निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज : जीवन एक रहस्य है, समस्या नहीं; आत्मचिंतन से करें उसका उद्घाटन
Aditi News Team
Sun, Aug 30, 2026
जीवन एक रहस्य है, समस्या नहीं; आत्मचिंतन से करें उसका उद्घाटन :- निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज
कुण्डलपुर(म.प्र.)।"रहस्य वही है जो प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता, जिसे पूरी तरह जाना नहीं जा सकता, लेकिन जिसके अस्तित्व का अनुभव होता है। जो सामने दिखाई दे रहा है, वह रहस्य नहीं है।जीवन एक है, लेकिन उसे जीने और देखने वाले असंख्य हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने दृष्टिकोण से जीवन को देखता है। एक चित्रकार रंगों में जीवन को देखता है, वैज्ञानिक अपने प्रयोगों और शोध में जीवन के रहस्यों को खोजता है। जितने लोग, उतने दृष्टिकोण और इसी विविधता के कारण अनुभव और जीवन की परिभाषाएं अलग-अलग हो जाती हैं" उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने व्यक्त किये. राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में प्रारंभ हुई ‘What Is Life’ प्रवचन श्रृंखला के माध्यम से निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने जीवन के विभिन्न आयामों और उसके गहन रहस्यों पर प्रकाश डाला उन्होंने कहा कि जीवन एक रहस्य है विषय पर मुनि श्री ने जो विचार पृकट किये वह श्रद्धालुओं को स्वयं के अस्तित्व, कर्म और जीवन की वास्तविकता पर गंभीर चिंतन करने की प्रेरणा प्रदान कर गया।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को इस सृष्टि के रहस्यों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह सृष्टि किसने बनाई? इसका निर्माता कौन है? क्या कोई अदृश्य शक्ति इसका संचालन कर रही है अथवा यह स्वयं संचालित है? हमारी किस्मत कौन लिखता है? पेड़-पौधों में रंग कैसे आए? पानी में शीतलता और वायु में जीवनदायिनी शक्ति कहाँ से आई? सूर्य में गर्मी और चंद्रमा में शीतलता का रहस्य क्या है? ऐसे असंख्य प्रश्न मनुष्य की जिज्ञासा को जागृत करते हैं।
उन्होंने कहा कि जब प्रश्न मनुष्य के भीतर जिज्ञासा बनते हैं तो खोज प्रारंभ होती है और खोज के माध्यम से प्राप्त निष्कर्ष ही रहस्यों का उद्धघाटन करते हैं। जैन दर्शन इन प्रश्नों को समझने की विशिष्ट दृष्टि प्रदान करता है। जैन सिद्धांत के अनुसार सृष्टि को किसी एक व्यक्ति अथवा शक्ति ने बनाकर संचालित नहीं किया है। यह संसार अनादि प्रवाह में अपने स्वभाव और नियमों के अनुसार चलता आया है। मुनि श्री ने कहा कि किसी ने हमारी किस्मत लिखकर हमें संसार में नहीं भेजा है।हम स्वयं अपने भाग्य के निर्माता हैं। व्यक्ति को जीवन में सुख-दुःख के रूप में जो परिणाम प्राप्त होते हैं, वे उसके अपने कर्मों से जुड़े होते हैं। *जैन कर्म सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक जीव को अपने द्वारा किए गए कर्मों का फल स्वयं भोगना पड़ता है।*
उन्होंने मनुष्य के आंतरिक संसार को भी एक बड़ा रहस्य बताते हुए कहा कि हमारे भीतर विचार कहाँ से आते हैं? भावनाओं का जन्म कैसे होता है? सुख-दुःख का अनुभव कौन कराता है? मन निरंतर विचारों और भावनाओं से भरा रहता है, किंतु इन अनुभवों का गहरा संबंध जीव और चेतना से है। चेतना के कारण ही मनुष्य अनुभूति करता है और सुख-दुःख का अनुभव करता है।
मुनि श्री ने कहा कि *जीवन के रहस्यों को समझने के लिए मानव ने विज्ञान, कला-साहित्य और अध्यात्म जैसे विभिन्न मार्ग अपनाए हैं। विज्ञान ने मनुष्य को सुविधाएं और भौतिक साधन दिए, जबकि कला और साहित्य ने संवेदनाओं और भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम प्रदान किया। लेकिन मनुष्य के अस्तित्व, चेतना और जीवन की दिशा से जुड़े प्रश्नों का उत्तर खोजने में अध्यात्म की विशेष भूमिका है।*
आज के समय में बढ़ती चिंता, मानसिक तनाव और वैचारिक उलझनों का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि *आजअनेक युवाओं के पास संसाधन और सुविधाएं तो हैं, लेकिन वे जीवन की दिशा तय नहीं कर पा रहे हैं। विचारों की उलझन उनके चेहरे की प्रसन्नता छीन लेती है और उत्सव जैसा जीवन भी उदासी में बदल जाता है।* बाहरी समस्याओं के समाधान के लिए विज्ञान और तकनीक सहायक हो सकते हैं, लेकिन मनुष्य की आंतरिक उलझनों को समझने और जीवन को सही दिशा देने के लिए आध्यात्मिक चिंतन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि तकनीक और जानकारी व्यक्ति की बाहरी जिज्ञासाओं का समाधान कर सकती है, लेकिन आत्मा और जीवन से जुड़े प्रश्नों का समाधान केवल सूचना से नहीं मिलता। बाहरी समस्याओं का समाधान तकनीक दे सकती है, किंतु आंतरिक समस्याओं की सही दिशा ज्ञानी गुरु और अध्यात्म से प्राप्त होती है।
जन्म और मृत्यु के रहस्य पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार जीव का वास्तविक स्वरूप जन्म और मृत्यु से परे है। जीव शरीर और पर्याय बदलता है। नई पर्याय के प्राप्त होने को जन्म और पुरानी पर्याय के समाप्त होने को मरण कहा जाता है। जीव और शरीर के अंतर को समझे बिना जन्म-मरण के रहस्य को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।उन्होंने प्रश्न उठाया कि अच्छे लोगों के साथ कभी-कभी बुरा क्यों होता है और बुरे लोगों के जीवन में कई बार सब कुछ अच्छा क्यों दिखाई देता है? यह भी जीवन और कर्म का एक गहरा रहस्य है। वर्तमान की एक छोटी सी घटना को देखकर कर्मों की संपूर्ण प्रक्रिया को समझना संभव नहीं है। जीवन में मिलने वाली परिस्थितियों के पीछे कर्मों का गहरा संबंध कार्य करता है।
मुनि श्री ने कहा कि जीवन के रहस्य केवल किसी एक पहलू तक सीमित नहीं हैं। सृष्टि, प्रकृति, मन, विचार, चेतना, जन्म, मृत्यु, सुख-दुःख और न्याय—मानव जीवन के अनेक क्षेत्रों में गहरे रहस्य छिपे हुए हैं। इनके उद्धघाटन के लिए गंभीर चिंतन, आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक दृष्टि आवश्यक है।
Tags :
अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज