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सिहोरा मे पदस्थ न्यायाधीश सुधांशु सिन्हा एवं न्यायाधीश श्रीमति उर्वशी यादव का सिहोरा न्यायालय स्थानांतरण होने पर

: डिजिटल युग और मानसिक स्वास्थ्य: सोशल मीडिया व तकनीक का प्रभाव — विशेष लेख(सुशील शर्मा)

Aditi News Team

Fri, Apr 25, 2025
डिजिटल युग और मानसिक स्वास्थ्य: सोशल मीडिया व तकनीक का प्रभाव — विशेष लेख(सुशील शर्मा) आज हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं, जहाँ तकनीकी उपकरण जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने दुनिया को हमारी उंगलियों तक पहुँचा दिया है। लेकिन इसी तकनीकी सुविधा के बीच मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियाँ भी समानांतर रूप से बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग से तनाव, अकेलापन, अवसाद और आत्म-संदेह जैसी समस्याओं का ग्राफ तेजी से ऊपर गया है।   *आभासी छवियों से आत्म-मूल्यांकन तक*   सोशल मीडिया आज संवाद का सबसे सशक्त माध्यम है। लेकिन जब युवा अपने जीवन की तुलना सोशल मीडिया पर साझा की गई सुखद तस्वीरों और उपलब्धियों से करते हैं, तो वे असंतुष्टि का अनुभव करने लगते हैं। अध्ययन बताते हैं कि 70% किशोर सोशल मीडिया के कारण आत्म-मूल्यांकन में गिरावट महसूस करते हैं।   *स्क्रीन टाइम और मानसिक थकावट*   एक आम व्यक्ति दिन में औसतन 6-7 घंटे स्क्रीन पर बिताता है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम केवल आँखों को ही नहीं, मस्तिष्क को भी थका देता है। परिणामस्वरूप एकाग्रता में कमी, चिड़चिड़ापन और अनिद्रा जैसी समस्याएँ देखने को मिलती हैं।   *"लाइक्स" से आत्म-सम्मान का निर्धारण*   आज का युवा वर्ग सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं से अपने आत्म-सम्मान का मूल्यांकन करता है। किसी पोस्ट पर अपेक्षित प्रतिक्रिया न मिलना उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित करता है। कई मामलों में यह स्थिति अवसाद या आत्मघाती विचारों तक पहुँच जाती है।   *नींद की गुणवत्ता पर असर*   विशेषज्ञ मानते हैं कि रात को मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मस्तिष्क को सतर्क बनाए रखती है, जिससे नींद की प्रक्रिया बाधित होती है। इससे थकावट और अनियमित जीवनशैली जन्म लेती है।   *साइबर बुलिंग और ट्रोलिंग की चुनौती*   डिजिटल स्वतंत्रता के साथ साइबर ट्रोलिंग और बदले की भावना से की गई टिप्पणियाँ मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालती हैं। विशेष रूप से किशोर और युवा इस प्रकार की नकारात्मकता से गहरे प्रभावित होते हैं।   *सतही संवाद बनाम गहरे संबंध*   हालांकि हम हजारों लोगों से डिजिटल माध्यम से जुड़े हैं, परंतु भावनात्मक रूप से अकेलापन बढ़ता जा रहा है। वास्तविक संवादों की कमी भावनात्मक रिक्तता को जन्म देती है, जो मानसिक अस्थिरता का कारण बनती है।   *विकल्प और समाधान*   इन चुनौतियों के बीच समाधान भी उपलब्ध हैं। ‘डिजिटल डिटॉक्स’ की अवधारणा तेजी से लोकप्रिय हो रही है, जिसमें कुछ समय के लिए सभी डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाई जाती है। इसके अतिरिक्त, ध्यान, योग, नियमित व्यायाम, परिवार के साथ समय बिताना, नींद का एक निश्चित समय तय करना और समय-समय पर परामर्श लेना भी अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है।   डिजिटल युग एक दोधारी तलवार है—यह जितना सुविधा देता है, उतना ही नियंत्रण भी माँगता है। मानसिक स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। हमें तकनीक का उपयोग विवेक और अनुशासन के साथ करना होगा, ताकि हम एक स्वस्थ, संतुलित और मानसिक रूप से सशक्त जीवन जी सकें।   — ✒️सुशील शर्मा✒️

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