: विप्र समाज तेंदूखेड़ा ने धूमधाम से मनाया परशुराम जन्मोत्सव
Wed, Apr 30, 2025
विप्र समाज तेंदूखेड़ा ने धूमधाम से मनाया परशुराम जन्मोत्सव
सद्गुरु वेद विद्यापीठ परिसर तेंदूखेड़ा में शस्त्र और शास्त्र के ज्ञाता, भगवान विष्णु के छठे अवतार, विप्र कुल भूषण भगवान श्री परशुराम जी का जन्मोत्सव तेंदूखेड़ा की विप्र समाज द्वारा बहुत ही धूमधाम से मनाया गया। भगवान श्री परशुराम जी का जन्मोत्सव एवं अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर तेंदूखेड़ा विप्र समाज ने सद्गुरु वेद विद्यापीठ में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ भगवान श्री परशुराम जी का पूजन-अर्चन कर सामुहिक आरती का आयोजन किया। उद्बोधन की श्रृंखला में कथावाचक आचार्य पं. कृष्णकांत शास्त्री ने कहा भगवान परशुराम ने अपने ज्ञान रूपी परशु एवं शस्त्र रूपी परशु से समाज में व्याप्त विकृतियों का छेदन किया है। समाज के प्रति सभी ब्राह्मणों को जागृत होने, एकजुट होने एवं संगठित होकर कार्य करने की आवश्यकता है, जिसमें अग्रणी भूमिका में युवाओं को रखा जाए एवं वरिष्ठ सभी का संरक्षण मंडल बनाया जाए जिससे कि तेंदूखेड़ा की ब्राह्मण समाज भी आगामी वर्ष का एक भव्य आयोजन कर सके। नगर परिषद अध्यक्ष पं. विष्णु शर्मा ने कहा हमें समाज का एक ऐसा नवीन ढांचा निर्मित करने की आवश्यकता है जिसका नेतृत्व किसी साधारण ब्राह्मण के पास हो जिससे कि समाज एक सटीक दिशा में समाज के उत्थान के लिए कार्य होगा। यदि किसी राजनैतिक व्यक्तियों को हम समाज का नेतृत्व देंगे तो वह उसकी विचारधारा के अनुरूप ही समाज को चलाना चाहेंगे चाहे वह सत्ता पक्ष से हो अथवा विपक्ष से। समाज के लिए समर्पित होकर कार्य करने की आवश्यकता है। ब्राह्मण समाज का भवन बनाना अथवा अन्य कार्यों में समाज के प्रत्येक व्यक्ति से अपनी सामर्थ्य अनुरूप अंशदान को एकत्रित करके ही करना होगा जिससे की समाज के प्रत्येक व्यक्ति को भवन हमारा है कि भावना जागृत हो सके। ब्राह्मण समाज में व्याप्त अनेक समस्याओं को बताते हुए उनके हल को एकजुटता से ही संभव है। वासुदेव प्रसाद बसेडिया ने कहा छोटे अथवा बड़े, विद्वान अथवा सामान्य ब्राम्हण का भेदभाव न रखकर एकसाथ कदम मिलाकर समाज के लिए कार्य करने की आवश्यकता है। पुरषोत्तम बसेडिया ने पूर्व में ब्राम्हण समाज द्वारा किए गए कार्यों को बताते हुए वर्तमान में ब्राम्हणों की स्थिति पर प्रकाश डाला। मुकेश बाजपेई ने कहा हमारा आगामी आयोजन बड़ा भव्य होगा। मोनू पाठक ने कहा समाज के प्रति यदि कल कार्य करेंगे की भावना रखेंगे तो वह कभी नहीं होता है हमें जल्द ही नवीन कार्यकारिणी का गठन करते हुए युवाओं को जिम्मेदारी देना होगा एवं हर क्षेत्र में समाज के उत्थान के लिए एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का आभार सद्गुरु वेद विद्यापीठ आचार्य पं. चंद्रकांत चौबे ने व्यक्त किया। तेंदूखेड़ा विप्र समाज द्वारा पहलगाम में आतंकवादियों द्वारा पर्यटकों पर किए गये आतंकि हमले की कड़ी निन्दा करते हुए दिवंगत आत्माओं के लिए मौन धारण कर श्रद्धांजलि समर्पित की जिसमें बड़ी संख्या में वरिष्ठ एवं युवा ब्राम्हण बंधु उपस्थित रहे।
: जिनमंदिर एव संत निवास का भूमि पूजन संपन्न
Wed, Apr 30, 2025
रिपोर्टर अनिल जैन
जिनमंदिर एव संत निवास का भूमि पूजन संपन्न
सिहोरा,गोसलपुर|| सम्मेदगिरी तीर्थ क्षेत्र में विराजमान निर्यापक पुंगव मुनि श्री सुधासागर जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा की ‘’ तीर्थ क्षेत्र मैं जिनमंदिर जिनमूर्ति की स्थापना मैं अपनी सामर्थता के अनुसार दान करना चाहिए,यह दान फलीभूत होता है।जो व्यक्ति जिनमंदिर निर्माण या मूर्ति स्थापना का भाव रखता है पर सामर्थवान नहीं है उसे आज इस तीर्थ क्षेत्र मैं एक शिला या नारियल भेंट कर ईश्वर से कामना करनी चाहिए की मुझे सामर्थवान बनाये जिससे मैं मंदिर निर्माण अथवा मूर्ति स्थापना का पुण्यकार्य कर सकू।”आप सभी आज अक्षय तृतीया के अवसर पर दान अवश्य करे। मुनि श्री के पावन सानिध्य मैं श्री जिनेश भैया जबलपुर के निर्देशन पर दो जिनालय के भूमिपूजन व शिलान्यास पुण्यार्जक श्री अशोक ममता सेठी कलकत्ता के द्वारा किया गया। संत भवन की आधारशिला रखने का सौभाग्य श्री अनिल अमित अकास मोनू जैन चौधरी परिवार गोसलपुर को मिला।इस तीर्थ क्षेत्र मैं श्री शांतिनाथ अरहनाथ व कुँथनाथ भगवान की पाँच फुट ऊचाई की पद्मासन प्रतिमाएं विराजमान होगी। जिनके लिए दान दाताओं ने अपनी दानराशि की घोषणा की।मूलनायक भगवान ऋषभदेव होंगे। कल से लघु पंच कल्याणक महोत्सव का शुभारंभ मुनि श्री सुधासागर जी के पावन सानिध्य में प्रारंभ होगा।पात्रो का चयन सायं जिज्ञासा समाधान के पश्चात किया जाएगा,अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर मुनि श्री सुधासागर जी की आहार चर्या मोनू जैन के यहाँ सम्पन्न हुई ।
: स्वर नहीं, सुर मिलना चाहिए,
Wed, Apr 30, 2025
स्वर नहीं, सुर मिलना चाहिए
"स्वर नहीं, सुर मिलना चाहिए" — यह कथन मात्र एक भाषाई संयोजन नहीं, बल्कि जीवन की अनेक परतों को छूने वाला गहन विचार है। आज हमारे गाडरवारा की पहचान प्रसिद्ध विचारक, साहित्यकार एवं बहुप्रशंसित अभिनेता आशुतोष राना हमारे आशु भाई से मुलाकात हुई उन्होंने इस पंक्ति के माध्यम से जिस आध्यात्मिक और सामाजिक समरसता की ओर संकेत किया है, वह समकालीन युग में अत्यंत प्रासंगिक है। हालिया मुलाकात में उन्होंने इस कथन की जो व्याख्या प्रस्तुत की, वह केवल कला या संगीत की सीमाओं तक सीमित नहीं, अपितु जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामंजस्य की आवश्यकता को उद्घाटित करती है।
स्वर और सुर का अंतर
स्वर, व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र ध्वनि है — वह जो उसे विशिष्ट बनाती है, उसकी पहचान है। जबकि सुर, वह सामंजस्य है जो सभी स्वरों को एक साथ लयबद्ध करता है। सुर के बिना स्वर केवल शोर है, पर जब स्वर सुर में बदलता है, तो वह संगीत बन जाता है। आशुतोष राना ने स्पष्ट किया कि समाज में भी यदि प्रत्येक व्यक्ति केवल अपना 'स्वर' उच्चारित करता रहेगा, तो केवल मतभेद और कलह उत्पन्न होंगे। लेकिन यदि हम सभी अपने स्वर को सुर में पिरो सकें — अर्थात् परस्पर तालमेल और सामंजस्य स्थापित करें — तो सामाजिक जीवन एक मधुर संगीत बन सकता है।यह विचार साहित्यिक दृष्टिकोण से भी गहराई लिए हुए है। लेखक या विचारक अपने विचारों को स्वर के रूप में प्रस्तुत करता है, परंतु जब वह विचार सामाजिक चेतना से जुड़ता है, तभी वह सार्थक 'सुर' बनता है। यही कारण है कि श्रेष्ठ साहित्य वह होता है जो समाज के भीतर संवाद उत्पन्न करता है, न कि केवल विरोधाभास।राजनीति, धर्म, विचारधारा या परिवार — हर क्षेत्र में आज स्वरों की प्रचुरता है पर सुरों की कमी है। आशुतोष राना का यह कथन हमें यह याद दिलाता है कि विचारों की स्वतंत्रता आवश्यक है, पर उसकी अभिव्यक्ति में जब तक संयम, समरसता और संवेदनशीलता नहीं होगी, तब तक वह केवल संघर्ष का कारण बनेगी।व्यक्तिगत जीवन में भी यह सूत्र अत्यंत उपयोगी है। पति-पत्नी, अभिभावक-बच्चे, मित्र, सहकर्मी — सभी के बीच स्वरों की भिन्नता स्वाभाविक है, किंतु इन स्वरों को सुर में पिरोना ही संबंधों की सच्ची सार्थकता है। राष्ट्रीय जीवन में भी यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। विभिन्न जाति, भाषा, संस्कृति और धर्मों से युक्त भारत तभी एकता का प्रतीक बनता है जब यह विविध स्वर मिलकर सुर बनाते हैं।आशुतोष राना न केवल एक अभिनेता हैं, बल्कि एक चिंतक हैं जिनकी बातें केवल अभिनय की सीमाओं में नहीं बंधतीं। "स्वर नहीं, सुर मिलना चाहिए" उनका यह कथन, एक समरस, संवादशील और संवेदनशील समाज की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह विचार हमें अपने भीतर झाँकने को प्रेरित करता है — क्या हम केवल अपना स्वर ही मुखर कर रहे हैं, या किसी समग्र सुर का हिस्सा बन रहे हैं?यह आलेख केवल एक कथन की व्याख्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक आह्वान है — जहां प्रत्येक स्वर सुर बनकर गूँजे, और जीवन एक मधुर रागिनी बन जाए।✒️
सुशील शर्मा
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