भाषा: संवाद का सेतु, विवाद की दीवार नहीं
(आलेख - सुशील शर्मा)
आशुतोष राणा का यह कथन कि "भाषा संवाद का विषय होती है विवाद का नहीं" एक गहरा और सामयिक सत्य है, विशेषकर भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में। भारत, भाषाओं का एक गुलदस्ता है जहाँ हर कुछ किलोमीटर पर बोली और लहजा बदल जाता है। यह भाषाई विविधता हमारी संस्कृति की पहचान है, लेकिन दुर्भाग्यवश, कई बार यही विविधता विवाद और वैमनस्य का कारण बन जाती है, खासकर महाराष्ट्र और अन्य प्रदेशों में उठे भाषा विवादों के संदर्भ में।*भाषा: अभिव्यक्ति का माध्यम और सांस्कृतिक पहचान*मूल रूप से, भाषा संवाद का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। यह हमें अपने विचारों, भावनाओं, ज्ञान और अनुभवों को दूसरों तक पहुँचाने में सक्षम बनाती है। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक पूरी संस्कृति, इतिहास और जीवनशैली का प्रतिबिंब होती है। लोगों के लिए अपनी मातृभाषा अपनी पहचान और जड़ों से जुड़ाव का प्रतीक होती है। यह भावनात्मक सुरक्षा और अपनेपन की भावना प्रदान करती है।जब भाषा विवाद का कारण बनती हैसमस्या तब उत्पन्न होती है जब भाषा संवाद का साधन न रहकर श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा या अहंकार का प्रतीक बन जाती है। जब एक भाषा को दूसरी भाषा से श्रेष्ठ मान लिया जाता है, या जब भाषाई पहचान को राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पहचान से ऊपर रखा जाता है, तो विवादों का जन्म होता है। महाराष्ट्र और अन्य भारतीय राज्यों में ऐसे कई उदाहरण देखे जा सकते हैं:*महाराष्ट्र में भाषा विवाद:*महाराष्ट्र में हिंदी और मराठी भाषा को लेकर अक्सर विवाद उठते रहे हैं।* *मराठी अस्मिता:* महाराष्ट्र में मराठी भाषा को राज्य की पहचान और गौरव का प्रतीक माना जाता है। यहाँ अक्सर यह माँग उठती रहती है कि राज्य में सभी जगह, विशेषकर सार्वजनिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में, मराठी का प्रयोग अनिवार्य किया जाए। यह भावना तब और प्रबल हो जाती है जब मुंबई जैसे महानगरों में गैर-मराठी भाषी आबादी का प्रभाव बढ़ता है, और ऐसा महसूस किया जाता है कि मराठी को उसका उचित स्थान नहीं मिल रहा है।* *गैर-मराठी भाषियों का विरोध:*कई बार, अन्य राज्यों से आए हिंदी भाषी या अन्य भाषाई समुदायों को मराठी भाषा को अपनाने या उसके वर्चस्व को स्वीकार करने में कठिनाई महसूस होती है। रोजगार, व्यवसाय और शिक्षा के अवसरों में भाषा को लेकर भेदभाव के आरोप भी लगते हैं। शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) जैसे दल भाषाई अस्मिता को एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाते रहे हैं, जिससे भाषाई आधार पर अक्सर तनाव और कभी-कभी हिंसा भी भड़की है।*अन्य प्रदेशों में भाषा विवाद:*महाराष्ट्र अकेला नहीं है। भारत के कई अन्य राज्यों में भी ऐसे विवाद देखने को मिलते हैं:* *दक्षिण भारत में हिंदी विरोध:*तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में हिंदी को 'उत्तर भारत की भाषा' मानकर उसका तीव्र विरोध किया जाता रहा है। यहाँ तमिल अस्मिता इतनी प्रबल है कि हिंदी को थोपे जाने के किसी भी प्रयास को सांस्कृतिक अतिक्रमण के रूप में देखा जाता है। इतिहास में हिंदी विरोधी आंदोलनों ने हिंसक रूप भी लिया है।* *पूर्वोत्तर भारत में भाषाई संघर्ष:*असम, मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में भी विभिन्न जातीय और भाषाई समूहों के बीच अपनी-अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष होते रहे हैं। बंगाली और असमिया, या विभिन्न जनजातीय भाषाओं के बीच श्रेष्ठता और पहचान के विवाद अक्सर सामने आते हैं।*पंजाब और हरियाणा में हिंदी-पंजाबी:*पंजाब और हरियाणा के बीच भी भाषाई सीमांकन और वर्चस्व को लेकर सूक्ष्म विवाद रहे हैं।*विवाद का मूल:*विवाद का मूल भाषा नहीं, बल्कि संकीर्णता और असुरक्षाइन सभी विवादों में, भाषा स्वयं समस्या नहीं है। समस्या मनुष्य की संकीर्ण सोच, असुरक्षा की भावना और अपनी पहचान को दूसरों से श्रेष्ठ साबित करने की लालसा में निहित है।* *असुरक्षा की भावना:*जब एक भाषाई समूह को लगता है कि उसकी भाषा और संस्कृति खतरे में है, या उसे उचित सम्मान नहीं मिल रहा है, तो उसमें असुरक्षा की भावना जन्म लेती है। यह असुरक्षा अक्सर आक्रामक राष्ट्रवाद या क्षेत्रीयता में बदल जाती है।* *संसाधनों पर नियंत्रण:*कई बार भाषा विवाद के पीछे आर्थिक और राजनीतिक कारण भी होते हैं। भाषा को रोजगार, शिक्षा और सत्ता में हिस्सेदारी के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे भाषाई समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है।* *राजनीतिक लाभ:*नेता अक्सर भाषाई भावनाओं को भड़काकर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करते हैं। वे भाषा को एकता के बजाय विभाजन के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जिससे तनाव बढ़ता है।* *अज्ञानता और पूर्वाग्रह:* विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के प्रति अज्ञानता और पूर्वाग्रह भी विवादों को जन्म देते हैं। जब हम दूसरों की भाषा और उसके महत्व को नहीं समझते, तो हम उन्हें कमतर आंकते हैं या उन पर अपनी भाषा थोपने का प्रयास करते हैं।*भाषा को संवाद का सेतु कैसे बनाएँ?*आशुतोष राणा के विचार को मानते हुए, हमें भाषा को विवाद की दीवार बनाने के बजाय, संवाद का सेतु बनाना सीखना होगा। इसके लिए कुछ बातों पर ध्यान देना आवश्यक है:* *बहुभाषावाद का सम्मान:*हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारत में अनेक भाषाएँ हैं और सभी का अपना महत्व है। किसी भी भाषा को श्रेष्ठ या हीन मानना गलत है।* *अपनी भाषा पर गर्व, दूसरों का सम्मान:*हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व होना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम दूसरों की भाषाओं का अनादर करें। हर भाषा एक संस्कृति का खजाना है।* *सीखने की इच्छा:*यदि संभव हो, तो हमें अन्य भाषाओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। यह न केवल संवाद को आसान बनाता है, बल्कि विभिन्न संस्कृतियों को समझने में भी मदद करता है।* *लचीलापन और सहिष्णुता:*सार्वजनिक और व्यावसायिक स्थानों पर भाषाई लचीलापन दिखाना चाहिए। जहाँ तक संभव हो, विभिन्न भाषाओं के लोगों के लिए सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिए।* *शिक्षा में संतुलन:*शिक्षा प्रणाली में सभी भाषाओं को उचित स्थान मिलना चाहिए। किसी एक भाषा को अनावश्यक रूप से थोपने का प्रयास नहीं करना चाहिए।*संवाद और समझ को बढ़ावा:* विभिन्न भाषाई समूहों के बीच संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे एक-दूसरे के प्रति समझ और सम्मान विकसित कर सकें। आशुतोष राणा का कथन एक शक्तिशाली अनुस्मारक है कि भाषा एक उपकरण है, और उसके उपयोग की जिम्मेदारी हमारी है। यह संवाद का एक सुंदर माध्यम हो सकती है जो हमें जोड़ता है, या यह संकीर्णता और अहंकार के कारण विवाद की एक भयंकर दीवार बन सकती है। महाराष्ट्र और अन्य प्रदेशों में भाषा विवाद इस बात का प्रमाण हैं कि जब हम अपनी पहचान को लेकर असुरक्षित हो जाते हैं या अपनी भाषा को श्रेष्ठता का प्रतीक बना लेते हैं, तो कैसे सद्भाव टूट जाता है।यदि हम वास्तव में भाषाई विविधता को अपनी ताकत बनाना चाहते हैं, तो हमें भाषाई श्रेष्ठता की लालसा और अहंकार को त्यागना होगा। हमें भाषा को एक ऐसे माध्यम के रूप में देखना होगा जो हमें एक-दूसरे से जोड़ता है, न कि एक हथियार के रूप में जो हमें अलग करता है। तभी भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में सच्चा सौहार्द और प्रगति संभव होगी।
सुशील शर्मा