल नेत्रों का नहीं,
यह कुंडलिनी की धीमी चढ़ाई है
रीढ़ की सीढ़ियों से
सहस्रार के सूर्य तक।
ध्यानमग्न साधक
सीधा बैठा
अपने भीतर के विष को रोकता है।
नीलकंठ बनना
यही तो है
विकारों को पी जाना
और जगत को अमृत देना।
शिव की बारात में
देव भी हैं
और उपेक्षित भी।
भूत प्रेत
वनचर पशु
गंधर्व
सब एक साथ।
कौन है यहाँ अछूत
कौन है पराया।
महाकाल की दृष्टि में
सब एक ही नाद के अंश।
आज जब मनुष्य
अपने ही बनाए शोर में
अपनी धड़कन सुन नहीं पाता,
महाशिवरात्रि
उसे मौन का उपहार देती है।
भागती हुई सभ्यता के मध्य
एक ठहराव
एक गहन श्वास
एक अंतर यात्रा।
यह पर्व पूछता है
क्या तुमने अपने भीतर
शिव को पहचाना।
क्या तुमने अपनी शक्ति को
सम्मान दिया।
यदि शिव ज्ञान हैं
तो शक्ति कर्म है।
यदि शिव दीप हैं
तो शक्ति उसकी लौ।
दोनों का संतुलन ही
जीवन का महाकाल है
जो संहार भी है
और सृजन भी।
आओ
इस रात्रि
घंटों की ध्वनि से अधिक
अपने अंतर की प्रतिध्वनि सुनें।
मंदिर के बाहर से अधिक
मन के भीतर दीप जलाएँ।
अपने विष
ईर्ष्या
क्रोध
लोभ
सब शिवचरणों में अर्पित कर
प्रेम और करुणा की गंगा बहाएँ।
तभी यह रात्रि
वास्तव में महाशिवरात्रि होगी।
तभी शून्य से अनन्त तक
हमारी यात्रा पूर्ण होगी।
और तब
हर हृदय में
एक शांत, धैर्यवान,
जाग्रत महाकाल
मुस्कुराएगा।
शिव वंदना
त्रिपुरारि के सम्मुख झुक कर
अंतर के सब दंभ झरे हैं।
नीलकंठ की मौन तपस्या
विष पीकर भी करुणा जागे।
डमरू मध्य निनाद लहर में
अन्तस की सब पीड़ा भागे।
भस्म विभूषित अंग सदा शिव
राग विराग समत्व भरे हैं।
चंद्र कलाधर शंभु शशि से
मन की ज्वाला शीतल करते।
नयन तृतीय जगे जो भीतर
मोह अँधेरे कहाँ ठहरते।
कर्म बंध के जाल समूचे
शिव दृष्टि ने नित्य हरे हैं।
नाद ब्रह्म के स्रोत स्वयं तुम
श्वास श्वास में मंत्र भरे हैं।
पंचाक्षर की पावन ध्वनि से
जीवन के संदेह झरे हैं।
कैलासों के शिखर सुमंगल
अडिग तुम्हारे ध्यान धरे हैं।
भावन भूत विश्व प्रभु तुम हो
दीन हृदय के एक सहारे।
कालचक्र के बीच विराजे
शाश्वत जीवन ज्योति सितारे
शिव शिव जपते प्राण हमारे
चेतन से मन द्वार भरे हैं।
करुणाकर की कृपा दृष्टि से
कंटक पथ पर पुष्प भरे हैं।
त्रिपुरारि के सम्मुख झुक कर
अंतर के सब दंभ झरे हैं।
आप सभी को सपरिवार महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर सुमंगल कामनाएं
।
✒️ सुशील शर्मा