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: देव शास्त्र गुरु का आलंबन लेंगे तो भव समुद्र पार हो सकते हैं,आचार्य श्री समयसागर जी महाराज

Aditi News Team

Mon, Jun 24, 2024
देव शास्त्र गुरु का आलंबन लेंगे तो भव समुद्र पार हो सकते हैं,आचार्य श्री समयसागर जी महाराज जयकुमार जैन जलज  कुंडलपुर दमोह ।सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र, जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य विद्या शिरोमणि पूज्य आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा किंतु मोह के उदय के साथ प्रत्येक संसारी प्राणी जी रहा है और सुख चाहता है उसके लिए कोई अभीष्ट वस्तु है उसको प्राप्त करने के लिए वह शरण चाहता है तो नवजात जो शिशु है वह किसकी शरण में जाता है बोलो पिता की शरण में ,नहीं वह मां की गोद में जाता है पिता की गोद में जाने से उसे कुछ मिलने वाला नहीं है ।शरण पा लेता है तो उसको शांति मिलती है ।अभीष्ट वस्तु उसे प्राप्त हो जाती है वह निश्चिंत होकर के सो भी जाता है। यह तो नवजात शिशु की बात हो गई इसी प्रकार कोई छात्र है वह किसकी शरण में जाता है विद्या अध्ययन करना चाहता है ज्ञान अर्जन करना चाहता है ज्ञान ही उसको अभीष्ट वस्तु है उसको प्राप्त करने के लिए गुरु का आलंबन आश्रय ले लेता है इसी प्रकार कोई रूग्ण व्यक्ति है और रोग को दूर करना चाहता है क्योंकि रोग के कारण ही उसे पीड़ा हो रही है निरंतर वेदना का अनुभव कर रहा है और उसे वेदना और पीड़ा से मुक्त होने के लिए किसका आलंबन लेता है मां का नहीं ,गुरु का नहीं ,वैद्य का डॉक्टर का आश्रय लेता है ।इसी प्रकार कोई नदी को पार करना चाहता है वह नाव का आश्रय लेता है अथवा तैर करके पार होना चाहता है तैरना आता नहीं तो वह तुम्बी का आश्रय लेता है यह भिन्न-भिन्न व्यक्ति अपनी इच्छित वस्तु को प्राप्त करने यथायोग साधन कारण कलापों को वह ध्यान देता है और आश्रय लेता है ।उसी प्रकार भव समुद्र से हमें पार होना है कि नहीं होना है संसार भव समुद्र से पार होना चाहे उसके लिए किसका आलंबन लेना। देव शास्त्र गुरु इनका आलंबन लेंगे तो भव समुद्र से पार हो सकते हैं ।और देव शास्त्र गुरु का समागम हमें अतीत अनंत काल में कितने बार समागम हुआ आपको ज्ञात नहीं है किंतु उनका आलंबन हमने हृदय से नहीं लिया आलंबन लिया तो होगा किंतु भिन्न-भिन्न इच्छाओं की पूर्ति के लिए आश्रय आधार लिया है और उनकी पूजा आदि की है किंतु भव समुद्र पार नहीं कर पाए ।इसमें देव शास्त्र गुरु का कोई दोष नहीं है। क्योंकि परमात्मभूत है आगम में देव का भी स्वरूप निर्धारित किया है, आगम का भी स्वरूप निर्धारित किया है, गुरु का भी स्वरूप निर्धारित किया है। तो परमार्थ भूत देव शास्त्र गुरु का सानिध्य प्राप्त कर हम भव समुद्र पार नहीं हो पा रहे हैं साधन को अपनाने मात्र से हम भव समुद्र को पार कर जाते हैं तो अभी तक क्यों नहीं किया ।बड़ा प्रश्न है? उसमें कोई दोष नहीं णमोकार मंत्र में कोई अशुद्धि नहीं कोई दोष नहीं उनकी आराधना करते हुए भी भव समुद्र मैं हम पार नहीं हो पाए इसमें निश्चित रूप से स्वयं का ही दोष माना जाता है। इसलिए अपने दोषो को निष्कासित करना शेष रह जाता। साधन तो मिलते रहते है और साधन का मिलना भी बिना पुण्य के उदय के संभव नहीं ।धर्म का समागम अथवा पंच परमेष्ठी का समागम इसके लिए भी पुण्य चाहिए और आप लोग पुण्य संचित करके ही बड़े बाबा के चरणों में बैठे हैं। कुंडलपुर सिद्ध क्षेत्र है लेकिन सिद्ध क्षेत्र में आने के उपरांत भी परिणामों में भी कलुषता बनी रहती है तो सिद्ध क्षेत्र की क्या उपयोगिता है ।साधन नहीं मिलता है तो विशुद्धी नहीं बढ़ती कोई बाधा नहीं साधन मिलने के बाद विशुद्धी ना बड़े तो उसमें किसका दोष है बता दो जितने भी साधन है वहिरंग साधन है वहिरंग साधन के माध्यम से जो अंतरंग रागादिक भाव कर्म के उदय में हो रहे हैं उनको पुरुषार्थ के बल से क्षय किया जाता उसको अंतरंग कारण बोलते । कर्म का क्षय करना है और किसका क्षय करना है कर्म के क्षय करने के लिए वहिरंग जो निमित्त है देव शास्त्र गुरु आदिक हैं उनका आलंबन उनका समागम के लिए आपके पास संचित पुण्य है। उस पुण्य का कोई सदुपयोग करता है तो उसका विकास हो सकता है। संचित पुण्य का यदि दुरूपयोग कर लेता है तो उसका विकास नहीं होगा अवनति होगी ।उन्नति के लिए साधन यह मिले हैं उसका उपयोग करने के लिए आपके पास पुण्य चाहिए।

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