: गणगौर का पावन पर्व उत्साह के साथ मनाया गया , नगर में तीन दिन शोभा यात्रा निकाली जायेगी
Fri, Apr 12, 2024
गणगौर का पावन पर्व उत्साह के साथ मनाया गया
नगर में तीन दिन शोभा यात्रा निकाली जायेगी
गाडरवारा । नगर में राजस्थानी, मारवाड़ी परिवार की महिलाओं ने उत्साह और उमंग के साथ त्रिदिवसीय गणगौर का पावन पर्व पहले दिन मनाया गया जो दो दिनों तक और चलेगा ।गायत्री नगर विध्युत मंडल कालोनी में बृजमोहन बंसत जोशी (श्री कन्नू महाराज) के यहाँ अनेक वर्षों से चली आ रही गणगौर पूजा महिलाओं ने लोकपरम्पराओ के संवर्धन की दिशा में प्रफुल्लित मनोभाव के साथ की गई और शाम को शोभा यात्रा भी निकाली गई /जिसमें स्थानीय मारवाड़ी महिलाओं विशेषकर नवविवाहित महिलाओं ने उत्साह से शामिल हुई।
प्रसंग विवरण - -
भारत विविध त्योहारों का देश है। इसमें विभिन्न राज्यों और उनकी संस्कृति के रंग भरे हुए हैं। एक कहावत है “सात वार और नौ त्यौहार” अर्थात सप्ताह में केवल 7 दिन होते हैं लेकिन त्यौहार नौ होते हैं। गणगौर या गौरी तृतीया एक जीवंत धार्मिक त्योहार है जो देवी पार्वती और भगवान शिव के दिव्य प्रेम का जश्न मनाता है। गणगौर होली के बाद मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रंगों का त्योहार। गणगौर या गौर माता एक स्थानीय देवी और भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती का एक रूप हैं। गणगौर त्यौहार बड़े पैमाने पर राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है। इन दोनों राज्यों के अलावा गणगौर मध्य प्रदेश, हरियाणा और गुजरात में भी मनाया जाता है।हर राज्य की संस्कृति उसके रीति-रिवाजों, वेशभूषा और त्योहारों में दिखाई देती राजस्थान, भारत का उत्तरी राज्य, मारवाड़ियों का राज्य है। गणगौर मारवाड़ियों का एक प्रमुख त्योहार है, जिसे बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। राजस्थान ही नहीं बल्कि हर राज्य में रहने वाले मारवाड़ी इस त्योहार को पूरे रीति-रिवाज के साथ मनाते हैंगणगौर त्योहार विवाहित महिलाओं के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि वे अपने पतियों के स्वस्थ जीवन और स्वस्थ वैवाहिक संबंधों के लिए देवी पार्वती की पूजा करती हैं। भगवान शिव जैसा समझदार और सबसे अच्छा पति पाने के लिए कुंवारी लड़कियां भी पूजा और गणगौर उत्सव में भाग लेती हैं।
गणगौर व्रत की कथा
================देवी गौरी तपस्या और पवित्रता का प्रतीक हैं। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने बड़ी भक्ति और प्रतिबद्धता से भगवान शिव को प्रभावित किया। उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या और कठोर तपस्या की। विभिन्न क्षेत्रों में गणगौर कथा के कई संस्करण हैं।एक समय था जब भगवान शिव देवी पार्वती और नारद मुनि के साथ पृथ्वी पर आये थे। वे किसी जंगल में पहुंचे। यह खबर आसपास के गांव की महिलाओं को हुई। सभी महिलाएँ बहुत खुश हुईं और भगवान और देवी का स्वागत करना चाहती थीं। उन्होंने उनके लिए स्वादिष्ट भोजन पकाया। निचली जाति की महिलाएँ पहले आईं और उन्होंने भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की और उन्हें भोजन अर्पित किया। देवी पार्वती ने उन्हें आशीर्वाद में सुहाग दिया। ऊँची जाति की महिलाएँ देर से आईं क्योंकि वे तैयार हो रही थीं। उन्होंने पूजा भी की और शिव जी और पार्वती जी को स्वादिष्ट भोजन भी खिलाया। देवी पार्वती ने अपने सभी सुहाग निचली जाति की महिलाओं को दे दिए थे इसलिए उन्होंने अपना अंगूठा काटकर अपना खून ऊंची जाति की महिलाओं को आशीर्वाद के रूप में दे दिया। इसी कहानी को दर्शाने के लिए लोग गणगौर का त्योहार खुशी से मनाते हैं।
गणगौर पूजा का महत्व
================गणगौर शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है गुण का अर्थ है शिव और गौर का अर्थ है गौरी (मां पार्वती)। यह त्यौहार भगवान शिव और देवी पार्वती के प्रेम और विवाह को समर्पित है। गणगौर एक ऐसा त्योहार है जिसे लड़की हो या महिला हर कोई मनाता है। त्योहार के दौरान अविवाहित लड़कियां और विवाहित महिलाएं दोनों ही पूरे रीति-रिवाजों और रीति-रिवाजों के साथ भगवान शिव और माता पार्वती के एक रूप गणगौर की पूजा करती हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं जबकि अविवाहित लड़कियां भगवान शिव जैसा अच्छा पति पाने के लिए प्रार्थना करती हैं। यह त्यौहार महिलाओं के साधारण दैनिक जीवन को एक अलग रंग और जीवंतता देता है।
: बच्चे भी कर रहे मातारानी की अराधना
Fri, Apr 12, 2024
जितेंद्र दुबे,शाहनगर
माता की हो रही अराधना
विधि - विधान से पुजा अर्चना में जुटे श्रद्धालु
शाहनगर ।नवरात्रि पर्व मे जहां गुरूवार को तीसरे दिन विधि- विधान से मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप माता चंद्रघंटा की अराधना की गयी वहीं चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा कर उन्हें भोजन में दही और हलवा का भोग लगाया गया एवं उन्हें फल, सूखे मेवे और सौभाग्य का सामान अर्पित नगर की महिलाओं ने विधि -विधान से पुजा अर्चना की इस अवसर पर सुबह से शाम तक पुजा अर्चना का क्रम चलता रहा जहां वातावरण भक्तिमय देखा गया और माता ने अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण की ।
: गाडरवारा नगर का खेरापति माता का मंदिर सबसे प्राचीन मंदिर
Thu, Apr 11, 2024
गाडरवारा नगर का खेरापति माता का मंदिर सबसे प्राचीन मंदिर है । जब गाडरवारा में गोंडवाना रियासत राज करती थी तब यह मंदिर छोटी सी झोपड़ी के रूप में स्थापित किया गया था जिसमें आधा फुट की देसी पत्थर की प्रतीक रूप में प्रतिमा स्थापित की गई थी उसके बाद नगर के सहयोग से 1940 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया जिसमें प्रतिवर्ष चैत नवरात्रि की एकम से पूर्णिमा तक नवरात्रि उत्सव मनाया जाता है जिसमें सप्तमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा और जवारे की स्थापना की जाती है वर्ष के चारों नवरात्रों में यहां नगर की जनता सुबह प्रातकाल जल चढ़ाने और शाम को आरती करने दीपक रखने आती है इस मंदिर की ऐप एक प्राचीन परंपरा है कि लड़की की शादी में पहले लड़की माता को तेल हल्दी चढ़ाने और लड़के की शादी में घर आने के पूर्व माता की पूजन करने दूल्हा दुल्हन आती है और माता का आशीर्वाद प्राप्त कर ले के पश्चात ही घर में प्रवेश करते हैं किसी भी आपदा और बीमारी में सबसे पहले लोग माता से विनती करते हैं यह इस मंदिर की परंपरा है अभी इस मंदिर में चैत्र नवरात्रि की तैयारियां जोर शोर से हो रही थी कि करोना जैसी आपदा के कारण प्रशासन मैं अपील की है कि लोग घर से ही माता की पूजन अर्चन करें ताकि करवाना जैसी छुआछूत की बीमारी से बचा जा सके समिति ने भी निवेदन किया है की मंदिर में भीड़ इकट्ठी ना हो क्योंकि नगर में धारा 144 लगी हुई है इस मंदिर समिति द्वारा माता की नवीन प्रतिमा और शतचंडी यज्ञ देवी भागवत पुराण का आयोजन किया जा रहा था लेकिन करो ना जैसी महामारी के ना फैलने के कारण उसे आगामी समय के लिए स्थगित किया गया है ।