मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँ
(जैव विविधता पर एक कविता)
सुशील शर्मा
मैं पृथ्वी हूँ।जिन पैरों से तुमने मुझे रौंदा,उनमें मेरी मिट्टी थी।जिस छाया में तुमने विश्राम किया,वह मेरे वनों से निकली थी।तुम्हारे फेफड़ों में जो साँस चल रही है,वह मेरी बनाई हवा है। मैं तुम्हारी जननी थी,मैंने तुम्हें जन्म दियाकेवल मनुष्य नहीं,हिरण को भी, बाघ को भी,तोते, मछली, चींटी को भी।मैंने किसी को कम नहीं दियाऔर किसी को अधिक नहीं छीना।सभी को संतुलन दिया,जीवन की एक विराट श्रृंखला दी,जहाँ एक का जीवन,दूसरे के जीवन की शर्त थी। लेकिन तुमने क्या किया? तुमने संतुलन तोड़ा।तुमने सोचा तुम सबसे श्रेष्ठ हो।तुमने नदियों को बाँध दिया,पहाड़ों को काट डाला,तुमने जंगलों को जला दियाऔर फिर कहा “यह विकास है।” तुम्हारा विकासकितना अलग है मेरे विकास से!मैंने तो बीज से वटवृक्ष बनाया,तुमने वटवृक्ष को कागज़ बना डाला।मैंने सागर रचा, उसमें जीवन बोया,तुमने उसे रसायनों से भर दिया।मैंने जैव विविधता रचीविविध रंग, आकार, वाणी, आचरण।हर जीव में मैंने एक कहानी बुनी,हर फूल में एक रहस्य रखा,हर पक्षी की उड़ान में एक स्वप्न छोड़ा। और तुमने? तुमने उन्हें विलुप्त कर दियाबिना पछतावे,बिना उत्तरदायित्व के।हर साल सैकड़ों प्रजातियाँतुम्हारी अनदेखी सेहमेशा के लिए इस धरती से चली जाती हैं। और फिर तुम शोक मनाते हो“बाघ अब दुर्लभ है,”“पानी अब खत्म हो रहा है,”“जलवायु बदल रही है।” नहीं!यह जलवायु नहीं,तुम बदल रहे होअपने स्वार्थ में, अपनी गति में,अपने अत्याचार में। तुम भूल गएकि तुम अकेले नहीं हो।तुम किसी विशाल जैविकताने-बाने का हिस्सा हो।जिसमें एक सूक्ष्म जीव भीतुम्हारे अस्तित्व के लिए आवश्यक है।एक मधुमक्खी के लुप्त हो जाने सेतुम्हारा पूरा भोजन-चक्र डगमगा सकता है। सतत विकास क्या है? क्या वह गगनचुंबी इमारतें हैंजो धूप को छीन लेती हैं?या वह सड़कें जो नदियों कीराह में दीवार बन जाती हैं? सतत विकास वह हैजो वृक्षों को काटे बिना छाया दे,जो धरती को बाँधे बिना ऊर्जा पैदा करे,जो नदी के गीत को रोके बिनातुम्हें गति दे सके।सतत विकास वह हैजहाँ मनुष्य भी बढ़ेऔर बाकी जीवन भी साँस ले सके। मैं पूछती हूँक्या तुम्हें याद है,जब तुम बच्चे थे,तब तुमने गिलहरी को देखा थाया तितली को हाथ में पकड़ने की चेष्टा की थी?क्या तुम्हारे भीतर आज भीउन लहरों की स्मृति हैजो बिना पूछे भी तुम्हें अपनाती थीं? प्रकृति तुम्हारा उपभोग नहीं चाहतीवह तुम्हारा सहभाग चाहती है।उसे पूजा मत बनाओ,उससे संवाद करो।उससे लड़ो मत,उसके साथ चलो। मुझे खेद है—कि आज जैव विविधता दिवसएक आयोजन बनकर रह गया है।कुछ भाषण, कुछ फोटो, कुछ पोधारोपणऔर फिर वापसउसी पुराने मार्ग परजो केवल विकास कीरफ्तार जानता है,दिशा नहीं। मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँकि तुम रुकोगे।अपनी मशीनों से,अपने अंधे प्रगति-पथ से,और एक बार फिरमेरी आँखों में झाँकोगे।जहाँ अब भी पक्षियों के घोंसले हैं,जहाँ हिरण अब भी डरते हैं,जहाँ झील अब भी सूखने से पहलेआकाश की छाया अपने भीतर सँजोती है। मैं पृथ्वी हूँअब भी जीवन देती हूँ।पर अब चाहती हूँसाझेदारी।तुमसे।तुम्हारे बच्चों से।तुम्हारे विकास से। क्या तुम तैयार हो?अपने भीतर की उस संवेदना कोफिर से जागृत करने के लिए,जो एक तितली के पंखों की थरथराहट मेंसृष्टि की कविता पढ़ सकती है? क्या तुम तैयार हो?विकास को फिर से परिभाषित करने के लिएजहाँ ‘आधुनिक’ होने का अर्थ‘निर्दयी’ होना न हो,बल्कि ‘सहजीवी’ होना हो। क्या तुम तैयार हो?प्रकृति से माफ़ी माँगने के लिएमुझे समझने के लिए,मेरे साथ चलने के लिए। मैं पृथ्वी हूँ,मैं क्षमा कर सकती हूँयदि तुम सचमुच बदल सको।मैं पुनः फूल खिला सकती हूँ,यदि तुम केवलतोड़ने की जगहसीखो सँजोना। अब समय नहीं हैकेवल भाषणों का,अब समय हैसंवेदनाओं को क्रिया में बदलने का। मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँकिसी ऐसे मानव कीजो मनुष्य से आगे बढ़करफिर से ‘जीव’ बन सके। सुशील शर्मा