: बच्चों को नशीले उत्पादन बेचने की गहरी साजिश,शोभा शुक्ला
Mon, Jun 2, 2025
जो उद्योग बच्चों को मुनाफा कमाने के लिए नशीले उत्पादनों की लत लगवा रहे हैं, वे सब एक सी ही धूर्त चालें और भ्रामक कूटनीति अपनाते हैं। इन उत्पादनों में शामिल हैं: तंबाकू और निकोटीन, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड (अति-प्रसंस्कृत) खाद्य उत्पाद, और अत्यधिक मीठे पेय पदार्थ,
विश्व स्वास्थ्य संगठन और कॉर्पोरेट अकाउंटेब्लिटी के विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारों को जनहित सर्वोपरि रखते हुए बच्चों को इन उत्पादनों से बचाना चाहिए और ऐसे उद्योग को जवाबदेह ठहराना चाहिए जो मात्र मुनाफ़ा कमाने के लिए बच्चों को ऐसी नशीली लत लगा रहा है और उनको अनेक जानलेवा बीमारियों की ओर झोंक रहा है।कृत्रिम स्वाद (फ्लेवर), अत्यधिक मीठापन, रंग-बिरंगी पैकिंग, ब्रांडिंग, ऑनलाइन, या फिर डिजिटल, विज्ञापन और प्रचार आदि के ज़रिए यह उत्पाद बच्चों की विकसित होती हुई संवेदनाओं को भ्रमित कर इन उत्पादनों के सेवन को 'सामान्य' बना देते हैं। इनके निरंतर बढ़ते उपयोग से,इन बच्चों के लिए अनेक जानलेवा बीमारियों का ख़तरा अनेक गुना बढ़ जाता है। एक ओर उन रोगों का अनुपात बढ़ रहा है जिनसे पूर्णत: बचाव मुमकिन है (और जो इन उत्पादनों के कारण होते हैं) और दूसरी ओर इन उद्योगों के मुनाफे भी आसमान छू रहे हैं।कॉर्पोरेट एकाउंटेबिलिटी की मुख्य शोध अधिकारी अश्का नाइक का कहना है कि जो उद्योग बच्चों को अपने उत्पाद की लत लगा के मुनाफा कमा रहे हैं - जैसे कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य उत्पाद, अत्यधिक मीठे पेय पदार्थ, तंबाकू और निकोटीन उत्पाद बनाने वाले उद्योग। इन उद्योगों ने यह उत्पाद इस कूटनीति से निर्मित, प्रचारित और विक्रय किए हैं जिससे कि बच्चे और युवा इनकी गिरफ्त में आसानी से फँस जाएँ। ऐसे उद्योग को जवाबदेह ठहराने के लिए सरकारों की नीतियाँ जब कमजोर होती हैं तो फिर उन्हें किसका डर? हम सब को एकजुट हो कर सख्त नीतियों की माँग करनी होगी जिससे कि इन उद्योगों को जवाबदेह ठहराया जा सके और भावी पीढ़ियों को इन नशीले उत्पादनों से बचाया जा सके।
यह महज इत्तेफाक नहीं बल्कि योजनाबद्ध तरीके से बच्चों को गुमराह करना है
यह सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है बल्कि योजनाबद्ध तरीके से धूर्तता के साथ किए गए व्यापार और प्रचार का नतीजा है कि बच्चे नशीले उत्पादनों की जकड़ में हैं। उद्योग मुनाफा कमाने के लिए किसी भी हद तक जा रहा है।वैज्ञानिक प्रमाण देखें तो तंबाकू और निकोटीन, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड (अति-प्रसंस्कृत) खाद्य उत्पाद, और अत्यधिक मीठे पेय पदार्थ के कारण गंभीर रोग और असामयिक मृत्यु होती है परंतु उद्योग के दबाव के चलते इन सभी उत्पादनों को 'सामाजिक लाइसेंस' मिला हुआ है। यह सरकारों की असफलता ही है कि वैज्ञानिक प्रमाण को दरकिनार कर इन उद्योगों को मुनाफा कमाने की खुली छूट दे रखी है, भले ही इन उत्पादनों के कारण लोग रोग और मृत्यु का शिकार हो रहे हों।डेनियल डोराडो टोरेस, जो कॉर्पोरेट एकाउंटेबिलिटी में तंबाकू मुक्त दुनिया अभियान के निदेशक हैं, ने कहा कि इन उद्योगों ने जानबूझ कर सरकारों पर दबाव बना कर नीतियां कमजोर कर रखी हैं जिससे कि इनको जवाबदेह न ठहराया जा सके।विश्व स्वास्थ्य संगठन का मत साफ़ है: इन नशीले उत्पादनों जिनमें तंबाकू और निकोटीन, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड (अति-प्रसंस्कृत) खाद्य उत्पाद, अत्यधिक मीठे पेय पदार्थ आदि शामिल हैं, इनके हर प्रकार के प्रचार पर रोक लगे और यह बच्चों की पहुँच से बाहर रखे जाएँ।हायमी आर्सिला जो कोलंबिया स्थित कॉर्पोरेट एकाउंटेबिलिटी के वरिष्ठ शोधकर्ता हैं, ने बताया कि यदि हम इन उद्योगों के व्यापार, प्रचार और प्रसार करने के तरीके का अध्ययन करें तो पाएंगे कि यह सभी एक-सी चालें इस्तेमाल करते हैं। हायमी ने बताया कि 20 सालों तक कोलंबिया में लोकप्रिय खेल फुटबॉल सॉकर को तंबाकू उद्योग प्रायोजित करता रहा। 2009 में कोलंबिया ने तंबाकू उद्योग के इस प्रायोजन पर क़ानूनी प्रतिबंध लगा दिया तब बिना विलंब अल्ट्रा-प्रोसेस्ड (अति-प्रसंस्कृत) खाद्य उत्पाद उद्योग ने पूरी प्रायोजित राशि जमा करवा दी। क्योंकि तंबाकू हो या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य उद्योग, इनको पता है कि फुटबॉल सॉकर के खेल के साथ अपना ब्रांड जोड़ लेने से बच्चों और युवाओं तक वे सरलता से जुड़ सकेंगे और उनको अपने उत्पाद की लत लगवा सकेंगे। 2009 से फुटबॉल सॉकर को कोलंबिया में प्रायोजन करने वाले उद्योगों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य उद्योग, अत्यधिक मीठे उत्पाद उद्योग (सॉफ्ट ड्रिंक आदि), शराब उद्योग, आदि शामिल हैं। तंबाकू उद्योग के प्रायोजन पर 2009 से क़ानूनी प्रतिबंध है।एल पोदर डेल कंज़्यूमीडर मैक्सिको के जेवियर झुनिगा ने कहा कि मेक्सिको में भी यही हाल है - अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य और अत्यधिक मीठे पेय पदार्थ उद्योग के व्यापार, प्रचार और प्रसार का तरीक़ा चालाकी पूर्ण और धूर्त है। बच्चों को आकर्षित करने के आशय से इन उत्पादनों की पैकिंग होती है, दुकानों में विशेष स्थानों पर उनको रखा जाता है, भावनात्मक अपील होती है जिससे कि उत्पादनों का सेवन बच्चों और युवाओं से जुड़ सके, और इन उत्पादनों के नशीले और काले सच पर पर्दा डाल सके।
तंबाकू को जानलेवा, लत लगने वाला और मुश्किल से छूटने वाला उत्पाद जानबूझ कर बनाया गया है।
हायमी ने कहा कि तंबाकू सेवन कोई सांस्कृतिक परंपरा नहीं है। उद्योग ने जानलेवा तंबाकू और निकोटीन उत्पाद को ऐसे बनाया है कि इनके जरा से इस्तेमाल से ही लत लग जाये, नशा हो जाए और छोड़ना अत्यंत मुश्किल हो जाए।
कानूनी रूप से बाध्य वैश्विक तंबाकू नियंत्रण संधि एफसीटीसी
14 देशों को छोड़ दें तो पूरी दुनिया ने कानूनी रूप से बाध्य वैश्विक तंबाकू नियंत्रण संधि को पारित कर रखा है। इस संधि का आर्टिकल 5.3 इन देशों को शक्ति देता है कि वह तंबाकू उद्योग के जन स्वास्थ्य नीति में हस्तक्षेप पर अंकुश लगा सकें और आर्टिकल 19 ताक़त देता है कि तंबाकू उद्योग को तंबाकू और निकोटीन उत्पाद से हो रही जान-माल की क्षति और पर्यावरण के नुकसान के लिए आर्थिक और क़ानूनी रूप से जवाबदेह ठहराया जा सके।इस वैश्विक तंबाकू नियंत्रण संधि को औपचारिक रूप से विश्व स्वास्थ्य संगठन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल (एफटीसी) कहते हैं। इसको लागू हुए 20 साल हो गए हैं।विश्व स्वास्थ्य संगठन की डॉ करस्टीन स्कॉटे ने कहा कि हर 4 सेकंड में विश्व में एक व्यक्ति तंबाकू या परोक्ष धूम्रपान के कारण के कारण मृत होता है। हर साल 80 लाख से अधिक लोग तंबाकू के कारण मृत होते हैं जिनमें से 10 लाख लोग परोक्ष धूम्रपान से मृत होते हैं।
डॉ कर्स्टीन ने कहा कि 13-15 साल के 3.7 करोड़ बच्चे, तंबाकू के नशे में जकड़े हुए हैं।
1 नहीं बल्कि 80 लाख कारण हर साल हैं तंबाकू उद्योग को जवाबदेह ठहराने के लिए
वरिष्ठ जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ तारा सिंह बाम ने कहा कि तंबाकू से होने वाले हर रोग और हर असामयिक मृत्यु से बचाव मुमकिन है। यदि सरकारें ईमानदारी से पूरी तरह से वैश्विक तंबाकू नियंत्रण संधि और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रमाणित तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम को लागू करेंगी तो हर साल 80 लाख लोग मृत होने से बच सकते हैं। जब हमें यह पता है कि तंबाकू सेवन न करने से और परोक्ष धूम्रपान न करने से कोई भी तंबाकू जनित रोग और मृत्यु का शिकार नहीं होगा, तो तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम पूरी ईमानदारी से लागू क्यों नहीं हो रहा है?तंबाकू उद्योग के उत्पाद के सबसे पुराने 80 लाख से अधिक ग्राहक हर साल जब मृत होते हैं, तो जाहिर है कि मुनाफा बढ़ाने के लिए तंबाकू उद्योग धूर्तता के साथ नए बच्चों और युवाओं को गुमराह कर नशेड़ी बनाता है जिससे कि धंधा चलता रहे, मुनाफा आता रहे, मुनाफा बढ़ता रहे - भले ही बच्चों के जीवन का सत्यानाश हो जाये। सवाल तो सरकारों से पूछना चाहिए कि इतने वैज्ञानिक प्रमाण होने के बाद भी जानलेवा उत्पाद क्यों सरलता से बच्चों और युवाओं तक पहुँच रहे हैं?
उद्योग इसलिए फ्लेवर (कृत्रिम स्वाद) का उपयोग करता है क्योंकि युवा उसे पसंद करते हैं!
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य उत्पाद, अत्यधिक मीठे पेय पदार्थ (जैसे कि सॉफ्ट ड्रिंक्स), तंबाकू और निकोटीन उत्पाद में एक बात समान है: इनमें फ्लेवर होते हैं (कृत्रिम स्वाद)। विश्व
बच्चों को नशीले उत्पादन बेचने की गहरी साजिशनहीं करता बल्कि उपयोगकर्ता सरलता से लतेड़ी बन जाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन मुख्यालय की विशेषज्ञ डॉ करस्टीन ने बताया कि एक झूठ जो तंबाकू उद्योग ने फैला रखा है वह यह है कि 'फ़िल्टर' सिगरेट, बिना फ़िल्टर वाली सिगरेट के मुक़ाबले अधिक 'सुरक्षित' हैं। परंतु सत्य यह है कि दोनों, फ़िल्टर या बिना-फ़िल्टर की सिगरेट बराबर की जानलेवा और खतरनाक हैं। फ़र्क़ यह है कि फ़िल्टर सिगरेट पीने वालों को तंबाकू या निकोटीन उतनी कड़वी या कठोर नहीं लगती। फ़िल्टर से जानलेवा सिगरेट पीना सिर्फ आसान हो जाता है, पर तंबाकू के जानलेवा कुप्रभावों का खतरा बरकरार रहता है।डॉ कर्स्टीन ने बताया कि फ़िल्टर के कारण सिगरेट छोड़ना भी अत्यंत मुश्किल हो जाता है। फ़िल्टर के कारण एक अत्यंत गंभीर किस्म के फेफड़े के कैंसर में भी वृद्धि हुई है जो फेफड़े के गहरे क्षेत्र में पनपते हैं। इसीलिए विश्व स्वाथ्य संगठन का मानना है कि फ़िल्टर पर प्रतिबंध लगना चाहिए।जब तंबाकू से हर रोग या असामयिक मृत्यु से बचाव मुमकिन है तो यह सवाल तो सीधा सरकारों से होना चाहिए (जो सतत विकास का वायदा करती हैं) कि तंबाकू सेवन का पूर्ण समापन करने में अभी कितने और साल लगेंगे?(
शोभा शुक्ला, सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापिका संपादिका हैं और लखनऊ के लॉरेटो कॉलेज से सेवानिवृत्त भौतिकी विज्ञान की वरिष्ठ शिक्षिका
: एम.आई.एम.टी. विधि विभाग मे शिक्षण विमर्श सम्पन्न
Mon, Jun 2, 2025
एम.आई.एम.टी. विधि विभाग मे शिक्षण विमर्श सम्पन्न
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत प्रवेश प्रक्रिया, विषय चयन और छात्र-छात्राओं के समग्र व्यक्तित्व विकास की दिशा में शासन की महत्वपूर्ण योजना ’कॉलेज चलो अभियान ’ के उद्देश्य से एम आई एम टी कॉलेज नरसिंहपुर मे शैक्षणिक विमर्श 2025 की श्रंख्ला लगातार छात्र-छात्राओं को लाभान्वित कर रही है। इसी क्रम में विधि संकाय के छात्र-छात्राओं एवं अभिभावकों ने जिले के अधिवक्ताओं से मार्गदर्शन प्राप्त किया। विमर्श कार्यक्रम मे विषय विशेषज्ञ एड. भानू प्रकाश श्रीवास्तव, एड. प्रमोद दुबे, एड. सुलभ जैन, एड.विष्णु श्रीवास्तव,एवं एड. जया शर्मा ने विधि क्षेत्र में रोजगार हेतु सिविल, क्रिमिनल, रेवेन्यू, कम्पनी , कार्पोरेट, तथा विभिन्न फोरम अंतर्गत वकालत के अलावा कानूनी सलाहकार पत्रकारिता, पीएससी , यूपीएससी, सरकारी वकील ,विधि विश्लेषक, विधि शिक्षक, न्यायिक सेवाऐं , विधि आर्मी कोर, लीगल सर्विसेस, विधि शोधकर्ता एवं विधिक सेवा प्राधिकरण में छात्र-छात्राओं को भविष्य निर्माण हेतु प्रेरित किया । आमंत्रित अधिवक्ता उमेश नेमा, प्रदीप पुरोहित, मनीष टुटेजा , सुधीर दुबे, राजेन्द्र शर्मा सहित जेल प्रशासन से अजय डेहरिया ने छात्र-छात्राओं के मार्गदर्शन एवं काउंसलिंग हेतु महाविद्यालय द्वारा स्थापित विभागवार हेल्पडेस्क का भ्रमण किया । प्राचार्य डॉ. अशोक कुमार गर्ग ने महाविद्यालय की विकास यात्रा के 26 सफलतम् वर्ष पूर्ण होने पर अभिभावकों विभिन्न विद्यालयों एवं छात्र-छात्राओं को उनके सहयोग के प्रति आभार प्रगट करते हुए उनके सुझावों को आमंत्रित किया। उल्लेखनीय है कि महाविद्यालय द्वारा उक्त आयोजन म.प्र. शासन उच्च शिक्षा विभाग के कालेज चलो अभियान के अंतर्गत छात्र-छात्राओं को जागरूक करने के उद्देश्य से किया जा रहा है जिससे कोई भी छात्र-छात्रा प्रवेश से वंचित न रह जाए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. पराग नेमा एवं आभार श्रीमती आराधना दुबे द्वारा किया गया। इस अवसर पर डॉ. एसएन राव, श्रीमती अनीता रघुवंशी, डॉ. दीपिका शर्मा, जी डी उमरे एवं सुश्री विजेता सिधना सहित स्टाफ मेम्बर्स एवं छात्र-छात्राओं की उपस्थिति रही।
: श्रम की रोटी पर दोहे,"दो जून की रोटी – किस्तों में बिकती ज़िंदगी”
Mon, Jun 2, 2025
श्रम की रोटी पर दोहे,
( सुशील शर्मा)
श्रम की रोटी श्रेष्ठ है, रहता मन संतोष।ईश्वर का वरदान है ,सच्चा जीवन कोष।। धूप-पसीना एक कर, माटी उपजा अन्न।तब जाकर मिलती हमें,श्रम की रोटी धन्य।। भूखे पेट न हो भजन, रोटी से सब काम।रोटी से जीवन चले, रोटी ही है राम।। भूखे बच्चे देखते, डस्टबीन की ओर।आँखों में आँसू भरे, मुँह में जूठा कौर। आपा-धापी रात दिन, हर पल है संग्राम।श्रम की रोटी श्रेष्ठ है, जीवन का पैगाम।। सूखी रोटी भी लगे, जैसे छप्पन भोग।रोटी के पीछे भगें,जग के सारे लोग। रोटी जब तक पास है, देते तब सब मान।रोटी गर रूठे अगर,सब रिश्ते सुनसान।। संघर्षों की राह पर, गर चलता इंसान।श्रम की रोटी से बढ़े, जीवन में सम्मान। रोटी के भीतर छुपी, टूटे मन की आस।रोटी में ही है निहित , रिश्तों का विश्वास।। श्रम की रोटी में छुपा,ईश्वर का वरदान।भूखे को रोटी खिला, यही है उत्तम दान।।
दो जून की रोटी – किस्तों में बिकती ज़िंदगी”
(एक तीखा सामाजिक-आर्थिक व्यंग्य - सुशील शर्मा)
साहब! दो जून की रोटी मिल जाए, यही क्या कम है!कहने को तो यह एक मासूम-सी तमन्ना लगती है, लेकिन असल में यह वह राष्ट्रीय आपातकाल है जिसे हम ‘सामान्य जीवन’ समझ बैठे हैं। अब देखिए ना...एक तरफ कॉर्पोरेट टॉवर की चमचमाती खिड़कियों के भीतर “वर्क फ्रॉम होम” करते हुए लोग सुबह नाश्ते में एवोकाडो टोस्ट खा रहे हैं, और दूसरी तरफ नाले की पटरी पर बैठा रिक्शेवाला अपनी बीवी से पूछ रहा है –“आज चूल्हा जलेगा कि फिर ख्वाबों की रोटियां सेंकें?”सदियों से इस देश के गरीब की सबसे बड़ी ख्वाहिश यही रही है।कभी इसे संतोष का प्रतीक कहा गया,कभी इसे नियति मानकर टाल दिया गया,और आज के समय में यह एक ऐसा ‘जुमला’ बन चुका है,जो भूख से ज्यादा बेचैनी, और रोटी से ज्यादा राजनीति की गंध देता है।अब सवाल ये है क्या सच में आज भी आम आदमी को दो वक्त की रोटी मिल रही है?या अब वह रोटी नियमों, नीतियों, नाटक और न्याय की प्रतीक्षा में झुलस रही है?
रोटी का रंग अब वर्ग बताता है
भूख सबको लगती है,मगर रोटी का आकार, उसका रंग, उसका स्वाद अब इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तबके से हैं।अमीर आदमी की थाली में ‘मल्टीग्रेन’, ‘लो कार्ब डाइट’, ‘ग्लूटन फ्री रोटियाँ’ सजी हैं साथ में सूप, सलाद और एक्सक्यूज़ मी वेटर!गरीब की थाली?वो थाली नहीं, एक लोहे की तश्तरी है जिसमें आधा पेट भरने लायक चावल,नमक के साथ उबली कोई सब्जी (जिसका नाम न वो जानता है न स्वाद),और एक बासी रोटी जो शायद कल भी वहीं थी।
श्रमिक और रोटी – रोज की दौड़
हर सुबह जब अखबारों में स्टॉक मार्केट के ग्राफ ऊपर जाते हैं,तो देश के करोड़ों श्रमिकों की कमर झुकती जाती है उन्हें शेयर मार्केट की नहीं, रोटी मार्केट की चिंता होती है।बिहार का मजदूर, राजस्थान में भवन निर्माण कर रहा है,तमिलनाडु का युवक, पंजाब की मंडियों में मजदूरी कर रहा हैऔर सबका मकसद एक ही “घर भेजने लायक पैसे इकट्ठा कर लूं, ताकि वहां रोटी जलती रहे।”जिन्हें हम “अनस्किल्ड लेबर” कहते हैं,असल में वही इस देश की “अनदेखी रीढ़” हैं।इनकी मेहनत, इनका पसीना, इनके फटे कपड़े ये सब रोटी की ईएमआई हैं।देश की जीडीपी बढ़ रही है, लेकिन अम्मा के चूल्हे पर अब भी धुआं नहीं उठता।मूल्यवृद्धि इतनी ‘बुद्धिजीवी’ हो गई है कि दाल भी अब थाली में नहीं, टीवी डिबेट में मिलती है।सरकारी घोषणाएं कहती हैं “हर गरीब को अनाज मिलेगा।”और गोदामों में चूहे, लोकतंत्र की तरह, गोदाम फाड़कर खा जाते हैं।
शिक्षा और भूख का गठबंधन
गांव के स्कूलों में मध्यान्ह भोजन योजना आती है,बच्चे स्कूल नहीं आते पढ़ने वे आते हैं रोटी खाने।अभिभावक कहते हैं “पढ़ाई तो बाद में देख लेंगे, पर बच्चा दोपहर में कुछ खा तो लेगा।”इस देश में ‘भूख’ अभी भी शिक्षा से बड़ी जरूरत है।ऑनलाइन शिक्षा का सपना तब सपना ही रह जाता हैजब घर में बिजली नहीं, इंटरनेट नहीं, और पेट खाली हो।
राजनीति – भूख का सबसे पुराना व्यापारी
हर चुनाव में “गरीब की रोटी” सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा होती है चुनाव खत्म होते ही, वही रोटी सत्ताधीशों की थाली में परोसी जाती है।पिछली सरकार कहती है“हमने गरीबों को अनाज दिया।”वर्तमान सरकार कहती है –“हमने मुफ्त राशन बढ़ाया।”और अगली सरकार कहेगी –“हमने थाली में दाल भी दी!”मगर गरीब पूछता है“मुझे रोटी क्यों नहीं मिलती बिना लाइन में लगे, बिना आधार-लिंक, बिना फ़ॉर्म भरे?”अब तो सरकारें गरीबों को राशन देती हैं,पर यह नहीं बताती कि कब तक?और क्यों वो इतना गरीब है कि उसे हर बार “मुफ्त” चाहिए? कोविड काल में मास्क से चेहरा छिपा था,अब पेट की भूख छिपी है।सरकारें कहते हैं – "भविष्य डिजिटल होगा!"पर सवाल ये है – भूख भी ऐप से मिटेगी क्या?एक ऐप आया था "फ्री रोटी योजना"लेकिन नेटवर्क वहीं था जहां रोटी पहले से मुफ्त मिलती थी भाषणों में।
महंगाई – रसोई की सबसे बड़ी साजिश
अब प्याज रोते नहीं, रुलाते हैं।टमाटर अब सब्जी नहीं, निवेश बन गया है।गैस सिलिंडर की कीमतें सुनकर रोटियाँ खुद जल जाती हैं,क्योंकि अब उसे सेंकने के लिए "सब्सिडी" नहीं,बल्कि 'राजनीतिक समीकरण' चाहिए।घर की गृहणी अब "रोटियाँ नहीं गिनती",बल्कि "दिन गिनती है कब यह महीने की कमाई खत्म होगी।"डिजिटल इंडिया में Analog भूखआपके पास UPI है, गूगल पे है, डिजिटल राशन कार्ड है,लेकिन आपके पास अगर भूख है, तो वह ऐप में लॉगिन नहीं होती।सरकारी पोर्टल कहता है “भोजन की गारंटी” ग्रामीण कहता है “नेटवर्क नहीं आ रहा।”अब गरीब को रोटी चाहिए,पर पहले उसे चाहिए बायोमेट्रिक, आधार, OTP, और कभी-कभी स्थानीय प्रतिनिधि की सिफारिश।
वित्त मंत्रालय की नजर में भूख एक आँकड़ा है
जब बजट बनता है,तो किसान और मज़दूर सिर्फ “वर्ग” बन जाते हैं “बीपीएल”, “ईडब्ल्यूएस”, “रूरल पुअर”...लेकिन ये वर्ग किस दिन दो जून की रोटी से ऊपर उठेंगे?किस दिन उनकी थाली में 'सम्मान' परोसा जाएगा?
सोशल मीडिया पर भूख – एक प्रदर्शन
अब गरीब की भूख भी ‘वायरल कंटेंट’ है।किसी बच्चे की वीडियो वायरल हो जाए कि वो मिट्टी खा रहा है,या कोई बुज़ुर्ग सड़क किनारे पड़ा है तो कुछ दिन ‘हाशिये पर आई मानवता’ की बातें होती हैं।फिर अगला मुद्दा आ जाता है और गरीब वहीं रह जाता है अपनी भूख के साथ, अपने गुमनाम अंधेरे में।
मानवीय पहलू अब रोटी भी इज्ज़त मांगती है
भूखा होना अब अपमान नहीं,रोटी मांगना अपमान है।क्योंकि अब लोग दान करते हैं पर दृष्टि से, आवाज़ से, और व्यवहार से एहसास करा देते हैं कि “हम ऊपर हैं, तुम नीचे हो।”अब भीख नहीं मिलती “रोटी की शर्तों” पर सम्मान मिलता है।क्या रोटी अब भी दो जून की है?अब रोटी एक सामाजिक प्रश्न नहीं राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है। जहाँ एक वर्ग फूड वेस्टिंग कर रहा है,वहीं दूसरा वर्ग फूड हंटिंग में है।सवाल अब सिर्फ रोटी का नहीं,सवाल है इंसान के पेट की गरिमा का। रोटी अगर मेहनत से न मिले,तो वह ज़हर हो जाती है।अगर रोटी को दया बनाकर परोसा जाए,तो वह अपमान हो जाती है।अब दो जून की रोटी मिलना कोई जीवन नहीं, एक युद्ध है।यह लड़ाई है गरीबी बनाम महंगाई की,भूख बनाम व्यवस्था की,और इंसानियत बनाम उदासीनता की।सवाल यह नहीं कि रोटी कहाँ है।सवाल यह है कि रोटी के पीछे भागता आदमी अब इंसान बचा भी है या सिर्फ उपभोक्ता?और अगर रोटी के लिए लोकतंत्र चुप हो जाए तो वह लोकतंत्र नहीं, भूख का तंत्र है। ✒️सुशील शर्मा✒️