: तोल मोल कर बोल, ऐसे बोल का होता मोल,मुनि श्री निरंजन सागर जी
Tue, Feb 14, 2023
*तोल मोल कर बोल, ऐसे बोल का होता मोल**मुनि श्री निरंजन सागर जी*कुंडलपुर ।साइंस ऑफ वर्ड अर्थात शब्द विज्ञान एक ऐसा विज्ञान है, जो अपने आपमें अनोखा रहस्यमय विज्ञान है ।पावर आफ वर्ड अर्थ शब्द की अपनी शक्ति होती है ।इंपैक्ट ऑफ़ वर्ड अर्थात शब्द का अपना प्रभाव होता है ।फोर्स आफ वर्ड अर्थात शब्द की अपनी गति होती है। शब्द विज्ञान के कुछ आधारभूत बिंदु हैं जैसे- शब्द का प्रयोग कब करना कैसे करना कितना करना और क्यों करना। शब्दों का प्रयोग करते समय जिसने इन आधारभूत बिंदुओं का ध्यान रखा है उसके शब्द, शब्द शक्ति को प्राप्त होकर अपना विशेष प्रभाव डालते हैं। जिससे सामान्य शब्द भी विशेषता को प्राप्त हो जाते हैं। शब्द विज्ञान में शब्द का उच्चारण भी अपना विशिष्ट स्थान रखता है। जैसे स्वजन अर्थात संबंधी और श्वजन अर्थात कुत्ता ।कम्युनिकेशन ऑफ वर्ड अर्थात शब्दों का संप्रेषण भी शब्द विज्ञान का महत्वपूर्ण अंग है। जैसे प्राचार्य ने कहा "कल विद्यालय बंद रखा जाएगा" और चपरासी ने सूचना पटल पर लिख दिया "कल विद्यालय बंन्दर खा जाएगा "उच्चारण की स्पष्टता और व्यवस्थित संप्रेषण आपके व्यक्तित्व में भी निखार लाता है। शब्द की भी अपनी गति होती है। शब्द से अर्थ और अर्थ से ज्ञान यह शब्द की गति होती है ।शब्द के अर्थ को जाने बिना वह शब्द हमारे लिए ज्ञान रूप में परिणत नहीं हो पाएगा। फोर्स आफ वर्ड अर्थ शब्द की गति ।वर्ड टु मीनिंग एंड मीनिंग टू नॉलेज ।जैसे मान लीजिए यहां पर कोई कन्नड़ भाषा भाषी व्यक्ति आ जाए और कुछ कहे ।उसके मुख से निकलने वाले शब्द आपको सुनाई बस देते हैं परंतु समझ में नहीं आते हैं ।क्यों? क्योंकि आपको उन शब्दों का अर्थ नहीं पता है ।जिससे उन शब्दों का ज्ञान आपको नहीं हो पा रहा है। ऐसे अर्थ विहीन शब्द गतिमान ना होकर गति रहित ही रहते हैं। वही आपको आपकी भाषा में कुछ कहे तो आप तुरंत समझ जाते हैं। ऐसा क्यों ?क्योंकि आप उन शब्दों के अर्थ से भलीभांति परिचित हैं ।जिससे वह आपके लिए ज्ञान कराने में सहयोगी रहते हैं ।कहा भी है "शब्द ब्राह्मणि निष्णात पर ब्रह्माधिगच्छति" अर्थात शब्द ब्रह्म में पारंगत व्यक्ति पर ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है ।यह सिद्धांत इस बात की सूचना देता है कि साधक को पहले शब्द शक्ति और उसकी मर्यादा तथा भाव का ज्ञान आवश्यक है ।यदि उसे शब्द के वाच्यार्थ, भावार्थ और तात्पर्यार्थ की प्रक्रिया का बोध नहीं है तो वह भटक सकता है। वस्तुतः शब्द भावों के ढोने का एक लंगड़ा साधन है ।जब तक संकेत ग्रहण ना हो तब तक उसकी कोई उपयोगिता ही नहीं है ।एक ही शब्द संकेत भेद से भिन्न भिन्न अर्थों का वाचक होता है ।इसलिए दर्शन शास्त्रों में एक पक्ष यह भी उपलब्ध होता है कि शब्द केवल वक्ता की विवक्षा को सूचित करते हैं ।पदार्थ की वाचक नहीं है ।शब्दों के अनेक अर्थ होते हैं। प्रसंग के अनुसार निकाले गए शब्दों के अर्थ ही सही ज्ञान कराते हैं ।वही शब्द शस्त्र है, वही शब्द शास्त्र है ।वही शब्द बाण है वही शब्द वीणा है ।आज विश्व में जितना विनाश हो रहा है उसका मुख्य कारण शब्द विज्ञान की अनभिज्ञता ही है ।शब्दों का सही संयोग, सही अर्थ के साथ ,सही दिशा में करना हम सबका ध्येय होना चाहिए।संकलन ---जयकुमार जैन जलज हटा
: स्वभाव से शांत, जिनके गुणों का नहीं है अंत ,ऐसे थे महामुनि प्रशांत,मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज
Mon, Feb 13, 2023
स्वभाव से शांत, जिनके गुणों का नहीं है अंत ,ऐसे थे महामुनि प्रशांत,मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराजकुंडलपुर । सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में विनयांजलि व्यक्त करते हुए मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कहा प्रथम बाल यति भगवान वांसुपूज्य स्वामी की निर्वाण स्थली चंपापुर जी सिद्ध क्षेत्र में परम पूज्य निर्यापक श्रमण 108 श्री प्रशांत सागर जी महामुनि राज का समाधि मरण हो गया ।यह वह यात्रा है जो प्रत्येक भव्य आत्मा जीव को अपनी साधना की चरम सीमा पर ले जाती है। प्रत्येक साधक एक भावना यही भाता है कि जब भी मरण हो उसमें देव ,गुरु और शास्त्र की संन्नधि में ही हो। गोटेगांव जिला नरसिंहपुर मध्य प्रदेश में 3 जनवरी 1961 को श्रेष्ठी श्री देवचंद जी एवं मां श्रीमती सुशीला रानी जी के घर चतुर्थ संतान के रूप में आपका जन्म हुआ ।नाम रखा गया "राजेश" यह नाम राजा+ ईश से बनता है ।और आपने इसे सार्थक किया गुरु आशीष से।आपकी संयम की यात्रा भी गोटेगांव से ही प्रारंभ हुई ।18 फरवरी सन 1989 में आपने ब्रम्हचर्य व्रत को अंगीकार किया ।आपके जीवन में सिद्ध क्षेत्र का विशेष संयोग रहा। आपकी सभी दीक्षाएं सिद्ध क्षेत्रों पर ही संपन्न हुई और अंतिम यात्रा भी सिद्ध क्षेत्र पर ही हुई। सिद्ध क्षेत्र मुक्तागिरी में आपकी क्षुल्लक दीक्षा एवं ऐलक दीक्षा तथा सिद्ध क्षेत्र नेमावर में आपकी मुनि दीक्षा आचार्य गुरुवर 108 श्री विद्यासागर जी महाराज के कर कमलों से प्रदान की गई। आपके संघ के कुशल संचालन को देखते हुए आचार्य महाराज ने सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर जी मैं आपको निर्यापक श्रमण पद पर आसीन किया ।अभी भी आप सिद्ध क्षेत्रों की यात्रा पर ही थे। ऐसा पावन संयोग भावी सिद्ध जीव के जीवन में ही आ सकता है। आपका लेखन आपके व्यक्तित्व को दर्शाता है ।आपकी प्रशांत छवि ही आपका परिचय है। आपको भूल पाना इस जीवन में किसी भी पुण्यात्मा को संभव नहीं है । आपने सामाजिक उत्थान ,पाठशाला प्रेरणा, गौ रक्षा आदि अनेकों क्षेत्रों में अभूतपूर्व कार्य किए हैं ।बाल संस्कार को लेकर आप का चिंतन शतत चलता रहता था ।आपका स्मरण हम सभी के लिए संस्मरण से कम नहीं है ।आपकी यात्रा सिद्धत्व तक पहुंचे यही हमारी प्रतिपल मंगल भावना है। आपकी चिर परिचित हंसी हमारी स्मृति पटल पर सदैव बनी रहती है। जो कि विपरीत परिस्थितियों में हमें संबल प्रदान करती है ।इस अवसर पर विन्याजलि में अनिल पुजारी ,कुंडलपुर क्षेत्र कमेटी के पदाधिकारी, कुंडलपुर जैन समाज ,कर्मचारी स्टाफ ने भी अपनी विद्यांजलि प्रस्तुत की।
: जो प्राप्त है वही पर्याप्त है,मुनि श्री निरंजन सागरजी
Sun, Feb 12, 2023
जो प्राप्त है वही पर्याप्त है,मुनि श्री निरंजन सागरजीकुंडलपुर। प्रबंधन के पाठ्यक्रम में भावी प्रबंधकों को एक पाठ अवश्य पढ़ाया जाता है ऑप्टिमम यूजेस ऑफ अवेलेबल रिसोर्सेस अर्थात उपलब्ध संसाधन का अधिकतम प्रयोग ।यह पाठ प्रबंधन कला की रीढ़ है ।आचार्य कहते हैं "किम दारिद्र्यम असंतोष:" अर्थात दरिद्रता क्या है? असंतोष !सबसे बड़ा दरिद्री प्राणी वह है जिसके पास संतोष रूपी धन नहीं है ।एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है "संतोषी सदा सुखी" अपने पास उपलब्ध संसाधन से अपने जीवन को साधना बहुत बड़ा जीवन विज्ञान है । जिसने "साइंस ऑफ लिविंग "जान लिया उसने जीवन के रहस्य को जान लिया ।"हाउ टू लीव सेटिस्फाइड लाइफ" एक संतुष्टि पूर्ण जीवन यापन यह सबसे बड़ी उपलब्धि है। आचार्य कहते हैं संतोष धन जिसके पास है उसके आगे कुबेर के खजाने को भी वह कुछ नहीं समझता ।आज प्रत्येक व्यक्ति शांति चाहता है। सुख चाहता है। परंतु देखने को प्राय विपरीत ही मिलता है ।आज प्राय: करके सभी जगह असंतोष का वातावरण है ।जिसका परिणाम अशांति, कलह , विवाद आदि देखने को सहज ही मिल रहा है। आज इनका हर घर-घर साम्राज्य है ।प्रत्येक व्यक्ति इनसे प्रभावित है। इन सब का सबसे बड़ा प्रभाव बढ़ती हुई नकारात्मकता ।यहां तक की व्यक्ति आज आत्महत्या जैसे कृत्य कर गुजरने में पीछे नहीं हटता। जहां जहां असंतोष है वहां वहां असफलता है ।असंतुष्ट व्यक्ति ही असफल व्यक्ति माना जाता है ।जिसकी संतुष्टि का कोई मापदंड नहीं है, वह व्यक्ति अपने आप को कभी सफल मान ही नहीं सकता है ।आज भारतीय नवयुवक जो विश्व को हिलाने की दम रखता है ।वह स्वयं पश्चिमी सभ्यता की ओर आकृष्ट हो रहा है। आज नवयुवक वर्ग ही सबसे ज्यादा असंतोष से ग्रसित है ।इस अशांत ,कलह भरे वातावरण में दिशा विहीन नवयुवक पीढ़ी मात्र धन व भोगो को ही केंद्र में रख कर भाग रही है ।संतुष्ट रहना या होना जैसे शब्द उनके शब्दकोष में है ही नहीं ।इस ओर और की दौड़ है सब ओर और इस ओर का कोई छोर नहीं होता ।पहले पढ़ाया जाता था आवश्यकता आविष्कार की जननी है ।आज सिखाया जाता है आविष्कार आवश्यकता की जननी है। वर्तमान में युवा वर्ग कहता है" ये दिल मांगे मोर "आचार्य कहते हैं "जो प्राप्त है वही पर्याप्त है"। कौरवों की असंतुष्टि ही महाभारत जैसे महायुद्ध का कारण बनी ।श्री कृष्ण जी जब पांडवों का संदेश लेकर पहुंचे तब उस संदेश को सुनकर दुर्योधन अशांत हो गया। श्री कृष्ण का संदेश बड़ा संतुष्टि परक था ।"दे दो केवल पांच ग्राम रखो अपनी धरती तमाम"। जहां संतोष है ,संतुष्टि है, वहां वहां सफलता है ,शांति है।