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: आद्य शंकराचार्य: हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के सूर्य और वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता

Aditi News Team

Fri, May 2, 2025
आद्य शंकराचार्य: हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के सूर्य और वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता (आलेख) आद्य शंकराचार्य, एक ऐसा नाम जो भारतीय दर्शन और हिंदू धर्म के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। आठवीं शताब्दी के प्रकांड विद्वान और दार्शनिक, शंकराचार्य ने न केवल खंडित और विकृत हो रहे हिंदू धर्म को पुनर्जीवित किया, बल्कि अद्वैत वेदांत के अपने अद्वितीय दर्शन से भारतीय चिंतन परंपरा को एक नई दिशा भी प्रदान की। उनका संक्षिप्त, तेजस्वी जीवन भारतीय आध्यात्मिक इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जो सदियों बाद भी हमें ज्ञान और प्रेरणा प्रदान करता है।   शंकराचार्य का जन्म केरल के कालड़ी नामक ग्राम में एक नम्बूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके जन्म की तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है, परंतु आमतौर पर यह माना जाता है कि उनका जीवनकाल 788 ईस्वी से 820 ईस्वी तक रहा। अल्पायु में ही उनके पिता का देहांत हो गया था और उनकी शिक्षा-दीक्षा उनकी माता, आर्याम्बा की देखरेख में हुई। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी शंकर ने आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों का कंठस्थ ज्ञान प्राप्त कर लिया था। सांसारिक बंधनों से विरक्त होकर उन्होंने संन्यास ग्रहण करने की तीव्र इच्छा व्यक्त की, जिसे उनकी माता ने अनिच्छा से स्वीकार किया।   संन्यास ग्रहण करने के पश्चात, शंकर ने गुरु गोविंद भगवत्पाद से दीक्षा प्राप्त की और अद्वैत वेदांत के गहन अध्ययन में लीन हो गए। गुरु की आज्ञा से उन्होंने भारतवर्ष का भ्रमण किया और विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों के विद्वानों के साथ शास्त्रार्थ किया। उन्होंने बौद्ध और जैन धर्म के बढ़ते प्रभाव को चुनौती दी और वैदिक धर्म की श्रेष्ठता को स्थापित किया। उनकी तार्किक क्षमता, वाक्पटुता और असाधारण ज्ञान के आगे उनके विरोधी नतमस्तक हो जाते थे। शंकराचार्य ने अपने छोटे से जीवनकाल में हिंदू धर्म की नींव को सुदृढ़ करने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उन्होंने उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता पर भाष्य लिखकर अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को सरल और सुगम भाषा में प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है और यह जगत माया है। आत्मा और ब्रह्म अभिन्न हैं, और अज्ञान के कारण ही जीव स्वयं को ब्रह्म से अलग मानता है। ज्ञान के द्वारा इस अज्ञान को दूर करके मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने भारत के चारों कोनों में चार मठों - श्रृंगेरी (दक्षिण), गोवर्धन (पूर्व), शारदा (पश्चिम) और ज्योतिर्मठ (उत्तर) की स्थापना की। ये मठ आज भी हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण केंद्र बने हुए हैं और धार्मिक शिक्षा, दर्शन और परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन मठों की स्थापना से शंकराचार्य ने बिखरे हुए धार्मिक समुदायों को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया और हिंदू धर्म को एक संगठित स्वरूप प्रदान किया। शंकराचार्य ने विभिन्न देवी-देवताओं की उपासना पद्धतियों को एकीकृत किया और पंचायतन पूजा की स्थापना की, जिसमें सूर्य, विष्णु, शिव, शक्ति और गणेश की आराधना एक साथ की जाती है। इससे विभिन्न संप्रदायों के बीच समन्वय स्थापित हुआ और धार्मिक एकता को बल मिला। उन्होंने कई स्तोत्रों और भजनों की रचना भी की, जो आज भी भक्ति और उपासना में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।   वर्तमान समय में भी आद्य शंकराचार्य की प्रासंगिकता अद्वितीय है। आज जब विश्व भौतिकतावाद और उपभोक्तावाद के जाल में उलझता जा रहा है, शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत हमें आत्म-ज्ञान और आंतरिक शांति का मार्ग दिखाता है। उनका दर्शन हमें यह सिखाता है कि सच्ची खुशी बाहरी वस्तुओं में नहीं, बल्कि अपने भीतर की अनंत क्षमता को पहचानने में है। आज जब धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिकता समाज में विष घोल रही है, शंकराचार्य का समन्वयवादी दृष्टिकोण हमें विभिन्न धर्मों और विचारों के प्रति सहिष्णुता और सम्मान का भाव रखने की प्रेरणा देता है। उन्होंने जिस प्रकार विभिन्न दार्शनिक मतों के साथ संवाद स्थापित किया और सत्य की खोज को महत्व दिया, वह आज भी अनुकरणीय है।   पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में भी शंकराचार्य के विचार महत्वपूर्ण हैं। उनका अद्वैत वेदांत समस्त सृष्टि को ब्रह्म का ही रूप मानता है, जिससे प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण का भाव स्वतः ही उत्पन्न होता है। आज जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण प्रदूषण जैसी वैश्विक समस्याएं मानवता के सामने चुनौती बनकर खड़ी हैं, शंकराचार्य का यह दृष्टिकोण हमें प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने का संदेश देता है। तकनीकी प्रगति और आधुनिक जीवनशैली के दबाव में, जब मनुष्य तनाव और मानसिक अशांति से ग्रस्त है, शंकराचार्य के योग और ध्यान संबंधी विचार हमें मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त करने में सहायक हो सकते हैं। उनका आत्म-अनुशासन और वैराग्य का संदेश हमें अनावश्यक इच्छाओं और आसक्तियों से मुक्त होकर एक संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।   संक्षेप में, आद्य शंकराचार्य न केवल आठवीं शताब्दी के एक महान दार्शनिक और धर्मगुरु थे, बल्कि वे एक ऐसे दूरदर्शी संत थे जिनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे। उन्होंने हिंदू धर्म को एक नई पहचान दी, भारतीय दर्शन को एक नई दिशा प्रदान की और हमें आत्म-ज्ञान, समन्वय और प्रकृति के साथ सद्भाव का शाश्वत संदेश दिया। उनका जीवन और दर्शन आज भी हमें सत्य, ज्ञान और नैतिकता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा। ✒️सुशील शर्मा✒️

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