'मेरा तो मेरा है ही’ से ‘न मेरा, न तेरा’ : तक पहुंचना ही आकिंचन्य : मुनि समतासागर जी
Aditi News Team
Thu, Sep 24, 2026
‘मेरा तो मेरा है ही’ से ‘न मेरा, न तेरा’ तक पहुंचना ही आकिंचन्य : मुनि समतासागर जी
कुण्डलपुर(म.प्र.)। दशलक्षण महापर्व के अंतर्गत चल रहे संस्कार शिविर में उत्तम आकिंचन्य धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में ‘मेरा’ और ‘तेरा’ का भाव ही बंधन का सबसे बड़ा कारण है, उत्तम आकिंचन्य धर्म इसी ममत्व से ऊपर उठकर उस स्थिति तक पहुंचने की साधना है, जहां साधक अनुभव करता है कि न कुछ मेरा है और न कुछ तेरा। जो वस्तु आज मेरे पास है, वह न मेरे साथ आई है और न मेरे साथ जाएगी" उपरोक्त उदगार
निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कुण्डलपुर तीर्थक्षेत्र पर संस्कार शिविर के नवमें दिवस उत्तम आकिंचन्य धर्म पर व्यक्त किये।
मुनिश्री ने भरत-बाहुबली के प्रसंग से ममत्व की चार अवस्थाओं को समझाते हुए कहा कि पहली भावना होती है—‘मेरा तो मेरा है ही, तेरा भी मेरा।’ अपनी आवश्यकता पूरी होने के बाद भी दूसरे के अधिकार पर नजर पड़ जाए तो यह भावना जन्म लेती है। दूसरी भावना है—‘मेरा मेरा और तेरा तेरा।’ इसमें व्यक्ति न दूसरे की वस्तु पर अधिकार चाहता है और न अपनी वस्तु किसी को देना चाहता है। तीसरी भावना है—‘तेरा तो तेरा है ही, संतोष नहीं है तो मेरा भी तेरा।’ इसमें व्यक्ति अपना भी दूसरे के लिए छोड़ने को तैयार हो जाता है। लेकिन चौथी भावना है—‘न यह मेरा है, न यह तेरा है।’ यही आकिंचन्य की दिशा है।
मुनिश्री ने कहा कि जब साधक समझ जाता है कि शरीर, संपत्ति, संबंध और संसार की कोई भी वस्तु स्थायी रूप से न उसके पास रहने वाली है और न उसके साथ जाने वाली, तब ममत्व की पकड़ ढीली होने लगती है। जीवन चिड़िया के रैन बसेरे जैसा है—कुछ समय का डेरा और फिर आगे की यात्रा।
भरत-बाहुबली के प्रसंग को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि चक्रवर्ती भरत की दिग्विजय पूर्ण हो चुकी थी, लेकिन उनका चक्ररत्न बाहुबली की सीमा में प्रवेश नहीं कर रहा था। बाहुबली का राज्य अभी उनके अधिकार में नहीं आया था। भरत की सत्ता-विस्तार की भावना ने कहा—‘मेरा तो मेरा है ही, बाहुबली तेरा भी मेरा।’ बाहुबली ने इसका प्रतिकार करते हुए कहा—‘तेरा तेरा है और मेरा मेरा।’
बात युद्ध तक पहुंची। तीनों युद्धों में बाहुबली के सामने भरत को पराजय का सामना करना पड़ा। निर्णायक क्षण में भरत ने आवेश में चक्र चला दिया। इसी क्षण बाहुबली को जीवन की वास्तविकता का बोध हुआ। सत्ता, संपदा और वैभव असार लगने लगे और वैराग्य के भाव जाग उठे। उन्होंने कहा—‘भैया भरत, तेरा तो तेरा है ही, संतोष नहीं है तो मेरा भी तेरा संभालो, मैं जाता हूं।’ इसके बाद बाहुबली आत्मसाधना की ओर बढ़ गए।
मुनिश्री ने कहा कि ध्यान में खड़े बाहुबली के भीतर भी आत्ममंथन हुआ कि मैं किस ‘तेरा-मेरा’ में उलझा था? आत्मा का स्वभाव तेरा-मेरा मानना नहीं है। वास्तविकता है—न तेरा है, न मेरा है। सोते समय आंखें बंद होती हैं तो स्वप्न दिखाई देता है और आंख खुलते ही स्वप्न समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार यह संसार भी खुली आंखों का स्वप्न है, जो आंखें बंद होते ही पीछे छूट जाने वाला है।
ममत्व की स्थिति को समझाने के लिए उन्होंने एक सेठ और उसके पुराने सेवक का प्रसंग सुनाया। सफाई करते समय सेवक के हाथ से सेठ की वर्षों पुरानी कीमती घड़ी गिरकर टूट गई। सेवक ने अपनी गलती स्वीकार कर क्षमा मांगी। सेठ ने उसे डांटा और बाद में क्षमा कर दिया। सेवक निश्चिंत होकर चला गया कि गलती स्वीकार कर क्षमा मांग ली, बात समाप्त हो गई।
लेकिन सेठ रातभर घड़ी के नुकसान को लेकर परेशान रहा। मुनिश्री ने कहा कि यही अंतर बताता है कि वस्तु का छूट जाना पर्याप्त नहीं है, उसके प्रति मन का मोह छूटना जरूरी है। बाहरी रूप से वस्तु हमारे पास हो या न हो, वास्तविक बंधन उसकी मानसिक पकड़ से बनता है।
उन्होंने कहा कि दशलक्षण की पूरी यात्रा इसी आंतरिक परिवर्तन की यात्रा है। क्षमा से शुरू हुई यात्रा मृदुता, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप और त्याग से गुजरती हुई आकिंचन्य तक पहुंचती है। लेकिन यहां केवल वस्तुओं का त्याग पर्याप्त नहीं है, बल्कि ‘मैंने त्याग किया’ इस भाव का भी त्याग करना है। जब त्याग के भाव से भी मन मुक्त होगा, तब निर्विकल्पता और निर्द्वंद्वता की स्थिति विकसित होगी।
मुनिश्री ने कहा कि मन की निर्विकल्पता ही वास्तविक सुख और आनंद देती है। अकेले व्यक्ति के भीतर भी विकल्पों का शोर हो सकता है और भीड़ के बीच रहने वाला साधक भी भीतर से शांत रह सकता है। शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, मन की अवस्था से पैदा होती है। कुंडलपुर का दस दिवसीय संस्कार शिविर इसी साधना के अभ्यास की प्रयोगशाला है।
उन्होंने शिविरार्थियों से कहा कि यहां सीखे सूत्रों को केवल दस दिनों तक सीमित न रखें, बल्कि वर्षभर जीवन में उनका प्रयोग करें। यदि परिणाम अनुकूल न आए तो विधि को दोष देने के बजाय अपनी समझ और प्रयोग की समीक्षा करें। निरंतर अभ्यास से ही साधना जीवन का हिस्सा बनेगी।मुनिश्री ने कहा कि दशलक्षण आराधना के लिए वर्ष में एक बार होने वाले शिविर की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। दशलक्षण पर्व के अवसरों पर गांव-नगरों में छोटे स्तर पर भी संस्कार शिविर और आराधना शुरू की जा सकती है। सौ-पचास लोगों से शुरुआत होगी तो धीरे-धीरे परंपरा विकसित होगी। धर्म के लिए पहल करने वाले व्यक्ति को हमेशा भीड़ का इंतजार नहीं करना चाहिए। साहस से शुरू किया गया सही कार्य आगे चलकर दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
उन्होंने विषय, प्रसंग और समय की महत्ता बताते हुए कहा कि हर बात अच्छी और सही हो सकती है, लेकिन उसका प्रभाव तभी होता है जब उसे उचित समय और प्रसंग देखकर कहा जाए। जैसे गणित के प्रश्न का उत्तर गणित के प्रश्नपत्र में और अंग्रेजी के प्रश्न का उत्तर अंग्रेजी के प्रश्नपत्र में दिया जाता है, वैसे ही जीवन में भी समय और परिस्थिति के अनुरूप वाणी और व्यवहार होना चाहिए। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जयकुमार 'जलज' ने बताया शुक्रवार अनंत चतुर्दशी के दिन प्रातः अभिषेक एवं शांतिधारा के उपरांत वांसुपूज्य भगवान के निर्वाण कल्याणक महोत्सव पर निर्वाण लाडू चढ़ाया जायेगा।
Tags :
अदिति न्यूज (सतीश लमानिया)
मुनि समतासागर जी महाराज