कुण्डलपुर में निर्यापक मुनि श्री समतासागर महाराज का 44वां दीक्षा दिवस श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाया गया
“गुरु के व्यक्तित्व से अनुराग ही मेरे वैराग्य का कारण बना” : मुनि श्री समतासागर महाराज
कुण्डलपुर(म.प्र.)। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज का 44वां दीक्षा दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। देश के विभिन्न प्रांतों से पहुंचे श्रद्धालुओं, विद्वानों एवं समाजजनों ने मुनि श्री के 44 वर्षों के संयममय जीवन, तप, स्वाध्याय, गुरु आज्ञापालन और धर्म प्रभावना का स्मरण करते हुए उनके प्रति विनय एवं श्रद्धा समर्पित की। इस अवसर पर आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर महाराज की साधना, त्याग और गुरु परंपरा के आदर्शों को भी श्रद्धापूर्वक नमन किया गया। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि समारोह का शुभारंभ सिद्धक्षेत्र के बड़े बाबा भगवान आदिनाथ के अभिषेक, पूजन एवं भक्तिभाव के साथ हुआ। श्रद्धालुओं ने बड़े बाबा के समक्ष अर्घ्य समर्पित कर युग श्रेष्ठ आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महाराज, वर्तमान आचार्य श्री समयसागर जी महाराज तथा मुनि श्री समतासागर जी महाराज के प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित की। कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय कवि चंद्रसेन जैन भोपाल ने किया। विदिशा की डॉ. शोभा जैन ने विनयांजलि प्रस्तुत की।
मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि दशलक्षण महापर्व की आराधना के बाद क्षमा का आदान-प्रदान हुआ और अब यह शुभ बेला आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर है। उन्होंने कहा कि शुद्धता की प्राप्ति का मार्ग निर्ग्रंथ मुनि दीक्षा है। आचार्य कुंदकुंद स्वामी ने प्रवचनसार के चारित्राधिकार में श्रमणत्व को दुखों से मुक्ति का मार्ग बताया है।उन्होंने स्पष्ट किया कि दीक्षा केवल बाहरी परिवर्तन नहीं, बल्कि अंतरमुखी घटना है। दीक्षा के संस्कारों के माध्यम से साधक जगत और जीवन के रहस्यों को समझते हुए आत्मा के वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़ता है। यह परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है और इसी मार्ग पर चलकर साधक आत्मकल्याण की साधना करते आए हैं।
“गुरु के व्यक्तित्व से अनुराग ही मेरे वैराग्य का कारण बना”—अपने दीक्षा जीवन को स्मरण करते हुए मुनि श्री ने कहा कि उनके परिवार में प्रारंभ से ही धार्मिक वातावरण रहा। मंदिर, पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियां जीवन का हिस्सा थीं। बचपन में सामान्य जीवन के सभी अवसर मिले, लेकिन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के व्यक्तित्व से उत्पन्न अनुराग ने उनके भीतर वैराग्य की भावना को प्रबल किया। उन्होंने कहा कि गुरुवर का व्यक्तित्व ऐसा था कि संसार के अन्य आकर्षण स्वतः फीके लगने लगे। मुनि श्री ने ईसरी में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सान्निध्य में बिताए समय का स्मरण करते हुए बताया कि उस समय पांच साधक आचार्य श्री के निकट रहते थे। एक दिन आचार्य श्री ने पांचों ऐलकों को अलग-अलग बुलाकर दीक्षा के संबंध में संकेत दिया और आपस में इसकी चर्चा न करने को कहा। इसके बाद कुंवार बदी तीज के पावन दिन पांचों साधकों को एक साथ मुनि दीक्षा प्रदान की गई। उन्होंने कहा कि वह क्षण उनके जीवन का अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव था।
कुण्डलपुर की आध्यात्मिक महिमा का उल्लेख करते हुए मुनि श्री ने कहा कि बड़े बाबा की यह पावन भूमि सिद्धक्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित है। कुण्डलपुर की आध्यात्मिक चेतना को देश-दुनिया तक व्यापक रूप में पहुंचाने में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की साधना और तप का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने कहा कि गुरुवर ने कुण्डलपुर की आध्यात्मिक महिमा को जिस व्यापक स्वरूप में समाज के सामने रखा, उसका प्रभाव आज भी दिखाई देता है।
मुनि श्री ने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के जीवन और संदेश का स्मरण करते हुए कहा कि गुरुवर ने अपने जीवन से देह और आत्मा की भिन्नता का संदेश दिया। त्याग, तप, संयम और आत्मजागरण उनका जीवन संदेश रहा। उनके मार्गदर्शन में अनेक मुनिराजों, ऐलकों, क्षुल्लकों और ब्रह्मचारी भैयाओं ने आत्मकल्याण की साधना को आगे बढ़ाया।गुरु के प्रति अपनी भावना व्यक्त करते हुए मुनि श्री ने कहा, “गुरु की कृपा से मैं बांसुरी बना।” उन्होंने कहा कि जिस प्रकार बांसुरी स्वयं कोई स्वर उत्पन्न नहीं करती, बल्कि वादक के स्पर्श से उसमें मधुर स्वर प्रस्फुटित होते हैं, उसी प्रकार शिष्य का जीवन भी गुरु की कृपा और मार्गदर्शन से सार्थक दिशा प्राप्त करता है। शिष्य को अपने अहंकार को छोड़कर स्वयं को गुरु के हाथों में बांसुरी की तरह समर्पित कर देना चाहिए। तभी उसके जीवन से धर्म, संयम और आत्मकल्याण के स्वर प्रस्फुटित हो सकते हैं।
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के समाधिमरण का स्मरण करते हुए मुनि श्री भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि वे स्वयं को उन सौभाग्यशाली शिष्यों में मानते हैं, जिन्हें गुरुवर के अंतिम समय में उनके चरणों में रहने का अवसर मिला। 18 फरवरी 2024 की मध्यरात्रि की स्मृतियों का उल्लेख करते हुए उनकी आंखें नम हो गईं। गुरु के अंतिम क्षणों का यह स्मरण उपस्थित श्रद्धालुओं को भी भावविभोर कर गया।
उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने जिन संस्थाओं, प्रकल्पों, तीर्थ क्षेत्रों और धार्मिक कार्यों की नींव रखी, उन्हें आगे बढ़ाना उनके शिष्यों के साथ समाज की भी जिम्मेदारी है। आचार्य श्री समयसागर महाराज के नेतृत्व में गुरु की भावना, आदर्शों और मूल उद्देश्यों के अनुरूप इन कार्यों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।मुनि श्री ने वर्तमान आचार्य श्री समयसागर महाराज के भोपाल चातुर्मास का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यप्रदेश की राजधानी में बड़े संघ के साथ उनका चातुर्मास पूरे प्रदेश के लिए सौभाग्य का विषय है। उन्होंने श्रद्धालुओं से गुरु परंपरा, संयम और धर्म प्रभावना के कार्यों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
दीक्षा दिवस के अवसर पर मुनि श्री ने साधु-संघ, समाजजनों एवं सभी सहयोगियों से क्षमायाचना भी की। उन्होंने कहा कि आत्मीयता के कारण साधु-संघ में एक-दूसरे के लिए ‘हमारे महाराज जी’ कहने की भावना रहती है। इसके बावजूद जाने-अनजाने मन, वचन या काय से किसी के प्रति कोई प्रमाद, कषाय अथवा अन्य दोष हुआ हो तो वे सभी त्यागीवृंद, साधु-साध्वियों, पिच्छीधारी संतों, समाजबंधुओं, कमेटी कार्यकर्ताओं, शिविर संयोजकों एवं प्रबंधकारिणी से क्षमा मांगते हैं और सभी को क्षमा करते हैं। पूज्य मुनि श्री पवित्र सागर जी महाराज ने भी संबोधित किया। श्रीमती रेशु जैन द्वारा मंगलाचरण की प्रस्तुति,समारोह में मुनि संघ के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए श्रद्धालुओं ने चरण प्रक्षालन , शास्त्र भेंट एवं विनय समर्पण किया। कु. रोशनी ,कु.सेजल द्वारा संगीतमय प्रस्तुति ‘समता सिंधु गुरुनाम’ ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। गुरु भक्ति से ओतप्रोत इस प्रस्तुति के दौरान श्रद्धालु आध्यात्मिक भावों में डूबे नजर आए।समारोह के अंत में कुण्डलपुर की व्यवस्थाओं में प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से सहयोग करने वाले क्षेत्र कमेटी, शिविर संयोजकों, भोजनशाला के पुण्यार्जकों, कार्यकर्ताओं एवं सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। वक्ताओं ने कहा कि सामूहिक सहयोग और समर्पण से कुण्डलपुर में धार्मिक गतिविधियों का संचालन व्यवस्थित रूप से संभव हो रहा है।मुनि श्री समता सागर महाराज का 44वां दीक्षा दिवस गुरु-शिष्य परंपरा, संयम, साधना, आत्मशुद्धि और वैराग्य के उन मूल्यों को स्मरण कराने वाला अवसर बना, जिनसे जैन समाज की आध्यात्मिक चेतना निरंतर प्रेरणा प्राप्त करती है।