फिर लौटे हम — अपने बचपन की ओर
(मित्र मिलन पर कविता)
सालों बाद,
समय के इतने लंबे गलियारे पार कर
हम लौटे हैं वहीं,
जहाँ से कभी निकले थे
सपनों, जिज्ञासाओं और अधूरे विश्वासों से भरे हुए।
गाडरवारा के उस गेस्ट हाउस में
केवल हम नहीं पहुँचे,
पहुँची हैं हमारी यादें,
हमारे बीते हुए वर्षों की हँसी,
हमारे संघर्षों के धूल भरे पन्ने,
और वे सब चेहरे,
जिन्हें समय ने भले झुर्रियों में बदल दिया हो,
पर आँखों की चमक में अब भी
वही किशोर धूप खिली है।
बी.टी.आई.
ये तीन अक्षर,
अब कोई इमारत नहीं रहे,
ये अब हमारे भीतर की मिट्टी हैं,
जिसमें बोए थे हमने
पहली आकांक्षाओं के बीज।
राजेश की आवाज़ में अब भी
वही नेतृत्व की दृढ़ता है,
संदीप के हास्य में
वही बेफिक्री की गूँज,
प्रसन्न की सहजता में
वर्षों की तपस्या की गरिमा।
सुशील ने जब अपनी किताबें बाँटी,
तो लगा
समय भी किसी कवि की तरह
अपनी स्मृतियाँ बाँटता है।
धर्मेंद्र, अजीत,
राजकुमार, योगेन्द्र,
हर चेहरा मानो स्मृति की नदी से निकलकर
फिर हमारे पास आ बैठा
जैसे सालों बाद कोई गीत
रेडियो पर फिर बज उठा हो।
कितनी सहजता से बीते हुए क्षण
आज की साँसों में घुल गए हैं
जैसे हँसी के साथ लौट आई हो
कोई अधूरी बातचीत,
कोई अपूर्ण स्पर्श,
कोई अधूरा प्रण।
हम सब,
अपने-अपने जीवन के भार उठाए,
कर्म के मैदान में भटके हुए यात्री हैं,
पर इस मिलन ने
हमारी आत्मा के उस हिस्से को छुआ है
जो अब तक निश्चल था।
हमारे बाल सफ़ेद हुए हैं,
पर मन के भीतर जो बालक था
वह आज फिर स्कूल के मैदान में दौड़ पड़ा है।
वो गलियों का शोर,
वो ब्लैकबोर्ड की खड़िया,
वो झगड़े, वो सुलहें
सब लौट आए हैं
मानो समय ने स्वयं कहा हो
“चलो, थोड़ी देर के लिए
फिर से वही बन जाओ, जो तुम थे।”
इस मिलन में
कोई मंच नहीं था,
कोई औपचारिकता नहीं,
बस एक आंतरिक लय थी
स्मृति की, अपनत्व की,
और उस मधुर मौन की
जो केवल सच्चे मित्रों के बीच होता है।
किसी ने हँसते हुए कहा मनोज से कहा,
अरे यार, तू तो वैसा ही चिकना है अब तक!”
और भीतर कहीं एक हल्की नमी उतर आई
कितना कुछ बदल गया,
फिर भी कितना कुछ वही है।
नीलकुंड में अगले मिलन की बात
जैसे कोई प्रतीक बन गई
कि यह यात्रा अब केवल यादों की नहीं,
एक जीवंत धारा है,
जो हमें एक-दूसरे से जोड़ती रहेगी।
आज जब सब लौट रहे हैं
अपने-अपने शहरों, परिवारों, जीवन में,
तब भी भीतर कहीं एक उजाला बचा है
जो इस मिलन की मुस्कुराहट से जन्मा है।
यह मिलन केवल
पुराने मित्रों का संगम नहीं,
यह आत्मा का उत्सव है,
जहाँ हम सभी ने
अपनी थकान उतारी,
अपना अपनापन पाया,
और जीवन के प्रति
एक नई आस्था जगाई।
बी.टी.आई. केवल एक संस्था नहीं थी,
वह एक समय था,
जो अब भी हमारे भीतर साँस लेता है।
आज,
हम सभी उस समय के जीवित प्रतीक हैं
मित्रता, स्मृति और मानवता के।
सुशील शर्मा