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: गाडरवारा,जीवट व्यक्तित्व के धनी थे,श्री जगदीश प्रसाद जी दुबे,नागेन्द्र त्रिपाठी की कलम से 

Aditi News Team

Fri, Dec 27, 2024
जीवट व्यक्तित्व के धनी थे श्री जगदीश प्रसाद जी दुबे,नागेन्द्र त्रिपाठी की कलम से  गाडरवारा,प्रदेश के वरिष्ठ अधिवक्ता पं श्री जगदीश जी दुबे अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी स्मृतियाँ समाज को हमेशा प्रेरित करती रहेगीं, कठोर परिश्रमी,स्पष्ट वक्ता, विद्वान एवं सहयोगी के रूप में उन्हें जाना जायेगा, उनके साथ अनेक स्मृतियाँ हैं, मेरा छोटा भाई महेन्द्र त्रिपाठी उनका जूनियर है उन्हीं के संरक्षण में उसने वकालत सीखी है, पिताजी के देवलोक गमन के पश्चात तर्पण हेतु हम आदरणीय दुबे जी के साथ प्रत्येक वर्ष पुण्य सलिला माँ रेवा के तट जाते थे क्षेत्र के सभी घाटों के साथ सन 2018 में विचार आया कि क्यों न हम मां की प्रदक्षिणा करते हुए उनके घाटों पर तर्पण करें आदरणीय बाबूजी, आदरणीय पं रामविलास जी दुबे, श्री रामकुमार जी कौरव और मैं अपने वाहन से ककराघाट से निकल पडे यहां से होशंगाबाद, खंडवा, बुरहानपुर, भडोच, महेश्वर, बरमान, जबलपुर होते हुए लगभग आठ दिन में अमरकंटक होते हुए पुनः ककराघाट आये मां के अनेक घाटों पर तर्पण किया, प्रत्येक वर्ष किसी तीर्थ स्थान पर पितृमोक्ष अमावस्या को पितरों की विदाई का क़म चलता था उनके साथ जगन्नाथ पुरी, द्वारिका, अयोध्या जी, प्रयागराज, बनारस,कुरूक्षेत्र, मातृ गया (हरयाणा) आदि अनेक स्थानों पर जाने एवं दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ(आपको तीर्थ स्थानो में जगन्नाथ पुरी बहुत ही पसंद था) बिलहेरा (राजमार्ग ) से गाडरवारा आकर छोटे रूप में बकालात करके कठोर परिश्रम से गरधा के पास जमीन क़य की जहां आज पावर प्लांट है,वहाँ आपने कठोर परिश्रम किया कोर्ट के बाद वे अनेक वर्षों तक सीधे खेत पर जाते और वहां के कार्य सम्पन्न कराते, इसके साथ ही आपके अनेक धार्मिक आयोजन, किसानो के आंदोलन के साथ अनेक केसों मे आपको महारत हासिल था, अनेक हस्तियों के आपने के लडे उसमें पूर्व मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह जी चौहान शामिल हैं, आरम्भ में किसानों के आन्दोलनों में बढ चढकर भाग लिया स्वयं पर केस भी बने पर धुन के पक्के आदरणीय दुबे जी कभी विचलित नहीं हुए, हमेशा मुह में पान, मिष्ठान प्रिय एवं मधुर मुस्कान उनकी पहचान रही है,जो उनके नजदीक रहे हैं वे सब जानते है कि आदरणीय बाबूजी जितने कठोर बाहर से दिखते थे उतने मुलायम हृदय से थे, उनकी पहचान बस यही रही कि "जो ठान लिया वह करते थे भलेही उसमें कितना भी बिरोध, हो लोग कुछ भी कहें" पर वो उसे करते, इतनी बडी हस्ती और सहज सरल रहना यह उनका बहुत बडा गुण था, आदरणीय दुबे जी को पढने का बहुत शौक था प्रतिदिन पुस्तक पढते और पढ़ने हेतु सभी को प्रेरित करते, मुझसे कहते तुम पुस्तकालय के पदाधिकारी हो पुस्तक पढा करो और पुस्तकालय के लिए नवीन पुस्तकें क़य कराओ यदि नहीं जा पाते पुस्तक लेने तो मैं चलूंगा समिति के साथ, अनेक प्रसंग हैं उनके जो हमेशा स्मृतियों में रहेगें, जिसके साथ उनकी हसी-मजाक होती थी वह सुनने योग्य रहती थी। आज आदरणीय बाबूजी हमारे बीच नहीं है पर उनकी जीवटता,अखडपन और उनका स्नेह हमेशा स्मृतियों में रहेगा। सादर नमन..... पं नगेन्द्र त्रिपाठी, गाडरवारा

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