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(छठ पर्व पर एक अखंड कविता) : अर्घ्य के जल में झिलमिलता सूर्य

Aditi News Team

Sat, Oct 25, 2025

अर्घ्य के जल में झिलमिलता सूर्य

(छठ पर्व पर एक अखंड कविता)

गाँव की पगडंडियों से उठती धूप की गंध,

मिट्टी में भीगी आस्था की परछाइयाँ,

और घाट की ओर जाती स्त्रियाँ

जिनके सिर पर टोकरियाँ नहीं,

सदियों की परंपरा टिकी है।

गंगा की लहरें जानती हैं

कि आज कोई जल में उतरने नहीं,

स्वयं को पवित्र करने आई है।

नहाय-खाय के दिन

जब व्रती स्नान कर लौटती है,

तो घर का हर कोना

साफ़ जल से धुली आत्मा-सा चमकता है।

कद्दू-भात की सरल सुगंध

भोजन नहीं, एक व्रत की शुरुआत है

जहाँ स्वाद नहीं, संयम की मिठास है।

संध्या ढलते ही खरना का चूल्हा जलता है,

गुड़ की खीर उबलती है,

उसमें घुलते हैं तप, त्याग, और विश्वास।

दिन भर की मौन उपासना

शाम को प्रसाद बनकर

देवता और मनुष्य के बीच पुल रचती है।

व्रती के अधरों पर मुस्कान है

थकान नहीं, तप का तेज है,

और उसकी आँखों में गंगा-जल की तरह

एक शुद्ध लहर बहती है।

फिर आता है वह दिन

जब अस्ताचल सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

पश्चिम की लालिमा में

हर घाट सोने की तरह दमक उठता है।

घुटनों तक जल में खड़ी स्त्रियाँ,

सूप में फल, ठेकुआ, नारियल, गुड़,

और हथेलियों में थरथराता दीप

मानो पूरी सृष्टि का उजाला

उनकी हथेलियों में सिमट आया हो।

सूर्य जल में उतरता है,

पर उनकी आँखों में उगता है।

वे प्रार्थना करती हैं

हे सूर्यदेव, मेरे भीतर के तम को हर लो,

मेरे परिवार को सुख दो,

मेरे कर्मों को प्रकाश दो।

उनके गीतों में जल की लय है,

ढोलक की थाप में मिट्टी की गंध,

और लोक स्वर में जीवन की सहजता।

रात बीतती है जागरण में,

भक्ति के गीतों और चौठचंदा की कथा में।

हर घर से स्वर उठते हैं

न कोई वैदिक मंत्र, न कोई पंडित,

सिर्फ़ स्त्री का नाद,

जो सृष्टि का सबसे प्राचीन स्तोत्र है।

भोर जब हल्के नीले से सुनहरे में बदलती है,

तो घाटों पर शांति उतर आती है।

उगते सूर्य की पहली किरण

जल में झिलमिलाती है,

और व्रती की हथेलियाँ फिर जुड़ जाती हैं।

वह अर्घ्य नहीं देती,

अपना समर्पण देती है

देह, मन, परिवार और विश्वास का।

सूर्य मुस्कराता है

जैसे वह जानता हो कि यह व्रत

किसी व्यक्ति का नहीं,

पूरा मानव धर्म है

जहाँ जल, अग्नि, वायु, आकाश और मिट्टी

सब देव बन जाते हैं।

छठ पर्व का यह लोक उत्सव

धरती और सूर्य का संवाद है,

प्रकृति और मनुष्य का पुनर्मिलन।

यह सिखाता है कि भक्ति

किसी मूर्ति में नहीं,

मिट्टी के कण में भी संभव है।

कि पूजा केवल पंडालों की नहीं,

हृदय के भीतर जलते दीप की भी होती है।

आज जब मनुष्य दूर हो गया है प्रकृति से,

जब कृत्रिम रोशनी ने सूर्य का स्थान लिया है,

छठ हमें याद दिलाता है

कि जीवन का असली प्रकाश

अब भी भोर की पहली किरण में है।

यह पर्व केवल देव-पूजन नहीं,

यह पर्यावरण का व्रत है,

शरीर और आत्मा के संतुलन का उपहार।

हर व्रती जब सूर्य को अर्घ्य देती है,

तो वह स्वयं प्रकाश बन जाती है।

उसके चेहरे पर भोर की लाली उतर आती है,

और उसकी आँखों में चमकता है भविष्य।

यह पर्व स्त्री की सहनशक्ति का उत्सव है,

उसके समर्पण का,

उसके मौन तेज का।

और गीत

*कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगिया में भरल अर्घ…*

धरती से लेकर नभ तक

एक स्वर में गूँजते हैं।

सूर्य उग आता है,

गीत थमते हैं,

पर घाटों पर रह जाती है

सुगंध मिट्टी, गुड़ और श्रद्धा की।

जल में लहरें ठहरी हैं

जैसे वे भी सुन रही हों मनुष्य की प्रार्थना

कि धरती फिर हरी हो,

मन फिर निर्मल हो,

और हर जीवन में फिर उगे एक उजला सूर्य।

छठ यही तो है

जल में खड़ा विश्वास,

आकाश में झिलमिल आशा,

और धरती पर जीवित मनुष्य का प्रणाम।

यह है छठ पर्व

जहाँ सूर्य में ईश्वर है,

और जल में जीवन।

जहाँ स्त्री में श्रद्धा है,

और व्रत में आत्मा।

जहाँ लोकगीत में दर्शन है,

और दर्शन में लोक।

सुशील शर्मा

Tags :

अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

(छठ पर्व पर एक अखंड कविता)

अर्घ्य के जल में झिलमिलता सूर्य

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