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नर्मदा जयंती पर विशेष आलेख एवं गीत सुशील शर्मा : नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान

Aditi News Team

Sat, Jan 24, 2026

नर्मदा की अनन्त धारा: एक विद्धत चेतना का आह्वान

(नर्मदा जयंती पर विशेष आलेख - सुशील शर्मा)

नर्मदा केवल एक नदी का नाम नहीं है, वह भारतीय सार्वभौमिक चेतना की वह अविरल धारा है जो समय से परे, संस्कारों से युक्त, इतिहास से गहन और प्रकृति से अभिन्न है। नर्मदा के जल में पुराणों का शास्त्रीय वैभव, आध्यात्मिक पथ का दीप, तथा पर्यावरण की पुकार, तीनों एक साथ गुंथे हुए हैं। यही कारण है कि नर्मदा को माँ नर्मदा कहा जाता है। न केवल धर्मग्रंथों में, बल्कि जीवित अनुभवों और मानव-प्रकृति के संवाद में भी नर्मदा का अस्तित्व एक सौंदर्य, करुणा और चेतना का रूपक बन जाता है।

नर्मदा का प्रचलित पुराणिक रूप हमें यह बताता है कि उसके दर्शन मात्र से ही पापों के तिरोहित हो जाने का फल प्राप्त होता है। महान शास्त्रों के अनुसार गंगा-यमुना की नदियाँ तो स्नान से पावन होती हैं, पर नर्मदा की पवित्रता इतनी गहन है कि उसके दर्शन से भी पापनाश का संकल्प संभव होता है।

इस दृष्टि से नर्मदा जल मात्र नहीं, पर आध्यात्मिक ऊर्जा का संचालक और जीवन्मुक्ति का स्रोत है। वह निर्जन घाटों में भी शांति का वास करती है और भीड़-भरी परिक्रमा में भी अपना समान आत्मीय प्रेम प्रदर्शित करती है।

*धार्मिक अनुभूति और कर्मयोग*

नर्मदा की धार पर चलना, उनके तट पर सिर रखना, उनकी धारा को स्पर्श करना , यह केवल भौतिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मा की अंतर्यात्रा है। नर्मदा परिक्रमा हिन्दू धर्म का एक अति प्रतिष्ठित धार्मिक कर्म है, जिसमें श्रद्धालु शारीरिक परिश्रम और मानसिक एकाग्रता से नर्मदा की संपूर्ण परिक्रमा करते हैं। यह न केवल पारंपरिक व्यवहार है, बल्कि आध्यात्मिक कर्मयोग का एक सशक्त आयाम भी है।

नदी के दोनों तटों पर स्थित हजारों मंदिर, तीर्थस्थान, तथा सांस्कृतिक स्थल न केवल भक्ति के केंद्र हैं, पर वे मानव की दिव्य आकांक्षा और उसकी नियति की अनुभूति का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। यहाँ श्रद्धालु अपनी आत्मा को शुद्ध कर, कर्मों का संधान करते हैं।

*प्रकृति का गहन संग और जीवों का अस्तित्व*

प्रकृति के दृष्टिकोण से नर्मदा एक अविरल जीवन-धारा है। यह नदी मध्य भारत की महाद्वीपीय ढाल पर बहते हुए उन सभी जीवों का आश्रय है जिनका अस्तित्व जल पर निर्भर है। नदी के विस्तृत बेसिन में नदी के साथ-साथ विस्तृत जंगल, वन्यजीव, पक्षी, जल-जीव और वनस्पति का एक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र विद्यमान है।

नदी के सपाट क्षेत्र में खेत, बगीचे, घास के मैदान और सोने जैसी उपजाऊ मिट्टी का विस्तार होता है। यह वह भूमि है जहाँ न सिर्फ मानवीय जीवन संवहनीय है बल्कि हजारों प्रजातियाँ अपनी विविधता और अनुपम सौंदर्य के साथ जीवंत हैं शेष पृथ्वी के जीवन-चक्र का आधार बनाते हैं। परंतु, यह सुंदर धारा आज विवर्धित मानव-क्रिया के दबाव में है। औद्योगिक अपशिष्ट, खेतों का रसायनिक मल, निर्माण कार्य, मेले-उत्सवों की अव्यवस्था, एवं अनियंत्रित परिक्रमा न केवल नदी के जल-गुण को दूषित कर रहे हैं, बल्कि इसके पारिस्थितिकी तंत्र को भी क्षय कर रहे हैं।

*मानव-तरलता और प्रकृति के प्रति सम्बन्ध*

नदी माँ है, परंतु माँ तथा उसकी संतानों के बीच का सम्बन्ध आज संकट में है। मानव के स्वार्थ, लालच, सुविधा और अपने कर्मों को प्राकृतिक संतुलन से ऊपर रखने की प्रवृत्ति ने नदी की अमृतधारा को मलिन कर दिया है। यह वे ही मनोवैज्ञानिक कारण हैं जिन्होंने माँ नर्मदा की करुण पुकार को प्रतिध्वनित किया है एक पुकार जो मानव चेतना को जागृत करने की अनिवृत्ति मांगती है।

हम जब नर्मदा को अपने जीवन की लय से अलग कर देते हैं, तब हम अपने ही अस्तित्व, अपनी संस्कृति, अपनी भूमि और अपनी आत्मा की जड़ों को काट देते हैं। यह वह सम्बन्ध है जहाँ नदी के अस्तित्व को बचाना केवल पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न नहीं, बल्कि मानव-आध्यात्मिक उत्तरदायित्व का संबोधन है।

*संरक्षण के मार्ग: चेतना से क्रिया तक*

प्रकृति संरक्षण केवल प्रदर्शनों, घोषणाओं या नियम-निर्माण से पूर्ण नहीं होता। यह आत्मा और अनुभूति की गहराइयों में उतरकर तब तक नहीं पहुँच सकता जब तक हर व्यक्ति स्वयं नर्मदा के प्रति एक सम्बद्ध कर्म न करे। माँ नर्मदा की करुण पुकार हमें यही कहती है मन छोटा मत करो, कर्म महान बनाओ।

नर्मदा स्वयं सहनशीलता का आदर्श है; उसने अपनी गंगा-गौरवता को निर्बलता में नहीं बदला, परन्तु उसने मानव की क्रूरता को भी अपनी धारा में मिला लिया। अब समय आ गया है कि मानव अपने किये कर्मों का उत्तर स्वयं बहता जल बनकर दे।

संरक्षण के कुछ प्रमुख उपाय नीचे, व्यवहारगत रूप से क्रियान्वयन योग्य हैं।

1.जल-संरक्षण के लिए मानवीय जागरूकता।

2.नदी किनारे अव्यवस्थित रेत उत्खनन को रोकना।

3.पूजा-निर्माल्य को पर्यावरण-अनुकूल तरीके से पुनः उपयोग योग्य खाद में परिवर्तित करना।

4.पॉलीथीन तथा संरचना-दूषित पदार्थों से दूरी बनाना।

5.नदी तट पर साफ-सफाई के लिए नियमित जनता-सेवा अभियानों का आयोजन।

6.सामुदायिक चेतना और शिक्षा

7.गाँव और नगरों में जल-संरक्षण शिविरों की स्थापना।

8.यात्राओं और मेले के आयोजनों में प्रदूषण रहित कार्यक्रमों का प्रावधान।

9.धार्मिक नेतृत्व को पर्यावरण संदेश का दूत बनाना।

*आध्यात्मिक पुनर्जागरण: नदी और मानव का संवाद*

नदी और मनुष्य के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संवाद चल रहा है। नर्मदा की धारा में न केवल जल का प्रवाह है, बल्कि वह भक्ति की धारा भी निरंतर बहाती है। यहाँ जो धार्मिक अनुभव प्रकट होता है, वह केवल मत-रिवाज़ का अनुकरण नहीं; बल्कि वह आत्मा का स्व-अन्वेषण है, जहाँ मनुष्य स्व-केन्द्रितता से ऊपर उठकर सर्व-केन्द्रितता की अनुभूति को स्वीकार करता है।

जब कोई भक्त नर्मदा के तट पर अपने सर झुकाता है, तब वह केवल नदी के आगे विनम्रता नहीं प्रस्तुत करता; वह स्वयं की मनःशुद्धि, चरित्र-परिष्कार और कर्तव्य-बोध की पूजा भी करता है। यही वह अनुभूति है जिसे नर्मदा का संदेश हमें प्रतिदिन देना चाहती है।

*करुणा, चेतना और संरक्षण का संगम*

नर्मदा की धारा वह अनंत धारा है जो जीवन, चेतना, इतिहास तथा प्रकृति को एक सूत्र में बांधती है। उसकी करुण पुकार केवल नदी से निकलती आवाज नहीं, वह पूर्वजों की धरोहर, हमारे कर्मों का न्याय और हमारी आने वाली पीढ़ियों के स्वप्नों की पुकार है। यह पुकार मानव से कहती है कि मातृत्व न केवल दिए जाने वाला दान है, पर आत्मा का वह दर्पण भी है जिसमें मनुष्य अपने कर्मों का प्रतिबिम्ब देखता है।

नर्मदा के जल को साफ रखना कोई असंभव कार्य नहीं; यह तो केवल भावना से कर्म की ओर एक सरल सी यात्रा है। नदी माँ से सीख लेने का यही अर्थ है जीवन की कल्पना करना, उसे सम्मान देना, और उसे बचाने का प्रण लेना।

माँ आशुतोषी नर्मदा

अनादि के मौन से

जब सृष्टि ने प्रथम स्पंदन पाया

तभी जल ने शब्द सीखा

और शब्द ने प्रवाह

उसी क्षण

नर्मदा

आदि माता के रूप में

काल की गोद से उतरीं।

वह जन्म नहीं था

वह आविर्भाव था

उमारूद्रांग की तपश्चर्या से

उद्भूत वह चेतना

जो शिव के नेत्रों से

करुणा बनकर बही।

ऋक्षपाद की कठोर साधना में

उनका स्रोत जागा

और त्रिकूट की पावन शिला ने

उन्हें दिशा दी।

नर्मदा

केवल नदी नहीं

वह काल की शिराओं में

बहती हुई प्राणवायु हैं।

उनका जल

स्मृति है

उनका निनाद

उपनिषद का घोष।

जहाँ गंगा मोक्ष की आकांक्षा हैं

वहाँ नर्मदा

जीवन की निरंतरता हैं।

उनका कलकल स्वर

वनस्पति में हरियाली

प्राणी में श्वास

और मानव में

आशा का संचार करता है।

वह पर्वतों को चूमती हुई

मैदानों में उतरती हैं

और मैदानों को

सभ्यता का संस्कार देती हैं।

दशार्णा बनकर

वह जनपदों को सींचती हैं

शांकरी होकर

आस्था को अक्षुण्ण रखती हैं।

मुरंदला की वक्रता में

वह सौंदर्य रचती हैं

और इन्दुभवा स्वरूप में

रजनी को भी पावन करती हैं।

चित्रोत्पला का तेज

उनके प्रवाह में

सूर्य की साक्षी बनता है।

दुर्गम पथों पर चलती हुई

वह थकती नहीं

क्योंकि नर्मदा

थकान नहीं

संकल्प की संज्ञा हैं।

विदशा हो या विपाशा

करभा हो या रंजना

हर नाम

उनके विराट व्यक्तित्व का

एक आयाम है।

वह मुना बनकर

माधुर्य देती हैं

सुभाषा बनकर

संवाद रचती हैं।

उनका जल

अमल है

शीतल है

पर निर्बल नहीं।

वह सतत प्रवाह में

भी स्थिर मूल्य हैं।

न ठहराव में मृत्यु

न वेग में विनाश

यह नर्मदा की

आंतरिक मर्यादा है।

विमला और अमृता

उनके नाम नहीं

उनका स्वभाव हैं।

शोण और विपापा

उनके विस्तार हैं।

महानद और मंदाकिनी

उनकी विराटता के

उपमान हैं।

नील धवल धाराएँ

दिन रात्रि

सहस्त्र कोस की यात्रा में

सृष्टि को

जीवंत रखती हैं।

उनका जल

अन्न बनता है

औषधि बनता है

और अंततः

मानव की चेतना में

श्रद्धा बनकर बसता है।

नर्मदा

सार्वकालिक हैं

क्योंकि जीवन

सार्वकालिक है।

जब तक पृथ्वी

अपनी धुरी पर घूमेगी

जब तक मानव

प्रकृति से संवाद करेगा

तब तक नर्मदा

आशुतोषी माता बनकर

सबको तृप्त करती रहेंगी।

उनकी परिक्रमा

पाँव की नहीं

अहं की यात्रा है।

जो उन्हें नमन करता है

वह जल को नहीं

जीवन को प्रणाम करता है।

माँ आशुतोषी नर्मदे

तुम प्रवाह हो

तुम प्रार्थना हो

तुम सृष्टि की

अक्षय पंक्ति हो।

✒️ सुशील शर्मा

Tags :

अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

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