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: मैं रावण बोल रहा हूँ , मुझे बुरा कहने वालो कभी अपनी आत्मा में भी झांककर तो देखो

Aditi News Team

Wed, Oct 5, 2022
मैं रावण बोल रहा हूँ (पं.सुशील शर्मा )  राम और मैं रामायण के सबसे ऊर्जावान चरित्र हैं।भले ही मेरा चरित्र सबको नकारात्मक ऊर्जा से भरा लगता है और राम का चरित्र सकारात्मक ऊर्जा का पुंज।हम में से किसी ने भी एक दूसरे से व्यक्तिगत दुश्मनी नही की। हमारे बीच युद्ध की शुरुआत शूपर्णखा और लक्ष्मण के वाद विवाद के साथ शुरू हुई और इस महान युद्ध के उत्प्रेरक के रूप में फिर और कई बातें जुड़ती गई।हमारे बीच लड़ाई व्यक्तिगत से कहीं अधिक यह अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई थी। आप सब इस बात से सहमत होंगे कि मैं राम से ज्यादा विद्वान पारंगत और शक्तिशाली था । मैं राम से ज्यादा धनवान था।मेरे पास राम से ज्यादा साहस बुद्धि संकल्प विद्या राजनीतिक समझ थी।राम से बड़ा कुटुंब था शक्तिशाली सेना थी सीता के समान ही सती सावित्री मेरी पत्नी मंदोदरी थी लेकिन फिर भी मैं यह युद्ध हार गया। आज आपको इस का मुख्य कारण बताता हूँ ।वो कारण था राम का चरित्रवान होना। आपको शायद गलतफहमी हो कि मैंने सीता के सतीत्व को तोड़ने की कोशिश की लेकिन ऐसा नही है मैंने सिर्फ अपनी बहिन के अपमान का बदला लेने उनका अपहरण किया था।मुझे राम की शक्ति पर कोई संदेह नही था लेकिन मैं अपनी बहिन के अपमान को लेकर चुप भी नही बैठ सकता था। मैं माया का शिकार था स्वर्ण नगरी लंका और तीनों लोकों के स्वामी होने का भ्रम था। सत्ता और सामर्थ्य अच्छे अच्छे ज्ञानी को मदांध बना देता है। मुझे एक राजा का फर्ज निभाना चाहिए था अपनी बहिन को समझाना चाहिए था किन्तु बहिन की कटी हुई नाक मुझे अंदर तक उद्वेलित कर गई और मैंने अपनी विनीत बहन के साथ खड़ा होने का फैसला किया, मैंने एक राजा की जगह एक भाई की भूमिका निभाई। मेरी न केवल एक राजा के रूप में विफलता थी, बल्कि बुराई की पहली सीढ़ी पर एक कदम भी। बुराई का दूसरा कदम मैंने तब उठाया जब अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के दौरान मैं अहंकारी बन गया।मैंने धर्म की भावना खो दी। क्रोध का गुलाम बन कर नीचे गिर गया और इस प्रक्रिया में मैंने कई पाप किए, इनमें से एक जटायु की हत्या थी।मुझे मालूम है और शास्त्रों में उल्लेख है कि आप की तुलना में अगर कोई कमजोर है तो उसे मारना "शक्ति का दुरुपयोग" है। इसलिए, हथियारहित, बच्चे, बूढ़े या जानवर और पक्षियों को मारना एक पाप है । मुझे मालूम है राम मुझे पसंद करते थे मेरा सम्मान भी करते थे।उन्होंने मुझ से शिवाभिषेक कराया लक्ष्मण को राजनीति की शिक्षा लेने भेजा।युद्ध के पहले और बाद में भी कई शांति प्रस्ताव भेजे किन्तु मेरा अहंकार मौत चुन चुका था। मुझे बुरा कहने के तो आपके पास कई कारण हैं लेकिन आप लोग तो राम को भी बुरा कहने से नही चूकते। राम ने कभी सीता पर शक नहीं किया; अगर राम ने सीता पर संदेह किया होता तो, तो वह उन्हें अपने साथ अयोध्या क्यों लाये होते उन्हें वही छोड़ दिया होता। यहाँ पर बात राजधर्म निभाने की है।राजा होने के नाते, राम को अपनी निजी भावनाओं को पीछे छोड़कर लोगों द्वारा कसौटी पर खरा उतरना था। एक महिला एक सबसे बड़ी ताकत बन सकती है; और वही एक आदमी की सबसे बड़ी कमजोरी हो सकती है अयोध्या के लोग यह जानना चाहते थे कि उनकी रानी ने राजा को धोखा दिया था या नहीं, प्रजा यह जांचने की कोशिश कर रही थी कि क्या रानी राजा की ताकत है या कमजोरी। राम ने चीजों से पलायन करने के स्थान पर चीजों को सही साबित करने की चुनौती को स्वीकार किया।राम जानते थे कि प्रजा को यह समझने का अधिकार है कि क्या वे सही राजा के हाथों में थे या नही या उनके प्रति राजा उत्तरदायी है या नही। सीता की अग्नि परीक्षा एक प्रतीकात्मक संदेश था कि राजधर्म से ऊपर कोई भी नही है भले वह स्वयं राजा क्यों न हो। भारत के वर्तमान संदर्भों की चर्चा करना शायद सबसे ज्यादा प्रासंगिक है।आप सभी मुझे बुरा कहते हो क्या कभी अपनी आत्मा में आप लोंगो ने झांका है।आप लोगों के अस्तित्व की विसंगतियों की तुलना की जाए तो मैं बहुत पाक साफ नजर आऊंगा। मैंने तो अपने आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ी भले ही आप लोग उसे गलत कहें आप लोग तो सरे आम आत्मसम्मान को बेंच देते है।चंद टुकड़ों में अपने देश की इज्जत आबरू दुश्मन को बेच रहें है। मैंने कभी भी राजनीति में भावनाओं को स्थान नही दिया अपने निर्णय स्वयं लिए हैं लेकिन आज राजनीति के निर्णय सिर्फ वोट बैंक के आधार पर होते हैं। मेरे राज्य में चारों ओर स्वर्ण साम्राज्य था कोई भूखा नही था ।आज भूख कुपोषण चारो ओर फैला है। मैंने सीता का अपहरण सिर्फ़ बहिन का बदला लेने के लिए किया था और सिर्फ डराया धमकाया था।कभी भी छूने की कोशिश नही की।आज सरे राह पांच साल की बेटियों का बलात्कार किया जा रहा है।तब बताइए रावण श्रेष्ठ है या आज का मानव। मैंने तो अपने देश और समाज के लिए अपने कुल को भी कुर्बान कर दिया।अपने देश पर आक्रमण करने वाले से अंतिम समय तक लड़ा और आप लोग क्या कर रहे है।शत्रुदेश के आतंकियों को पनाह दे रहे है।अपनी देश के लिए मैं सपरिवार कुर्बान हो गया क्या आप की सोच अपने देश के प्रति ऐसी है।जिस दिन ये सोच हो जाये तब तुम मुझे बुरा कहने के हकदार हो। मैं चाहता तो राम को सीता लौटा कर क्षमा मांग कर स्वर्ग पा सकता था किंतु मैंने अपने स्वाभिमान जिसे आप लोग मेरा अभिमान कहते हो से समझौता नही किया और साक्षात ईश्वर से भी लड़ बैठा।क्या आप के अंदर इतना साहस है।जिस दिन इतना साहस आ जाये तो मुझे बुरा कहने के हकदार हो। नवदुर्गा मैं कन्याओं को पूजते हो और भ्रूण में ही उनकी हत्या कर देते हो,सड़कों पर लावारिस छोड़ देते हो उनसे बलात्कार करते हो और फिर भी मुझे जलाते हो।क्या आप लोगों को हक़ है इसका। मुझे बुराइयों अहंकार पाप और न जाने किन किन गालियों से आप लोग नवाजते हो,अपने गिरहवान में झांक कर देखना उसमें कई रावण एक साथ दिखेंगे। हर साल आप सभी मुझे अहंकार, बुराई, क्रोध, आवेग आदि के विनाश के प्रतीक के रूप में जलाते हैं। मुझे दशहरा पर बुराई के अंत और भलाई की विजय के संकेत के रूप जलाया जाता है।ताकि आप सब ये सबक सीख सकें कि आप कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों आप अगर दुराचरण करेंगे तो आपका पतन निश्चित है। "आप सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं"

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