शिक्षा को बाजार की मंडी मत बनाओ, ज्ञान को संविदा की सूची मत बनाओ : गुरु को कर्मचारी की कुर्सी पर बैठाकर विचारों को फाइलों में कैद मत बनाओ।
Aditi News Team
Wed, Jan 28, 2026
शिक्षा को बाजार की मंडी मत बनाओ,
ज्ञान को संविदा की सूची मत बनाओ,
गुरु को कर्मचारी की कुर्सी पर बैठाकर
विचारों को फाइलों में कैद मत बनाओ।
नई लकीर खींची गई है काग़ज़ों पर,
कलम से भविष्य की तक़दीर खींची गई है,
पर क्या किसी ने पूछा शिक्षक से,
या छात्रों की उम्मीदों की तस्वीर खींची गई है?
कहते हैं—भर्ती बदलेगी, नियम बदलेगा,
संविदा पर आएगा शिक्षक का स्वाभिमान,
जो जीवनभर ज्ञान बाँटता रहा निस्वार्थ,
उसे हर साल देना होगा प्रमाण-पत्र का प्रमाण।
कहते हैं—स्वायत्तता देंगे संस्थानों को,
पर केंद्रीय आदेश की जंजीर कसती जाए,
जिस विश्वविद्यालय ने सोचना सिखाया था,
अब वह सरकार की भाषा ही दोहराए।
कक्षाओं में अब प्रश्न नहीं,
नीति पत्रों में उत्तर ढूँढे जाएँगे,
जो ज्ञान का महासागर था कभी,
वह नियमों की बूंदों में बाँटा जाएगा।
विद्यार्थी अब छात्र नहीं,
ग्राहक बनाकर देखे जाएँगे,
डिग्री बनेगी उत्पाद,
और सपने शुल्क की रसीदों में तौले जाएँगे।
हम कहते हैं—
शिक्षा संविधान का अधिकार है,
न कि कॉर्पोरेट का व्यापार है।
ज्ञान को बाँधना,
राष्ट्र के भविष्य को बाँधना है।
जिस देश में शिक्षक स्वतंत्र नहीं,
उस देश का नागरिक भी स्वतंत्र नहीं।
जिस समाज में प्रश्न दबा दिए जाएँ,
वहाँ प्रगति केवल विज्ञापन बन जाती है।
यह कानून नहीं,
विचारों पर पहरा है,
स्वप्नों पर पहरा है,
और शिक्षा की आत्मा पर पहरा है।
हम विरोध करते हैं—
केंद्रीकरण के,
संविदा की असुरक्षा के,
और शिक्षा के निजीकरण के।
क्योंकि शिक्षा सरकार की नहीं,
शिक्षा बाजार की नहीं,
शिक्षा राष्ट्र की आत्मा है।
अगर आत्मा पर नियमों की जंजीर होगी,
तो राष्ट्र केवल शरीर बनकर रह जाएगा।
इसलिए उठो शिक्षकों,
जागो विद्यार्थियों,
कलम को तलवार बनाओ,
शब्दों को क्रांति की मशाल बनाओ।
जब ज्ञान बोलता है,
तो सत्ता को भी सुनना पड़ता है,
और जब शिक्षक जागता है—
तो इतिहास करवट बदलता है!
"निर्मला पराशर"
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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
निर्मला पराशर