: शब्दों का खेल ,कभी मेल ,तो कभी बेमेल, मुनि श्री निरंजन सागर जी
Fri, Feb 17, 2023
शब्दों का खेल ,कभी मेल ,तो कभी बेमेल, मुनि श्री निरंजन सागर जीकुंडलपुर। आचार्यों ने हित ,मित और प्रिय शब्दों का प्रयोग करने को कहा है। हितकारी वचन अर्थात जो दूसरों के लिए और अपने लिए कल्याणकारी हो। जिसमें अपना वा दूसरों का स्वार्थ सधता हो, वे हितकारी वचन नहीं है। इसका अर्थ कल्याण है ना कि स्वार्थ। मितकारी वचन अर्थात संक्षिप्त ,सारगर्भित, सांकेतिक( टू द प्वाइंट)। यदि दो शब्द से काम चल जाए तो तीसरा शब्द बोलने की आवश्यकता नहीं है ।लोकोक्ति भी है कि "समझदार के लिए इशारा ही काफी है"। प्रिय कारी अर्थात अमृतमय सत्य। सामान्य रूप से कहने में यही आता है कि" सच कड़वा होता है।" एक जगह हमें पढ़ने को मिला कि सच केवल कड़वा ही नहीं होता सच अमृत के समान भी होता है। जिनके भीतर विष होता है उन्हें वह विषाक्त मालूम होता है ।पर वह होता अमृतमय है। जिस प्रकार ज्वर से संतृप्त पुरुष को कुछ भी खिलाएं पिलाएं उसे उसका स्वाद कड़वा ही लगता है ।आचार्यों ने स्पष्ट कहा है" सत्यम अपि विपदे" अर्थात ऐसा शब्द जिसमें दूसरों को क्षति पहुंचती हो वह सत्य भी असत्य की श्रेणी में है ।यह मात्र जैन दर्शन में पढ़ने, देखने और जानने को मिलता है। पूरी दुनिया सत्य के बारे में यही मानती है कि जैसा देखा, सुना ,जाना वैसे का वैसा कह दो इसी का नाम सत्य है। आचार्य कहते हैं सत्य वद्- प्रियंवद् अप्रियं न वद्। प्रिय असत्यं अपि न वद्। अप्रियं सत्य कदापि ना वद्। इस प्रसंग को एक उदाहरण से समझते हैं ।एक राजा को अपना चित्र बनवाना था। इसके लिए बहुत सारे कलाकार बुलवाएं। राजा का चित्र तो सुंदर ही बनना चाहिए। पर राजा के साथ मुश्किल यह थी कि उनकी एक आंख नहीं थी ।अब राजा का सुंदर चित्र बनाना है। अगर चित्र सच्चा बनाते हैं तो सुंदर नहीं बनेगा क्योंकि एक आंख नहीं बनेगी ।एक चित्रकार ने कहा इससे कोई मतलब नहीं जो सच है वही बनाएंगे अपन तो। उसने राजा की एक आंख नहीं बनाई बाकी तो सब सुंदर था। राजा को वह चित्र पसंद नहीं आया। दूसरे कलाकार ने सोचा अरे वाह सुंदर बनाना चाहिए। सच से क्या मतलब उसने राजा की दोनों आंखें एकदम दुरुस्त एकदम बढ़िया बना दी ।उसे देखकर राजा ने कहा यह चित्र झूठा है ।सुंदर तो है ।यह प्रिय मालूम पड़ता है लेकिन झूठा है। पहले वाला अप्रिय मालूम पड़ रहा था वह सच्चा था। दोनों ही रिजेक्ट (अस्वीकृत )हो गए ।सच जो प्रिय है वह भी ठीक नहीं है और झूठ जो कि प्रिय है वह भी ठीक नहीं है ।तीसरे कलाकार ने चित्र बनाया राजा बहुत शूरवीर है बलवान है और तीरंदाज है ।वह हाथ में धनुष बाण लिए है और निशाना साध रहे हैं ।निशाना साधने पर एक आंख बंद रहती है। चित्र में इस प्रकार एक आंख बंद दिखाई गई ।वह चित्र पास हो गया ।क्योंकि वह सत्य भी है प्रिय भी है ।आप सब समझ रहे हैं इस बात को ।हमें सत्य भी और प्रिय भी किस तरह से इस बात का ध्यान रखना है। इस प्रकार अपन अगर थोड़ी सावधानी रखकर अपने वचनों का प्रयोग करें तो अपन अपने जीवन को बहुत ऊंचा उठा सकते हैं ।आपके वचन वाद विवाद का कारण न बने। बल्कि सही वचनों का प्रयोग वाद को पलटने की क्षमता रखता है। शब्दों का खेल ,कभी मेल, तो कभी बेमेल ।शब्द अर्थ बने अनर्थ ना हो तभी तो सार्थकता है ।नहीं तो वाद विवाद ।वाद विलोम रूप से कह रहा है वा---द, द---वा। शब्दों में प्राणदायक शक्ति भी होती है और प्राणहारक भी।संकलन-- जयकुमार जैन जलज
: गाडरवारा, रुद्री निर्माण आयोजन शुरू
Thu, Feb 16, 2023
रुद्री निर्माण आयोजन शुरूगाडरवारा। त्रिवेदी कॉलोनी स्थित खकरिया वाले दादा जी के मंदिर में महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर खकरिया वाले दादा जी के आशीर्वाद एवं स्वर्गीय श्रीमती पुष्पा द्विवेदी की प्रेरणा से द्वादश ज्योतिर्लिंग महात्म्य कथा का तीन दिवसीय आयोजन दिनांक 16 अप्रैल गुरुवार से चल रहा है।इस अवसर पर प्रातः 8:00 बजे से 12:00 बजे तक रुद्री निर्माण किया जा रहा है रुद्री निर्माण हेतु भक्तजनों से कोपर साथ में लाने का अनुरोध किया गया है रुद्री निर्माण के पश्चात भगवान भोलेनाथ का अभिषेक स्वामी विश्वनाथ शास्त्री द्वारा प्रतिदिन कराया जा रहा है इसके पश्चात दोपहर तीन बजे से कथा व्यास स्वामी पं विश्वनाथ शास्त्री के श्री मुख से द्वादश ज्योतिर्लिंग महात्म्य कथा भोलेनाथ के भक्तों को श्रवण कराई जा रही है। कार्यक्रम के आयोजक डॉ उमेश द्विवेदी तथा समस्त दद्दा परिवार ने भक्तजनों से अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर पुण्य लाभ लेने की अपील की है।
: जीवन जीना, जीवन को जीतना, भेद कितना, मुनि श्री निरंजन सागर जी
Thu, Feb 16, 2023
जीवन जीना, जीवन को जीतना, भेद कितना, मुनि श्री निरंजन सागर जी
कुंडलपुर ।प्रत्येक प्राणी जन्म को प्राप्त होता है और मरण को भी। परंतु जन्म से मृत्यु की यात्रा को सफल हर कोई नहीं बना पाता। क्यों नहीं बना पाता? यह प्रश्न खड़ा होता है ।जन्म तो सभी प्राणियों ने लिया है। परंतु जन्म लेकर उन्होंने क्या किया ।यह बड़ा महत्वपूर्ण बिंदु है ।हम हमारे जीवन में कई कार्य करते हैं उन सभी कार्यों को करते समय कभी अंदर से यह आवाज आती है कि मैं यह कार्य क्यों कर रहा हूं ।यह अंदर से जो क्यों (?)नामक प्रश्न है.। यही जीवन विज्ञान का आधार है ।जन्म से लेकर मरण तक की यात्रा का चक्र अनवरत चल रहा है ।84लाख योनियों हैं। और इन योनियों को पाकर हमने क्या किया ।साइंस ऑफ लिविंग अर्थात जीवन विज्ञान को जिसने समझ लिया उसने जीवन का रहस्य समझ लिया ।आज अच्छे-अच्छे दार्शनिकों को आप पढ़ते हैं ,सुनते हैं ,देखते हैं ।उन दार्शनिकों के विचार भी बड़े अजीब से है। एक दार्शनिक ने यहां तक कहा कि लाइफ इज प्वांटलेस अर्थात जीवन शून्य है। जीवन आखिरकार है क्या? और जीवन की सफलता का मापदंड क्या है ?यह कुछ ऐसे सनातन प्रश्न है जिनकी खोज युगों से चल रही है ,और खोजकर्ता अपने हिसाब से इनके उत्तर खोज कर अपनी खोज को सफल बनाने पर जुटे हैं। जीवन को आचार्यों ने बहुत सहज शैली में परिभाषित किया है। जिसका भी अर्थात मन वन अर्थात जंगल में भी लग जाए वह जीवन है ।इस जीवन की सफलता का मापदंड भी आचार्यों ने स्पष्ट दिया है ।अपने आत्म तत्व की उपलब्धी प्राप्ति ही सफल जीवन का मापदंड है ।जिस प्राणी को किसी भी वस्तु से ना राग है, ना द्वेष है और ना ही मोह है। ऐसे प्राणी का जीवन ही वाकई में जीवन है ।वरना तो संसारी प्राणी यहां वहां अपना मन लगाता रहता है ।इस मन के रंजन में ही प्राणी ने अपने अमूल्य जीवन को लगा रखा है ।इसी मनोरंजन के कारण ही आज तक उसने अपने में निरंजन तत्व की अलख नहीं जगा पाया है ।इस निज निरंजन आत्म तत्व की प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक तत्व है संसार से प्रीति ।यह संसार से प्रीति जिस दिन संसार से भीति में परिवर्तित हो जाएगी ।उस दिन आपको अपने आप इस जीवन का रहस्य समझने में आने लगेगा ।दर्शन कारों की सोच जहां विराम को प्राप्त होती है वहां पर जैनाचार्यों की सोच प्रारंभ होती है ।इतना सूक्ष्म विवेचन ,इतना गहरा चिंतन अन्य कहीं नहीं भी देखने सुनने और पढ़ने को नहीं मिलता। हम सभी का परम आवश्यक कर्तव्य है कि पूर्वाचार्यों की वाणी को पढ़ें, समझे ,जाने और यथाशक्ति अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें। जीवन को मात्र जिए ही नहीं अपितु जीतने का भी प्रयास करें। जिसने जीने और जीतने के भेद को समझ लिया उसका जीवन शीघ्र ही सार्थक अर्थ तक पहुंच जाता है ।वरना तो यह जन्म मरण का चक्र कभी समाप्त होने वाला नहीं है। कितने पुण्य और पुरुषार्थ से यह मनुष्य योनि मिली है। इसकी सार्थकता नर से नारायण बनने में ही है ।ना कि नर से नार की बनने में ,और ना ही नर से वानर (पशु) बनने में।
संकलन ----जयकुमार जैन जलज