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श्रम का सम्मान पद-प्रतिष्ठा से नहीं, मेहनत और सेवा से होता है

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निर्यापक श्रमण मुनि समतासागर जी ने कहा कि : श्रम का सम्मान पद-प्रतिष्ठा से नहीं, मेहनत और सेवा से होता है

Aditi News Team

Sun, Sep 27, 2026

श्रम का सम्मान पद-प्रतिष्ठा से नहीं, मेहनत और सेवा से होता है : निर्यापक श्रमण मुनि समतासागर जी

कुण्डलपुर(म.प्र.)। बड़े बाबा की अतिशय नगरी कुण्डलपुर में आयोजित दशलक्षण संस्कार शिविर के समापन समारोह में साधना के साथ सेवा, त्याग, समर्पण और श्रम के सम्मान का संदेश प्रमुखता से सामने आया। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति का महत्व उसके पद, प्रतिष्ठा या आर्थिक योगदान से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और सेवा से होता है। समाज और आयोजन के लिए निस्वार्थ भाव से श्रम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है।

मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि दानदाता हो अथवा न हो, आयोजन में छोटा से छोटा व्यक्ति भी यदि अपनी क्षमता के अनुसार मेहनत कर रहा है तो उसके श्रम का सम्मान होना चाहिए। अनेक कार्यकर्ता पर्दे के पीछे रहकर बिना किसी अपेक्षा के अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। दूसरों की सुविधा और आयोजन की सफलता में अपनी खुशी देखना ही सच्ची सेवा भावना है। उन्होंने कार्यकर्ताओं के त्याग की तुलना घराती से करते हुए कहा कि जिस प्रकार घराती बरातियों की व्यवस्था करते-करते कई बार स्वयं भोजन से वंचित रह जाता है, उसी प्रकार आयोजन के कार्यकर्ता भी दूसरों की सुविधा के लिए अपनी सुविधा पीछे कर देते हैं। सबकी व्यवस्था अच्छी हो जाए और आयोजन सफल हो जाए, यही उनके लिए सबसे बड़ा संतोष होता है।

संघस्थ मुनि श्री पवित्र सागर जी महाराज ने कहा कि परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं होतीं। साधक को प्रतिकूल परिस्थितियों में भी चित्त को शांत और स्थिर रखते हुए पुरुषार्थ करना चाहिए। दशलक्षण महापर्व केवल दस दिनों की धार्मिक साधना नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित करने का अवसर है। इन दिनों ग्रहण किए गए संयम और सद्गुणों को पर्व के बाद भी जीवन में बनाए रखना ही साधना की सार्थकता है। उन्होंने खान-पान की शुद्धता और घर की रसोई के संस्कारों पर जोर देते हुए कहा कि भोजन का प्रभाव केवल शरीर पर नहीं, बल्कि परिवार के वातावरण और संस्कारों पर भी पड़ता है। इसलिए शुद्धता, संयम और अच्छे संस्कारों की शुरुआत घर से होनी चाहिए।

प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि समापन समारोह में शिविर की व्यवस्थाओं में दिन-रात जुटे कार्यकर्ताओं, शिविरार्थियों और तपस्वियों का कुण्डलपुर तीर्थक्षेत्र कमेटी के पदाधिकारियों ने सम्मान किया। दस उपवास से लेकर छह और तीन उपवास करने वाले तपस्वियों को भी सम्मानित किया गया। संचालन ब्रह्मचारी भैया धीरज राहतगढ़ अनूप भैया ने किया।

दशलक्षण संस्कार शिविर में प्रातः 5 बजे से देर रात तक प्राणायाम, अभिषेक-शांतिधारा, पूजन, प्रवचन, तत्त्वार्थ सूत्र वाचन और स्वाध्याय सहित विभिन्न धार्मिक गतिविधियां हुईं। सायंकाल आचार्य भक्ति, आरती और ‘समता समाधान’ कार्यक्रम में मुनि श्री समतासागर महाराज ने शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। धार्मिक तंबोला, जैन धर्म क्विज, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और नाट्य मंचन ने भी शिविरार्थियों को धर्म और संस्कार से जोड़े रखा।

शिविर में देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। आचार्य श्री विद्यासागर जीवदया केंद्र भातकुली, अमरावती के स्वयंसेवकों ने भोजनशाला में सेवा दी। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की जन्मभूमि सदलगा, कर्नाटक से भी अनेक शिविरार्थी पहुंचे। कुण्डलपुर में चातुर्मासरत मुनि संघ के गृहस्थ जीवन के परिजन भी शिविर में सहभागी बने।

इस अवसर पर श्री विद्या समता फाउंडेशन ट्रस्ट की घोषणा फाउंडर सदस्य गोवर्धन जी पांड्या, वर्धा, महाराष्ट्र द्वारा की गई। ट्रस्ट के माध्यम से जीवदया, शिक्षा छात्रवृत्ति, साधु-संघ गुरु सेवा और मीडिया प्रसारण सहित विभिन्न सेवा कार्यों में राशि का उपयोग किया जाएगा। शिविरार्थियों ने भी अपनी लक्ष्मी का सदुपयोग करते हुए ट्रस्ट के लिए राशि घोषित की।

समापन समारोह में मुनि श्री समतासागर महाराज के गृहस्थ जीवन के 95 वर्षीय पिता श्रेष्ठी श्री राजाराम जी, नन्ही देवरी, सागर भी विशेष रूप से उपस्थित रहे। वे शिविर के दौरान प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा और पूजन के साथ बड़े बाबा का अभिषेक कर मुनि संघ को आहार दे रहे हैं तथा स्वयं व्रत-उपवास कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत से लेकर सात प्रतिमा तक के व्रत ग्रहण किए हैं। डोंगरगढ़ में आचार्य श्री को अंतिम आहार देने और उनकी संलेखना समाधि के दर्शन का अवसर मिलने को उन्होंने अपने जीवन का सौभाग्य बताया।

शिविर की विशेषता यह भी रही कि साधना में विभिन्न आयु वर्ग के श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। सुबह से रात तक चलने वाले अनुशासित कार्यक्रमों ने धर्म के साथ सामूहिक सेवा और संस्कार की भावना को मजबूत किया। समापन समारोह में श्रद्धालुओं ने सेवाभावी कार्यकर्ताओं का तालियों से उत्साहवर्धन किया। कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष चंद्रकुमार सराफ, महामंत्री आरके जैन, अशोक सराफ, नेमकुमार सराफ पदमचंद खली, संजय कुबेर, जयकुमार जलज, अजय निरमा, राजेंद्र भेड़ा, अमित त्यागी, अमित डीको सराफ, अखिलेश फट्टा ,बबलू बाहुबली सहित कुण्डलपुर क्षेत्र पदाधिकारी सदस्य व्यवस्था में संलग्न रहे।

समारोह का सार यही रहा कि दशलक्षण की साधना केवल दस दिनों तक चलने वाला धार्मिक क्रम नहीं, बल्कि जीवन में संयम, सेवा, त्याग और सदाचार को स्थायी रूप से उतारने का अवसर है। जब साधना व्यवहार में दिखाई देने लगे और दूसरों की सुविधा के लिए किया गया श्रम आनंद का कारण बने, तभी धर्म जीवन को संस्कारित करने में सफल होता है।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

निर्यापक श्रमण मुनि समतासागर जी

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