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"जीवन केवल समय काटने का नाम नहीं, स्वयं को जानने का निरंतर प्रयोग है"

शीर्षक: समाज का आईना, निर्मला पाराशर की कलम से : मीठे गीत सुनाकर, तुम हमें सपनों में सुलाते हो, और चुपके-चुपके ही भीतर विभाजन के बीज बो जाते हो।

Aditi News Team

Thu, Jan 29, 2026

शीर्षक: समाज का आईना

मीठे गीत सुनाकर,

तुम हमें सपनों में सुलाते हो,

और चुपके-चुपके ही भीतर

विभाजन के बीज बो जाते हो।

संविधान की बात करते हो,

पर अर्थ कहीं खो जाता है,

समता का पाठ पढ़ाते हो,

पर व्यवहार बदल न पाता है।

हिंदू-हिंदू का स्वर उठाकर,

हिंदू को ही खंडित करते हो,

कभी ऊँच-नीच, कभी वर्ग के नाम पर,

अपनों को ही अलग करते हो।

सत्ता जब ऊँची लगने लगे,

तो धरती छोटी हो जाती है,

जनता की पीड़ा शोर लगे,

और सच की आवाज़ साज़िश हो जाती है।

जो प्रश्न करे, वह अपराधी,

जो मौन रहे, वही समझदार,

पर लोकतंत्र मौन से नहीं,

सच के साहस से होता है मजबूत आधार।

सुनो नीति के नियंता जनो,

यह कविता आईना बनकर आई है,

जो समाज को जोड़ सके,

वही सच्ची राष्ट्र-सेवा कहलायी है।

अब भी समय है, सोच बदलो,

संघर्ष नहीं, समन्वय रचो,

नफरत नहीं, संवाद बोओ,

और मानवता का दीपक सदा सजा लो।

हिंदू-हिंदू कहकर, हिंदू को

आपस में क्यों लड़ाते हो?

अपने ही घर की दीवारों में

दरारें क्यों खुद ही डाल जाते हो?

यह केवल कविता नहीं,

एक चेतना की पुकार है,

जो समझे वही जागेगा,

और जागा वही राष्ट्र का आधार है।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

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