माँ बस माँ होती है
(एक कविता - सुशील शर्मा)
वो थकी नहीं कभी,जब मैं थक करउसकी गोद में सो गया। उसके हाथों में चूल्हे की राख थी,पर माथे पर चाँदनी थी,जिसे वो हर रात मेरी नींदमें रख आती थी। माँवो शब्द नहीं,जिसे बोला जाए,वो स्पर्श है,जिसे महसूस किया जाता हैजब जीवन हमें चोट करता है। जब दुनिया ने पूछा कौन है तुम्हारे साथ?मैंने कुछ नहीं कहा,पर भीतर कोईहाथ पकड़ चुका था…सहारा दे चुका था। वो हर सुबह मेरे लिए अपनेहिस्से की रोटी भूल जाती थी,हर शाम मेरी थकानअपने सिर पर बाँध लेती थी। उसकी प्रार्थनाएँ मेरी राह मेंचुपचाप बिछ जाती थीं,रोक लेती हैं उन बद्दुआओं कोजो मेरी ओर तूफान बन करआती हैंएक कवच जो बिछ जाता हैमेरी सुरक्षा में,मेरे व्यक्तित्व के चारों ओर।आँसू कभी मेरीआँखों में नहीं आने दिए उसने।उसका नेह वात्सल्य शोख लेता है हर आँसू को। अब जब मैं लौटता हूँ,वो दरवाज़े पर नहीं होती,वह कर रही होती है घर केवो सब काम जिनमें मैंहोता हूँ शामिलपर हर आहट में,हर खुशबू में,हर अधूरी नींद मेंमैं माँ को पाता हूँ। कभी-कभी लगता है,मैंने ईश्वर को नहीं देखा,पर जब भी माँ की झुर्रियों को छुआ,वो स्पर्श किसी आशीर्वाद जैसा लगा। माँ अब भी वहीं है,जहाँ से उसने मुझे जीवन में भेजा थाप्रेम के सबसे गहरे कोने में।उसका झुर्रियों वाला शरीरअब भी मुझे समझता हैएक शिशु।एक शिशु जो उसके अस्तित्वसे निकल कर फैला हैवृक्ष की तरहपर इस वृक्ष की जड़ेंआज भी पोषित हैंमाँ के वात्सल्य से। ✒️
सुशील शर्मा
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माँ – एक अनकही प्रार्थना*
(आलेख - सुशील शर्मा)
माँ की व्याख्या मेरे बस में तो नहीं पर कुछ टूटे फूटे शब्द हैं जिसे तुतलाती भाषा में उसका आँचल पकड़ कर कह रहा हूँ।कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, स्पर्श से बँधते हैं। कुछ प्रेम आँखों से नहीं, निशब्द त्याग से प्रकट होते हैं। माँ यह कोई नाम नहीं, यह एक संपूर्ण भावना है, जो जीवन की हर पीड़ा पर मरहम बनकर उतरती है। जब हम पहली बार सांस लेते हैं, उस पल हमारे अस्तित्व का जो सबसे पहला और सबसे गहरा सम्बन्ध बनता है, वह माँ से होता है। वह हमारी पहली भाषा होती है, पहला स्पर्श, पहला संगीत। हमारी धड़कनों से पहले उसकी चिंता की धड़कनें जन्म लेती हैं। माँ के आँचल में छुपा था वह ब्रह्मांड, जिसमें डर भी सुरक्षित लगता था। जब बुखार में हम तपते थे, तब माँ का हाथ माथे पर ठंडी चाँदनी बन जाता था। जब परीक्षा में नंबर कम आए, तो वही माँ थी जो आँसू पोंछते हुए कहती "कमी नंबरों में नहीं, इस दुनिया की समझ में है बेटा!" माँ का त्याग कभी मुखर नहीं होता। वह रातभर जागती है, पर थकान उसकी आँखों में नहीं, हमारी सलामती में छुपी होती है। वह खुद भूखी रह जाती है, पर हमारी थाली कभी खाली नहीं रहने देती। उसके प्रेम का कोई शोर नहीं होता, पर वह हर कोने में प्रतिध्वनित होता है। समय के साथ हम बड़े हो जाते हैं, माँ छोटी हो जाती है। उसकी कमर झुक जाती है, पर हमारी ऊँचाई पर गर्व करती आँखें आज भी सीधी रहती हैं। किस तरह माँ इस दुनिया के बियाबान में औलाद को पालती है ,किस तरह एक एक दाना उनके मुँह में डाल कर चुगाती है,और फिर बच्चे फुर्र उड़ जाते है उसे अकेला छोड़ कर।हम दुनिया की बातों में उलझ जाते हैं, वह आज भी हमारे खाने-पीने, ओढ़ने-बिछाने की फिक्र करती रहती है। माँ कोई स्थान नहीं छोड़ती, पर हम कई बार उसे पीछे छोड़ देते हैं ,शहर की भीड़ में, अपने सपनों की दौड़ में। और फिर एक दिन, जब माँ की उँगलियाँ शिथिल हो जाती हैं, और उसका झुर्रियों भरा चेहरा नज़रों से ओझल हो जाता है, तब समझ आता है कि हमने जीवन की सबसे बड़ी कविता को कभी ध्यान से पढ़ा ही नहीं। माँ कोई व्यक्ति नहीं, वह एक प्रार्थना है, जो जीवन भर हमारे लिए मौन जप करती रहती है।वह वह सूरज है, जो हमारे अंधेरों को अपने भीतर छुपा लेता है। आज भी जब कोई दुःख घेर लेता है, तो अनायास मन कह उठता है"माँ!"शायद इस एक शब्द में ही संपूर्ण जीवन की शांति छुपी है। ✒️
सुशील शर्मा
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