: मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँ (जैव विविधता पर एक कविता)
Thu, May 22, 2025
मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँ
(जैव विविधता पर एक कविता)
सुशील शर्मा
मैं पृथ्वी हूँ।जिन पैरों से तुमने मुझे रौंदा,उनमें मेरी मिट्टी थी।जिस छाया में तुमने विश्राम किया,वह मेरे वनों से निकली थी।तुम्हारे फेफड़ों में जो साँस चल रही है,वह मेरी बनाई हवा है। मैं तुम्हारी जननी थी,मैंने तुम्हें जन्म दियाकेवल मनुष्य नहीं,हिरण को भी, बाघ को भी,तोते, मछली, चींटी को भी।मैंने किसी को कम नहीं दियाऔर किसी को अधिक नहीं छीना।सभी को संतुलन दिया,जीवन की एक विराट श्रृंखला दी,जहाँ एक का जीवन,दूसरे के जीवन की शर्त थी। लेकिन तुमने क्या किया? तुमने संतुलन तोड़ा।तुमने सोचा तुम सबसे श्रेष्ठ हो।तुमने नदियों को बाँध दिया,पहाड़ों को काट डाला,तुमने जंगलों को जला दियाऔर फिर कहा “यह विकास है।” तुम्हारा विकासकितना अलग है मेरे विकास से!मैंने तो बीज से वटवृक्ष बनाया,तुमने वटवृक्ष को कागज़ बना डाला।मैंने सागर रचा, उसमें जीवन बोया,तुमने उसे रसायनों से भर दिया।मैंने जैव विविधता रचीविविध रंग, आकार, वाणी, आचरण।हर जीव में मैंने एक कहानी बुनी,हर फूल में एक रहस्य रखा,हर पक्षी की उड़ान में एक स्वप्न छोड़ा। और तुमने? तुमने उन्हें विलुप्त कर दियाबिना पछतावे,बिना उत्तरदायित्व के।हर साल सैकड़ों प्रजातियाँतुम्हारी अनदेखी सेहमेशा के लिए इस धरती से चली जाती हैं। और फिर तुम शोक मनाते हो“बाघ अब दुर्लभ है,”“पानी अब खत्म हो रहा है,”“जलवायु बदल रही है।” नहीं!यह जलवायु नहीं,तुम बदल रहे होअपने स्वार्थ में, अपनी गति में,अपने अत्याचार में। तुम भूल गएकि तुम अकेले नहीं हो।तुम किसी विशाल जैविकताने-बाने का हिस्सा हो।जिसमें एक सूक्ष्म जीव भीतुम्हारे अस्तित्व के लिए आवश्यक है।एक मधुमक्खी के लुप्त हो जाने सेतुम्हारा पूरा भोजन-चक्र डगमगा सकता है। सतत विकास क्या है? क्या वह गगनचुंबी इमारतें हैंजो धूप को छीन लेती हैं?या वह सड़कें जो नदियों कीराह में दीवार बन जाती हैं? सतत विकास वह हैजो वृक्षों को काटे बिना छाया दे,जो धरती को बाँधे बिना ऊर्जा पैदा करे,जो नदी के गीत को रोके बिनातुम्हें गति दे सके।सतत विकास वह हैजहाँ मनुष्य भी बढ़ेऔर बाकी जीवन भी साँस ले सके। मैं पूछती हूँक्या तुम्हें याद है,जब तुम बच्चे थे,तब तुमने गिलहरी को देखा थाया तितली को हाथ में पकड़ने की चेष्टा की थी?क्या तुम्हारे भीतर आज भीउन लहरों की स्मृति हैजो बिना पूछे भी तुम्हें अपनाती थीं? प्रकृति तुम्हारा उपभोग नहीं चाहतीवह तुम्हारा सहभाग चाहती है।उसे पूजा मत बनाओ,उससे संवाद करो।उससे लड़ो मत,उसके साथ चलो। मुझे खेद है—कि आज जैव विविधता दिवसएक आयोजन बनकर रह गया है।कुछ भाषण, कुछ फोटो, कुछ पोधारोपणऔर फिर वापसउसी पुराने मार्ग परजो केवल विकास कीरफ्तार जानता है,दिशा नहीं। मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँकि तुम रुकोगे।अपनी मशीनों से,अपने अंधे प्रगति-पथ से,और एक बार फिरमेरी आँखों में झाँकोगे।जहाँ अब भी पक्षियों के घोंसले हैं,जहाँ हिरण अब भी डरते हैं,जहाँ झील अब भी सूखने से पहलेआकाश की छाया अपने भीतर सँजोती है। मैं पृथ्वी हूँअब भी जीवन देती हूँ।पर अब चाहती हूँसाझेदारी।तुमसे।तुम्हारे बच्चों से।तुम्हारे विकास से। क्या तुम तैयार हो?अपने भीतर की उस संवेदना कोफिर से जागृत करने के लिए,जो एक तितली के पंखों की थरथराहट मेंसृष्टि की कविता पढ़ सकती है? क्या तुम तैयार हो?विकास को फिर से परिभाषित करने के लिएजहाँ ‘आधुनिक’ होने का अर्थ‘निर्दयी’ होना न हो,बल्कि ‘सहजीवी’ होना हो। क्या तुम तैयार हो?प्रकृति से माफ़ी माँगने के लिएमुझे समझने के लिए,मेरे साथ चलने के लिए। मैं पृथ्वी हूँ,मैं क्षमा कर सकती हूँयदि तुम सचमुच बदल सको।मैं पुनः फूल खिला सकती हूँ,यदि तुम केवलतोड़ने की जगहसीखो सँजोना। अब समय नहीं हैकेवल भाषणों का,अब समय हैसंवेदनाओं को क्रिया में बदलने का। मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँकिसी ऐसे मानव कीजो मनुष्य से आगे बढ़करफिर से ‘जीव’ बन सके। सुशील शर्मा
: अपरा/अचला एकादशी कल
Thu, May 22, 2025
अपरा/अचला एकादशी कल
अपरा का अर्थ है असीमित और इस व्रत को करने से सभी पापों का शमन करने में मदद मिलती है। ओडिशा में इसे जलक्रीड़ा एकादशी कहा जाता है और यह जगन्नाथ जी के सम्मान में मनाई जाती है।ऐसा माना जाता है कि पांडवों ने महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले यह व्रत किया था और विजयी हुए थे।इसी प्रकार एक बार एक धर्मात्मा राजा महीध्वज को उसके दुष्ट छोटे भाई ने मार डाला। अप्राकृतिक मृत्यु के कारण उनकी आत्मा पीपल के पेड़ पर रह गयी। एक बार, ऋषि धौम्य उसी रास्ते पर आए और महीध्वज को राहत देने के लिए, उनके लिए अपरा एकादशी व्रत रखा। इससे महीध्वज को मोक्ष प्राप्त हुआ और तब से, असीमित लाभ प्राप्त करने के लिए यह व्रत मनाया जाता है।
: एक कप चाय और सौ जज़्बात (विश्व चाय दिवस पर एक व्यंग - सुशील शर्मा
Wed, May 21, 2025
एक कप चाय और सौ जज़्बात
(विश्व चाय दिवस पर एक व्यंग - सुशील शर्मा)
आज विश्व चाय दिवस है। चाय, यानी वो द्रव्य जो भारतीय आत्मा में यूँ रच-बस गया है जैसे राजनीति में वादे, या फिल्मों में आइटम सॉन्ग। यह वह अमृत है जो हर दफ़्तर के झगड़े को कुछ मिनटों के लिए विराम देता है, हर बेरोज़गार को ‘फिलहाल व्यस्त’ बना देता है, और हर गॉसिप को एक जायज़ मंच देता है।सुबह की शुरुआत अगर चाय से न हो, तो लगता है सूरज भी किसी कॉर्पोरेट में काम करता है और देर से उठ रहा है। घर में बर्तन भले चमकें न, गैस भले खत्म हो जाए लेकिन "कप भर चाय" का इंतज़ाम हर भारतीय रसोई में ब्रह्मांड के नियमों से भी ज्यादा पक्का होता है।अब देखिए, चाय सिर्फ एक पेय नहीं, एक सामाजिक आन्दोलन है। मोहल्ले की चाय दुकान ही असली ‘लोकसभा’ है जहाँ देश के सारे मसलों का समाधान ढाई इंच के स्टील के गिलास में डूबा पड़ा होता है। वहां बैठा हर आदमी न केवल अर्थशास्त्री होता है बल्कि विदेश नीति का विशेषज्ञ और बॉलीवुड समीक्षक भी।"एक कट देना" बोलने वाला इंसान चाहे कितना भी टूटा हो, उसकी आत्मा में अभी थोड़ा कैफ़ीन बाक़ी होता है।और यह तो मानिए कि चाय, केवल पेय नहीं, रिश्तों की नींव है। कई प्रेम कहानियाँ कट चाय से शुरू होकर परिवार की कटिंग में बदल जाती हैं।दफ्तरों में ‘चाय ब्रेक’ असल में काम से ब्रेक नहीं, सांस लेने का एक मौका होता है, जहाँ बॉस भी ‘सर’ से ‘शर्माजी’ बन जाता है। और वो प्याली पकड़ते हुए जब बॉस कहे “आज बड़ी थकावट है”, तो समझ जाइए कंपनी में लोन एप्लाई करने का सबसे उपयुक्त समय आ गया है।अब सरकारें तो चाय पर चर्चाएँ करती हैं, और नेता गर्व से कहते हैं “मैं तो चाय वाला हूँ।” पर सच बताऊँ ठेले पर दिनभर तपते सूरज में खौलती केतली को प्रेम से देखते हैं, जैसे केतली नहीं कोई संस्कार हो।और उसमें से प्रधानमंत्री बनने का रास्ता जाता हो।लेकिन अब चाय भी वर्ग में बँट गई है , ग्रीन टी, ब्लैक टी, हर्बल टी, और पता नहीं कौन-कौन सी ‘टी’ जो चाय कम, लेबोरेटरी का प्रोजेक्ट ज्यादा लगती है। अरे भई, चाय वो जो कुल्हड़ में खनके, जिसमें अदरक की झन्नाट हो, और जो गले से उतरते ही माँ की फटकार और दादी के हल्के थप्पड़ की याद दिलाए।तो आज इस विश्व चाय दिवस पर, मैं उन तमाम चाय वालों को सलाम करता हूँ जिन्होंने इस देश को नशे में नहीं, नशेड़ी बना रखा है वो भी सिर्फ चाय के।तो आइए एक कप चाय हो जाए?
(शक्कर कम, व्यंग्य थोड़ा ज़्यादा)
✒️सुशील शर्मा✒️