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(भुजरियों का सफर) भुजरियों की हार्दिक शुभकामनाएं : आओ इस बार भुजरियों को,सिर्फ रस्म बनकर न जाने दें, इनकी हरियाली के साथ , रिश्तों में भी हरियाली आने दें।

Aditi News Team

Sat, Aug 29, 2026

भुजरियों का सफर

राखी के अगले दिन

जब आती थीं भुजरियाँ,

सिर्फ हरी-हरी बालियाँ नहीं,

साथ लाती थीं ढेरों खुशियाँ।

घर की मिट्टी से जुड़ी हुई,

स्नेह से सींची जाती थीं,

बेटियाँ, बहनें, माताएँ

मिलकर इन्हें सजाती थीं।

भुजरियाँ देना केवल

एक छोटी-सी रस्म न थी,

इसमें अपनापन बसता था,

यह कोई साधारण प्रथा न थी।

बड़ों के चरणों में देकर

आशीष लिया जाता था,

मिलने वाले हर अपने को

प्रेम से गले लगाया जाता था।

इन छोटी-सी बालियों में

रिश्तों की हरियाली थी,

भाई-बहन के प्रेम के साथ

गाँव-गली की खुशहाली थी।

भुजरियाँ कहती थीं—

रिश्ते केवल खून से नहीं,

सम्मान और अपनापन से भी

सींचे जाते हैं।

पहले भुजरियाँ लेकर बच्चे

घर-घर जाया करते थे,

बड़े-बुजुर्गों से आशीष लेकर

मन में खुशियाँ लाया करते थे।

किसी के घर जाने में संकोच नहीं,

न मिलने में कोई औपचारिकता,

भुजरियों के बहाने मिलते थे लोग,

और बढ़ती थी आत्मीयता।

आज समय बदल गया है,

बदल गए मिलने के अंदाज़,

भुजरियाँ अब भी हैं,

पर कम हो गया वह अपनापन खास।

कहीं यह केवल परंपरा है,

कहीं तस्वीरों का त्योहार,

कहीं औपचारिक-सा मिलना,

कहीं बस एक दिन का प्यार।

फिर भी इन भुजरियों में

आज भी वह शक्ति बाकी है—

जो टूटे रिश्ते जोड़ सके,

जो दूरियों को मिटा सके।

आओ इस बार भुजरियों को

सिर्फ रस्म बनकर न जाने दें,

इनकी हरियाली के साथ

रिश्तों में भी हरियाली आने दें।

भुजरियाँ खेतों की हरियाली नहीं केवल,

मन की हरियाली का संदेश हैं;

बीते कल की सुंदर परंपरा भी,

और आने वाले कल के रिश्तों का परिवेश हैं।

राखी बाँधती है रक्षा का रिश्ता,

भुजरियाँ जोड़ती हैं मन से मन—

यही तो हमारी लोक-संस्कृति है,

यही हमारी परंपरा का सुंदर धन।

(लेखिका निर्मला पाराशर गाडरवारा)

Tags :

अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

(लेखिका निर्मला पाराशर गाडरवारा)

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