: वाह रे पर्यावरण दिवस (पर्यावरण दिवस पर एक व्यंग्य आलेख और कविता, सुशील शर्मा)
वाह रे पर्यावरण दिवस
(पर्यावरण दिवस पर एक व्यंग्य आलेख और कविता, सुशील शर्मा)
हर साल 5 जून आता है और अपने साथ लाता है एक खास दिन – पर्यावरण दिवस! यह वो दिन है जब हम सब अचानक से प्रकृति प्रेमी बन जाते हैं। सोशल मीडिया पर हरे-भरे कोट्स की बाढ़ आ जाती है, नेताजी एक पौधा लगाकर फोटो खिंचवाते हैं, और कुछ उत्साही लोग प्लास्टिक के खिलाफ भाषण देते हैं। लेकिन, जैसे ही 6 जून की सुबह होती है, हम फिर से वही पुराने 'पर्यावरण-दुश्मन' बन जाते हैं, अपनी आदतों के दलदल में धँसकर।
पर्यावरण की वर्तमान दशा: एक व्यंग्यात्मक समीक्षा
चलिए, एक नजर डालते हैं हमारे आज के पर्यावरण पर, जहाँ हम खुद ही 'पर्यावरण-संकट' के सूत्रधार हैं।
हवा में घुला ज़हर
हम हर साल दिवाली पर कहते हैं कि पटाखे नहीं जलाएँगे, पर जैसे ही नई गाड़ी आती है, उसकी नंबर प्लेट पर "पर्यावरण-अनुकूल" स्टिकर लगवाकर संतुष्ट हो जाते हैं। साँस लेने के लिए ऑक्सीजन नहीं, बल्कि प्रदूषित हवा मिल रही है, जिसकी कीमत हम अपनी फेफड़ों की बीमारी से चुका रहे हैं। और हाँ, "हवा शुद्ध करने वाले पौधे" तो बस घर के अंदर की सजावट के लिए हैं, बाहर फैक्ट्रियों का धुआँ तो चलता रहेगा!
पानी का रोना
नदियाँ, जो कभी जीवनदायिनी थीं, अब बड़े-बड़े नाले बन गई हैं। उद्योगपतियों के लिए यह "पानी नहीं, अपशिष्ट निकासी का मार्ग" है। घरों में आरओ फिल्टर लगाकर हम खुद को बचा लेते हैं, पर उन मछलियों का क्या जो प्लास्टिक और रसायन पीकर मर रही हैं? और समुद्र? वो तो हमारा सबसे बड़ा कचरादान है, जहाँ प्लास्टिक के पहाड़ तैर रहे हैं। "जल ही जीवन है" का नारा तो बस किताबों में अच्छा लगता है, असल में हम जल को 'जीवाणु का घर' बना रहे हैं।
धरती का बुखार
ग्लोबल वार्मिंग? अरे, यह तो बस विकसित देशों की साजिश है ताकि हम विकास न करें! हम तो एयर कंडीशनर चलाकर, फ्रिज में बोतलें ठंडी करके, और हर दूसरे काम के लिए बिजली फूँककर 'आधुनिक जीवन' जी रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं? समुद्र का स्तर बढ़ रहा है? कोई बात नहीं, हमारे पास तो ऊँची-ऊँची इमारतें बनाने के लिए और जमीन है! और हाँ, पेड़ों की कटाई पर कौन ध्यान देता है, जब हमें नए शॉपिंग मॉल और अपार्टमेंट बनाने हों?
कचरे का साम्राज्य
"रिड्यूस, रीयूज, रीसायकल" - ये तीन शब्द हमारे लिए केवल सोशल मीडिया के हैशटैग हैं। हर चीज सिंगल-यूज प्लास्टिक में पैक होकर आती है और हम उसे तुरंत कूड़ेदान में फेंक देते हैं। कूड़े के पहाड़ इतने ऊँचे हो गए हैं कि उनसे पर्यटक स्थल बनाने का विचार आ रहा है! और ई-कचरा? वो तो हमारे पुराने फोन और लैपटॉप का पुण्य-कर्म है जो धरती को प्रदूषित कर रहा है।
समाधान: क्या कोई आशा है?
तो क्या हम सिर्फ व्यंग्य करके बैठ जाएँ? नहीं, समाधान भी हैं, लेकिन उनके लिए थोड़ी मेहनत और बहुत सारी ईमानदारी चाहिए।
बदलें आदतें, सिर्फ बातें नहीं
हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण की रक्षा कोई सरकारी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है। प्लास्टिक का उपयोग कम करें, बिजली बचाएँ, पानी बर्बाद न करें। यह छोटा सा कदम ही बड़े बदलाव की नींव रखेगा।
सरकारी नीतियाँ और उनका क्रियान्वयन
कानून तो बहुत हैं, लेकिन उनका पालन कहाँ होता है? प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों पर सख्त कार्रवाई हो, नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंडित किया जाए, और हाँ, उन अधिकारियों को भी जो रिश्वत लेकर पर्यावरण को बेचने में मदद करते हैं।
शिक्षा और जागरूकता
बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना होगा। उन्हें सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से पेड़ लगाना, पानी बचाना और कचरा प्रबंधन सिखाना होगा। हमें यह भी समझना होगा कि पर्यावरण दिवस सिर्फ एक दिन का नाटक नहीं, बल्कि हर दिन की जिम्मेदारी है।
नवीकरणीय ऊर्जा की ओर रुख
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा - ये सिर्फ फैंसी शब्द नहीं हैं, बल्कि भविष्य हैं। सरकार और नागरिकों दोनों को जीवाश्म ईंधन से हटकर इन स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को अपनाना होगा।
सामुदायिक प्रयास
केवल सरकार या कुछ जागरूक लोग ही नहीं, बल्कि पूरा समाज जब एकजुट होकर काम करेगा, तभी बदलाव आएगा। अपने मोहल्ले में सफाई अभियान चलाएँ, स्थानीय स्तर पर पेड़ लगाएँ, और अपने आसपास के लोगों को जागरूक करें।
आखिर में, यह पर्यावरण दिवस हमें एक बार फिर सोचने पर मजबूर करता है: क्या हम सिर्फ अपने लिए जी रहे हैं, या आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कुछ छोड़ना चाहते हैं? क्या हम सिर्फ "सेल्फी विद प्लांट" के लिए पर्यावरण प्रेमी बन रहे हैं, या वास्तव में बदलाव लाना चाहते हैं?
पर्यावरण दिवस को सिर्फ एक रस्म अदायगी न बनाएँ, बल्कि इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएँ। क्योंकि अगर हमने आज प्रकृति का सम्मान नहीं किया, तो कल प्रकृति हमें अपना अपमान सहने पर मजबूर कर देगी। और तब, हमारे पास सिर्फ प्रदूषण, बीमारी और "काश" कहने के लिए कुछ भी नहीं होगा।
क्या आप तैयार हैं, सिर्फ 5 जून को नहीं, बल्कि हर दिन पर्यावरण दिवस मनाने के लिए?
"मैं पर्यावरण बोल रहा हूँ..."
(पर्यावरण दिवस पर एक कविता - सुशील शर्मा)
मैं पर्यावरण हूँ।
न तो पेड़ मात्र,
न ही जल का प्रवाह,
न केवल वायु की लय,
न ही मिट्टी की गंध,
मैं वह संतुलन हूँ
जो जीवन को सांस देता है।
मैंने तुम्हें जन्मते देखा,
तुम्हारे पहले कदम,
तुम्हारा पहला हल जोतना,
पहली आग जलाना,
पहली नदी पार करना,
और फिर धीरे-धीरे
तुम्हारा स्वार्थ,
तुम्हारी अधीरता,
तुम्हारा अभिमान भी देखा।
जब तुमने पहाड़ों को खोदा,
मैं चुप रहा।
जब तुमने नदियों को बाँधा,
मैं मौन रहा।
जब तुमने आकाश छू लिया,
मैंने तुम्हें सराहा।
लेकिन जब तुमने धरती को नोचना शुरू किया,
तो मेरी साँसें भारी हो गईं।
आज मैं टूट रहा हूँ,
क्योंकि तुम भूल चुके हो
कि तुम्हारा अस्तित्व
मेरे संतुलन पर टिका है।
अब सुनो
ग्लेशियर पिघल रहे हैं,
समुद्र उफान पर हैं,
वर्षा चक्रीय नहीं रही,
धूप में अब दया नहीं बची,
साँस में ज़हर भर गया है।
प्रजातियाँ
जिन्हें मैंने लाखों वर्षों में
सहेजकर पाला था,
वे अब संग्रहालयों में
नाम मात्र हैं।
हर मिनट
एक पेड़ गिरता है,
हर सेकेंड
एक पक्षी खो जाता है,
हर दिन
मानवता की आत्मा
थोड़ी और खोखली हो जाती है।
फिर भी
मैं विरोध नहीं करता,
मैं पलायन नहीं करता,
मैं बदला नहीं लेता,
क्योंकि मैं माँ हूँ।
लेकिन अब,
अब मुझे बोलना होगा।
अब नहीं चलेगा
केवल भाषणों का झुनझुना,
या पर्यावरण दिवस की
एकदिनी सजावट।
तुम्हें बदलना होगा
अपनी आदतें,
अपनी विकास की परिभाषा,
अपना लालच।
समाधान कोई जादू नहीं,
बस कुछ सच्चे कदम हैं।
हर वृक्ष की जड़ में जीवन समझो।
हर नदी को माँ कहो,
और उसकी सेवा करो।
हर प्लास्टिक के टुकड़े को अपराध मानो।
हर जानवर को सहजीवी समझो,
दया का पात्र नहीं।
शहरों को नहीं
वनों को बढ़ाओ।
ईंट-पत्थर की दीवारों से
ज़्यादा ज़रूरी है
हरियाली की चादर।
अपशिष्ट मत फैलाओ,
अपनी ज़रूरतें सीमित करो।
जल बचाओ,
बिजली कम करो,
मिट्टी को सांस लेने दो।
यह मत भूलो
पृथ्वी तुम्हारे बिना भी
जी सकती है,
पर तुम पृथ्वी के बिना नहीं।
मैं पर्यावरण हूँ,
अब भी जीवित हूँ,
पर अब तुम्हारे निर्णयों पर
मेरा कल निर्भर करता है।
क्या तुम सुन रहे हो?
या अगली आपदा के आने तक
फिर सो जाओगे?
✒️सुशील शर्मा✒️
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