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जीव अपने परम चरम लक्ष्य को प्राप्त करे तो कैसे- सुश्री धामेश्वरी देवी : जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख एवं वरिष्ठ प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा 11 दिवसीय प्रवचन

Aditi News Team

Wed, Feb 4, 2026

जीव अपने परम चरम लक्ष्य को प्राप्त करे तो कैसे- सुश्री धामेश्वरी देवी

गाडरवारा।जगद्गुरुत्तम श्री कृपालुजी महाराज की प्रमुख एवं वरिष्ठ प्रचारिका सुश्री धामेश्वरी देवीजी द्वारा 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन गाडरवारा जिला नरसिंहपुर में 3 फरवरी से 13 फरवरी तक दोपहर 3:00 से शायं 5:00 बजे तक आयोजित हो रहा है।

प्रवचन के दूसरे दिन देवीजी ने शास्त्रों के प्रमाणस्वरूप बताया कि वस्तुतः विश्व का प्रत्येक जीव एकमात्र आनंद ही चाहता है। वह आनंद कहाँ है? कैसे मिलेगा? इसी के लिए अनवरत् प्रयत्नशील है। रामायण में भी कहा गया है- ‘‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि।।’’

वेदों के अनुसार ‘‘रसो वै सः“ अर्थात *ईश्वर ही आनंद है* इसीलिए प्रत्येक जीव ईश्वर का सनातन अंश होने के कारण अनादिकाल से आनंद की खोज में लगा हुआ है। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि वेद कहते हैं कि विश्व का प्रत्येक जीव आस्तिक है। इस उक्ति को एक उदाहरण के माध्यम से समझाया गया जैसे कोई नवजात शिशु है, वह जन्म लेते ही पहले रोता है क्योंकि जन्म के समय जो कष्ट होता है उसे वह नहीं चाहता इसलिए रोकर उस दुःख को दूर करने का प्रयास करता है। ऐसे ही किसी विद्यार्थी से पूछा जाए कि तुम पढ़ाई क्यों कर रहे हो वह कहेगा कि परीक्षा में पास हो जाएं, हमारी अच्छी जाॅब लग जाए। फिर पूछा जाए इससे तुम्हें क्या मिलेगा? वह कहेगा सुख मिलेगा, खुशी मिलेगी तो यह सब सुख, खुशी, हैप्पीनेस, शांति आदि ईश्वर के ही पर्यायवाची शब्द है। अतः यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि हम सभी जीव केवल ईश्वर को ही चाहते हैं क्योंकि हम प्रतिक्षण सुख पाने की होड़ में लगे हुए हैं।

परंतु इसके विपरीत हमारे वेद यह भी बताते हैं, कि विश्व का प्रत्येक जीव नास्तिक है क्योंकि हर कोई इंद्रियों की भक्ति करता है, लोग कहते हैं कि भगवान् सबके अंतःकरण में व्याप्त है लेकिन इसको शतसः मानते नहीं है यदि कोई प्रतिक्षण ईश्वर को अपने अंतःकरण में बैठा माने, अपने साथ हर जगह महसूस करें, तो वह कोई अपराध कर ही नहीं सकता। क्योंकि पाप तभी होते हैं, जब हम अपने आप को अकेला अनुभव करते हैं और सोचते हैं कि हमें कोई नहीं देख रहा। हम यह भूल जाते हैं कि हम उस परमपिता के अधीन हैं और वह हमारे अंदर बैठकर प्रतिक्षण हमारे कार्यों को देख रहा है, हमारे कर्मों को लिखता रहता है। जब लोग मंदिर में जाते हैं केवल उतने समय के लिए भगवान् के सामने मंत्र, जाप, श्लोक आदि बोल देते हैं, जैसे ‘‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव“ आदि लेकिन मन की आसक्ति घर के माता-पिता में होती है। मंदिर में खड़े होकर भी हमारा ध्यान संसारी कार्यों में लगा रहता है। इस प्रकार हर व्यक्ति, सर्वान्तर्यामी भगवान् को धोखा देने का प्रयास करता है और मात्र इंद्रियों की भक्ति करता है। इसी प्रकार हम लोग ईश्वर को न मानकर संसारी मान्यताओं, खोखली परंपराओं और इंद्रियों की भक्ति को अधिक मान्यता देते हैं।

उपरोक्त सभी उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि विश्व का प्रत्येक जीव आस्तिक भी है और नास्तिक भी।ईश्वर की वास्तविक भक्ति करने के लिए हमें भगवद् कृपा को समझना होगा, जो आगे प्रवचन श्रृंखला में बताया जाएगा। प्रवचन का समापन श्री राधा कृष्ण भगवान् की भव्य आरती के साथ हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। 11 दिवसीय दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला का आयोजन दिनांक 3 फरवरी से 13 फरवरी 2026 तक प्रतिदिन दोपहर 3:00 से 5:00 शाम तक होगा।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

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