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मैं दशानन, मेरा अहंकार और मेरी नियति : ( विजयादशमी पर आलेख - सुशील शर्मा)

Aditi News Team

Thu, Oct 2, 2025

मैं दशानन, मेरा अहंकार और मेरी नियति

( विजयादशमी पर आलेख - सुशील शर्मा)

मैं लंकापति दशानन, त्रिलोक विजेता रावण! आज मैं जलती हुई लंका की राख पर खड़ा होकर बोल रहा हूँ—उस आग पर, जो केवल मेरे सोने के महल को नहीं, बल्कि मेरे समूचे गौरव, मेरी तपस्या और मेरे अभिमान को भी भस्म कर गई। मुझे पता है, सदियों से मुझे केवल एक अहंकारी राक्षस के रूप में याद किया गया है, जिसने पराई स्त्री का हरण किया। परंतु क्या किसी ने मेरे मन की गहराइयों को टटोला है? क्या किसी ने उस राजा के द्वंद्व को समझा है, जो जानता था कि वह विनाश के पथ पर अग्रसर है, फिर भी अहंकार के रथ पर सवार रहा?

मैं ऋषि विश्वावा और कैकसी का पुत्र हूँ। मुझमें ब्राह्मण का ज्ञान और राक्षस का बल समाहित था। मैं वेदों का ज्ञाता, ज्योतिष का प्रकांड विद्वान और भगवान शिव का परम भक्त था। मैंने अपनी भुजाओं के बल पर तीनों लोकों को जीता। मेरा पुष्पक विमान मेरी वैज्ञानिक प्रगति का प्रतीक था। मेरा ज्ञान इतना विशाल था कि मैंने अपने नौ सिरों से अधिक, दस सिरों से सोचा। परंतु यही ज्ञान मेरे लिए अभिमान का बीज बन गया।

मुझे लगता था कि मैं मृत्यु को भी परास्त कर सकता हूँ। मेरा ज्ञान मुझे इतना शक्तिशाली बना चुका था कि मैंने मर्यादा और नीति को अपने चरणों की धूल समझा। मेरा अभिमान एक ऐसे विशाल वटवृक्ष की तरह था, जिसने मेरी सारी विद्वता को अपनी छाया में दबा दिया। यही अभिमान मेरे पतन का प्रथम कारण बना। ज्ञान ने मुझे सर्वोच्च बनाया, पर अहंकार ने मुझे शून्य कर दिया।

सीता का हरण मेरे लिए मात्र एक स्त्री का अपहरण नहीं था; यह शक्ति का प्रदर्शन था। मेरी बहन शूर्पणखा का अपमान (नाक कटना) मेरे लिए लंका के सिंहासन का अपमान था। मेरी दृष्टि में, राम वनवासी थे, एक साधारण मनुष्य, जिनकी इतनी हिम्मत हुई कि वे लंका के राजा के परिवार को चुनौती दें।

शूर्पणखा के अपमान का प्रतिशोध लेना मेरे राजधर्म का हिस्सा था। दुनिया को यह दिखाना आवश्यक था कि लंकापति को चुनौती देने का परिणाम क्या होता है।

मेरा असली उद्देश्य राम से युद्ध करना था। राम विष्णु के अवतार थे, यह रहस्य मैं जानता था। मेरे गुरुओं ने बताया था कि मेरा उद्धार किसी साधारण मनुष्य के हाथों नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर के हाथों होगा। मृत्यु ही मेरे तपस्या का अंतिम फल थी, और वह मृत्यु राम के हाथों ही मिल सकती थी। सीता हरण केवल वह निमंत्रण पत्र था, जो मैंने राम को युद्ध के लिए भेजा।

उस काल में शक्ति ही सत्य थी। लंका एक महाशक्ति थी, जिसके आगे कोई टिकता नहीं था। मैंने सोचा कि राम को पराजित करके मैं अपनी शक्ति को देवताओं के सामने भी सिद्ध कर दूँगा। यह मेरी तत्कालीन राजनीतिक आवश्यकता थी अपने साम्राज्य का विस्तार और भय स्थापित करना।

लंका की सामाजिक स्थिति मेरी शक्ति पर आधारित थी। प्रजा मुझसे डरती थी, पर सम्मान भी करती थी। हम भौतिक सुख-सुविधाओं में डूबे थे, जहाँ बल ही न्याय था। मेरी नैतिकता शक्ति की नैतिकता थी। मेरे लिए नियम वही थे जो मैं बनाता था।

रावण के अनुसार, उसे यह सब क्यों नहीं करना चाहिए था?

मेरा भाई विभीषण मुझे बार-बार चेता रहा था कि पर-स्त्री हरण महापाप है और यह लंका के विनाश का कारण बनेगा। मेरी विद्वता को इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए था कि शक्ति का दुरुपयोग विनाशकारी होता है।

मैंने धर्म की मर्यादा को तोड़ा। जिस शक्ति से मैं अपने राज्य की रक्षा कर सकता था, उसी शक्ति का उपयोग मैंने अपने व्यक्तिगत प्रतिशोध के लिए किया। मुझे अपनी प्रजा के हित और शांति के लिए यह युद्ध टाल देना चाहिए था।

मैंने अपने अभिमान पर संयम नहीं रखा। मेरी बुद्धि जानती थी कि मैं गलत कर रहा हूँ, पर मेरे अहंकार ने मेरी बुद्धि को जकड़ लिया था। मुझे सीता को ससम्मान लौटाकर राम से संधि करनी चाहिए थी।

मेरे कर्मों का परिणाम संपूर्ण विनाश था। मैंने अपने भाई-बंधुओं, अपने पुत्रों और अपनी महानगरी लंका को खो दिया। मैंने जो कुछ भी अपने बल और तपस्या से अर्जित किया था, वह सब एक ही अहंकार के क्षण में राख हो गया। मेरा पतन सिद्ध करता है कि अहंकार ज्ञान और बल से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है, और वह अंततः हर महानता को नष्ट कर देता है।

प्रतिवर्ष मेरा पुतला जलाया जाता है यह केवल मेरा दहन नहीं है, बल्कि यह मानव मन में बैठे 'रावण' के दहन का प्रतीक है।

मेरा दहन प्रतीकात्मक रूप से अहंकार, क्रोध, लालच, ईर्ष्या और वासना (काम) जैसी दस बुराइयों का दहन है।

यह उत्सव हमें सिखाता है कि बुराई कितनी भी ताकतवर, विद्वान या समृद्ध क्यों न हो, सत्य और मर्यादा के आगे उसे झुकना ही पड़ता है।

आज कलयुग में हर मनुष्य के भीतर एक मै बैठा हूँ अहंकार, ईर्ष्या और भौतिक सुख की अंधी दौड़ के रूप में।

मनुष्य को अपने ज्ञान और पद पर अभिमान नहीं करना चाहिए। मेरी तरह, आप भी अपनी शक्तियों को समाज के हित में लगाएँ, न कि व्यक्तिगत स्वार्थ में।

हमेशा अपने भीतर के विवेक (विभीषण) की आवाज़ सुनो, भले ही वह कड़वी क्यों न हो। उन सच्चे मित्रों और सलाहकारों की बात सुनो जो आपकी गलती बताएँ।

वासना और क्रोध से उपजे हर विचार को संयम की मर्यादा से बाँधो। यही वह डोर है जो मुझे तोड़नी नहीं चाहिए थी।

कर्म का फल: यह याद रखो कि कर्म का फल अवश्य मिलता है। गलत रास्ते से प्राप्त की गई सफलता क्षणभंगुर होती है, पर धर्म और नीति से पाया गया सुख स्थायी होता है।

मेरा अंत यह सिद्ध करता है कि शक्ति बिना मर्यादा के विनाश है, और ज्ञान बिना विवेक के केवल अभिमान है। हर वर्ष मेरी राख तुम्हें यही संदेश देती रहेगी। मेरा अस्तित्व भले ही समाप्त हो गया हो, पर मेरी कहानी अमर है तुम्हारे भीतर के रावण को पहचानने और उसे हर दिन हराने के लिए।

सुशील शर्मा

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