जंतर मंतर से उठी पुकार : छात्र आंदोलन, राजनीति और भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा
Aditi News Team
Tue, Jul 21, 2026
जंतर मंतर से उठी पुकार,छात्र आंदोलन, राजनीति और भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा
(समालोचनात्मक आलेख)
दिल्ली का जंतर मंतर केवल धरना स्थल नहीं है, वह भारतीय लोकतंत्र का वह आईना है जहाँ सत्ता की नीतियाँ और जनता की पीड़ाएँ आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं। स्वतंत्र भारत में असंख्य आंदोलनों ने यहीं से अपनी आवाज़ उठाई है। कभी किसानों ने अपनी व्यथा कही, कभी कर्मचारियों ने अपने अधिकार माँगे, कभी महिलाओं ने न्याय की गुहार लगाई और अब देश के लाखों विद्यार्थियों का भविष्य इस ऐतिहासिक स्थल पर प्रश्न बनकर खड़ा है। NEET को लेकर उठे छात्र आंदोलन ने केवल परीक्षा प्रणाली पर ही नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था, राजनीति और लोकतांत्रिक संवेदनशीलता पर भी अनेक गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
भारत में चिकित्सा शिक्षा केवल एक पाठ्यक्रम नहीं है, बल्कि करोड़ों युवाओं का स्वप्न है। गाँव का किसान अपनी जमीन गिरवी रखकर बच्चे को कोचिंग भेजता है। मजदूर अतिरिक्त मजदूरी करता है ताकि बेटा डॉक्टर बन सके। मध्यमवर्ग अपनी वर्षों की बचत एक परीक्षा की तैयारी में लगा देता है। ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हो जाए, प्रश्नपत्र लीक होने के आरोप सामने आएँ, जाँच एजेंसियाँ सक्रिय हों और छात्रों को यह लगे कि उनकी वर्षों की मेहनत कुछ लोगों की बेईमानी के कारण दाँव पर लग गई है, तो उनका सड़क पर उतरना केवल विरोध नहीं, बल्कि अपने भविष्य की रक्षा का प्रयास भी है।
जंतर मंतर पर बैठे अधिकांश छात्रों के चेहरों पर केवल आक्रोश नहीं था; वहाँ थकान भी थी। वर्षों की तैयारी, अनिश्चित भविष्य, मानसिक तनाव और व्यवस्था पर डगमगाते विश्वास ने उनके भीतर एक ऐसा असंतोष भर दिया था जो केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं था। यह उन सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति अविश्वास का प्रतीक भी बन गया, जिनमें समय-समय पर अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। आज का विद्यार्थी केवल परीक्षा नहीं देता, वह अपने पूरे परिवार की उम्मीदों का भार लेकर परीक्षा केंद्र तक पहुँचता है। इसलिए किसी भी प्रकार की गड़बड़ी केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं रहती, वह सामाजिक अन्याय का रूप धारण कर लेती है।
सरकार की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक महत्वपूर्ण थी। किसी भी लोकतांत्रिक शासन की सबसे बड़ी पूँजी जनता का विश्वास होता है। यदि परीक्षा प्रणाली पर प्रश्न उठते हैं, तो सरकार का पहला दायित्व केवल सफाई देना नहीं, बल्कि ऐसी पारदर्शी व्यवस्था प्रस्तुत करना है जिससे विद्यार्थियों का विश्वास पुनः स्थापित हो। दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई, समयबद्ध जाँच, तकनीकी सुधार और संस्थागत उत्तरदायित्व आवश्यक हैं। शासन की चुनौती यह भी थी कि करोड़ों ईमानदार विद्यार्थियों की परीक्षा को बिना पर्याप्त कारण निरस्त करना भी अन्याय होता, जबकि गंभीर आरोपों की अनदेखी करना उससे भी बड़ा अन्याय होता। यही संतुलन साधने में प्रशासन को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
हालाँकि यह भी स्वीकार करना होगा कि शासन की प्रारंभिक प्रतिक्रिया अपेक्षित संवेदनशीलता और संवाद स्थापित करने में पूरी तरह सफल नहीं दिखी। विद्यार्थियों के बीच उठे संदेहों का तत्काल और व्यापक उत्तर यदि अधिक प्रभावी ढंग से दिया जाता, तो संभवतः आंदोलन का विस्तार इतना व्यापक नहीं होता। लोकतंत्र में संवाद की अनुपस्थिति अनेक बार विरोध को और अधिक तीव्र बना देती है।
किन्तु इस आंदोलन का दूसरा पक्ष भारतीय राजनीति से जुड़ा हुआ है। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि जनता के वास्तविक मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाना भी है। यदि लाखों विद्यार्थी अपनी परीक्षा प्रणाली पर प्रश्न उठा रहे हैं, तो विपक्ष का उनके पक्ष में खड़ा होना स्वाभाविक है। लेकिन यहीं से राजनीति और छात्र हितों के बीच की महीन रेखा धुँधली होने लगती है।
पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति का एक बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन और विरोध के इर्द-गिर्द केंद्रित होता गया है। परिणामस्वरूप अनेक ऐसे जनआंदोलन, जिनका मूल उद्देश्य किसी विशिष्ट समस्या का समाधान होता है, धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। NEET आंदोलन में भी यही स्थिति देखने को मिली। अनेक विपक्षी दलों ने छात्रों के आक्रोश को सरकार की व्यापक विफलता के रूप में प्रस्तुत किया। कई मंचों पर शिक्षा व्यवस्था से अधिक केंद्र सरकार की आलोचना प्रमुख विषय बन गई। इससे यह धारणा भी बनी कि कुछ राजनीतिक दल छात्रों की वास्तविक पीड़ा को सरकार विरोधी अभियान में परिवर्तित करने का प्रयास कर रहे हैं।
यह कहना भी उचित नहीं होगा कि केवल विपक्ष ही राजनीति कर रहा था। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष भी अनेक बार आंदोलनों को केवल राजनीतिक षड्यंत्र बताकर उनकी वास्तविक समस्याओं को गौण करने का प्रयास करता है। यदि हर विरोध को विपक्ष की साजिश और हर प्रशासनिक कमी को राजनीतिक षड्यंत्र मान लिया जाएगा, तो समस्याओं का समाधान कभी नहीं निकल सकेगा। लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी शक्ति आरोपों का प्रतिवाद नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रशासन होता है।
भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य यही है कि यहाँ विद्यार्थी जल्दी ही मतदाता में बदल दिया जाता है। छात्र आंदोलन शिक्षा का विषय कम और चुनावी रणनीति का विषय अधिक बन जाता है। एक पक्ष हर समस्या का दोष वर्तमान सरकार पर डालता है, जबकि दूसरा पक्ष हर विरोध को राजनीतिक प्रायोजित बताकर अपनी जिम्मेदारी कम करने का प्रयास करता है। इन दोनों के बीच वह विद्यार्थी खड़ा रह जाता है जिसने वर्षों तक पुस्तकें पढ़ीं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, अपने परिवार के सपनों को अपने कंधों पर उठाया और अंत में राजनीति की भीड़ में स्वयं को अकेला पाया।
यह आंदोलन एक और गंभीर प्रश्न भी उठाता है। क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था अत्यधिक परीक्षा-केंद्रित हो चुकी है? आज लाखों छात्र केवल एक परीक्षा के परिणाम पर अपना पूरा भविष्य निर्भर मानते हैं। असफलता केवल अंक नहीं रह जाती, वह सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य तक को प्रभावित करती है। इस कारण परीक्षा में किसी भी प्रकार की अनियमितता का प्रभाव सामान्य प्रशासनिक त्रुटि से कहीं अधिक व्यापक हो जाता है।
आज आवश्यकता केवल तकनीकी सुधारों की नहीं है। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, परीक्षा केंद्रों की पारदर्शिता, उत्तर पुस्तिकाओं का वैज्ञानिक मूल्यांकन और शिकायत निवारण की विश्वसनीय प्रणाली विकसित करनी होगी। साथ ही चिकित्सा शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण संस्थानों और सीटों की संख्या बढ़ाना भी आवश्यक है, जिससे एक ही परीक्षा पर अत्यधिक दबाव कम हो सके।
समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। क्या हमने अपने बच्चों के सामने सफलता का केवल एक ही मार्ग छोड़ दिया है? क्या डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासनिक अधिकारी बनने की दौड़ में हमने उनकी मानसिक शांति और जीवन का संतुलन छीन लिया है? शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतियोगिता नहीं, व्यक्तित्व निर्माण भी होना चाहिए। यदि विद्यार्थी केवल परीक्षा मशीन बनकर रह जाएगा, तो समाज प्रतिभा तो प्राप्त कर लेगा, पर संवेदनशील नागरिक खो देगा।
अंततः जंतर मंतर का यह आंदोलन केवल NEET की परीक्षा का आंदोलन नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा भी है। यह सरकार से पारदर्शिता, विपक्ष से जिम्मेदार राजनीति, संस्थाओं से निष्पक्षता और समाज से संवेदनशीलता की अपेक्षा करता है। यदि विपक्ष छात्र आंदोलनों को केवल सरकार विरोध का मंच बना देगा और सरकार हर आंदोलन को केवल विपक्ष का षड्यंत्र मान लेगी, तो सबसे बड़ा नुकसान उस पीढ़ी का होगा जो आज भारत के भविष्य का निर्माण करने के लिए संघर्ष कर रही है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मसुधार की क्षमता होती है। जंतर मंतर से उठी यह आवाज़ यदि शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, अधिक उत्तरदायी और अधिक विश्वसनीय बनाने का माध्यम बनती है, तो यह आंदोलन इतिहास में एक सकारात्मक मोड़ के रूप में दर्ज होगा। लेकिन यदि यह केवल सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक और अध्याय बनकर रह गया, तो सबसे बड़ी हार किसी दल की नहीं, बल्कि उन लाखों विद्यार्थियों की होगी जिनकी आँखों में आज भी एक ही सपना है मेहनत का सम्मान हो, अवसर समान हो और न्याय समय पर मिले।
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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
डॉ सुशील शर्मा