: दोहे (क्षण भंगुर जीवन)
दोहे
(क्षण भंगुर जीवन)
पल में बनती बात है, पल में बिगड़े खेल।
जीवन नदिया नाव है, कर धारों से मेल।।
काया माटी का महल, साँसों की है डोर।
टूटेगी जब डोर यह, छूटेगा यह ठौर।।
धन दौलत यह राज सब, सपने जैसे जान।
जागोगे जब अंत में, होगा खाली स्थान।।
जीवन के इस साज पर, मत कर तू अभिमान।
चक्र घूमता काल का, मिट्टी मिलती शान।
पत्ते गिरते पेड़ से,थम जाता है शोर।
वैसे ही यह जिंदगी, क्षण भंगुर की भोर।।
जी लो अपनी जिंदगी, नहिं कल का है ठौर।
हँस कर ही जीवन जियो, बड़ा कठिन है दौर।।
बांध कर्म की पोटली, जाएगी जो साथ।
मिट्टी में तन यह मिले , छूटेंगे सब हाथ।।
मत माया में तू उलझ, यह तो है उलझाव।
जीवन को ऊँचा करें, बस मन के सद्भाव।।
पानी का है बुलबुला, क्षण भंगुर है श्वास ।
क्यों इतना अभिमान है,कुछ नहिं तेरे पास।।
प्रेम करुण मन रख सदा, कर जीवन से प्यार।
बाकी सब झूठा यहाँ, यह संसार असार।।
✒️सुशील शर्मा✒️
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