: गाडरवारा की भुजरियां,(भुजरियों के पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं)
गाडरवारा की भुजरियां
( सुशील शर्मा)
वह समय,
जब सूरज की पहली किरणें भी
गाडरवारा को राखी बांध कर सो रही थीं
सुबह लहराए से उठे वे जवारे,
गेहूँ के सिरों की सादगी लिए,
मन की गहराइयों से जुड़े,
एक अनकहा संदेश लिए।
गाडरवारा की मिट्टी से जुड़ा वह इतिहास,
जिसमें बुंदेलखंड की धूप और धूल ने
अनेक युगों तक संवारा इस धरती को।
जहां वीरों की गाथाएं गूंजती थीं,
और किसान की हल की थापें होती थीं संगीत।
यहाँ के गाँव,
जिन्होंने समय के तूफानों को झेला,
पर कभी अपनी आत्मा को न खोया।
यहाँ की हवाओं में बसती हैं कहानियाँ,
पुरखों की मेहनत की,
संघर्ष की, और उत्सव की।
और इसी विरासत की गरिमा में,
उगती है भुजरियों की खुशबू,
जो लेकर आती है अपनत्व की सौगात,
जहां हर जवारा कान में खुर्सा जाता है,
और “एक लई, एक दई” का वचन गूंजता है।
यह सिर्फ एक उत्सव नहीं,
यह उस साझा संस्कृति का प्रतिबिंब है,
जहां रिश्तों को जोड़ा जाता है सम्मान से,
जहां पारिवारिक बंधन मजबूत होते हैं,
और गांव की हर गली गूंजती है
एकता की धुन से।
पुरानी हवेलियों के बरामदे,
जहां दादियों ने सुनाई थीं लोककथाएँ,
और बच्चों ने सीखी थीं जीवन की सीखें,
वहीं आज भी भुजरियां
बचपन की याद दिलाती हैं,
वह खेल, वह मस्ती, वह सांस्कृतिक संगम।
यहाँ के मंदिर,
जिन्होंने पीढ़ियों को जोड़ा,
और त्योहारों ने रंग भरे,
सबका जीवन बनाया एक सृजनात्मक संगम।
भुजरियों का उत्सव,
गाडरवारा की पहचान है,
एकता और प्रेम का जीवंत प्रमाण है।
यहाँ के लोग जानते हैं,
कि खेतों की उपज जैसी ही जरूरी है,
रिश्तों की उपज।
जब लोग जवारे लेकर एक-दूसरे के घर जाते हैं,
तो केवल गेहूं का सिरा नहीं होता हाथ में,
बल्कि एक विश्वास होता साथ में,
कि चाहे कितना भी वक्त बीत जाए,
हम एक-दूसरे के लिए खड़े हैं,
साथ हैं, अपन हैं।
गाडरवारा की ये भुजरियां,
ना केवल परंपरा का उत्सव हैं,
बल्कि यह जीवन के अनुभवों का संगम हैं,
जो हमें सिखाते हैं,
कि असली शक्ति है सह-अस्तित्व में,
और सबसे बड़ी धन है अपनत्व।
यहाँ की मिट्टी से उठती ये खुशबू,
और ये पारंपरिक स्वर,
हमें बताते हैं कि भुजरियां
गाडरवारा की आत्मा का गीत हैं,
जो सदियों से बज रहा है,
और अनगिनत दिलों को जोड़ रहा है।
सुशील शर्मा
भुजरियों के पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं
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