: नाग धरती के प्रहरी (नागपंचमी पर कविता)
Aditi News Team
Tue, Jul 29, 2025
नाग धरती के प्रहरी
(नागपंचमी पर कविता)
धरती के गहरे गर्भ में,
जड़ों की उलझी भूलभुलैया में,
शिला की दरारों और
झाड़ियों की नमी भरी छाँव में
बसते हैं नाग
अनगिनत आकारों, रंगों, और स्वभावों वाले।
वे न तो केवल भय हैं
न ही केवल पूजा का प्रतीक,
वे हैं पृथ्वी की उस
पुरानी कथा के पात्र
जो सृष्टि के संतुलन को
चुपचाप थामे हुए हैं।
उनकी आँखों में चमकता है
समय का अनंत प्रवाह,
पलकों के बिना भी
वे देख लेते हैं
वह सब
जो हम अपनी खुली आँखों
से नहीं देख पाते।
वे रेंगते हैं मौन,
पर हर कदम
धरती को नई धुन देता है।
उनकी जीभ,
दो फाँकों में बंटी
मानो दो दिशाओं का मार्गदर्शन,
सूँघने और परखने की अद्भुत शक्ति।
नाग
धरती के चिकित्सक भी हैं
चूहों की अंधाधुंध बढ़ती भीड़
उनके बिना खेतों को उजाड़ देती।
मेंढकों और छिपकलियों का संतुलन,
कीड़ों का रहस्य,
सब उनकी उपस्थिति से
सुरक्षित है।
वे कभी-कभी
मानव की बस्तियों के किनारे
आ जाते हैं,
न भय फैलाने,
न हिंसा करने,
बस क्योंकि
धरती पर उनका घर
हमने छीन लिया है।
उनकी देह पर खिंची हुई
तराशी हुई काष्ठ जैसी शल्कें,
धूप में चमकती हैं
मानो किसी प्राचीन योद्धा का कवच।
उनके रंग
हरीतिमा, धूसर, नीली आभा,
कभी ज़हरीली चेतावनी,
कभी छिप जाने का छलावरण।
विष उनकी रक्षा है,
न आक्रमण की प्रवृत्ति।
वो काटते नहीं,
जब तक उन्हें
मृत्यु का भय न छू ले।
फिर भी,
हम उन्हें
डर और अंधविश्वास की
परिधि में बाँध देते हैं।
नागपंचमी का यह पर्व
केवल दूध चढ़ाने का
अनुष्ठान नहीं,
यह स्मृति है
कि यह धरती
सिर्फ हमारी नहीं,
उनकी भी है
जिन्होंने लाखों वर्षों से
सृष्टि के संतुलन को संभाला है।
हम भूल जाते हैं
कि जिन नागों की पूजा करते हैं,
उन्हें मारते भी हैं
उनकी खाल के लिए,
उनके भयावह नाम के लिए।
हम यह नहीं देखते
कि उनके बिना
खेत उजड़ेंगे,
जंगल सूखेंगे,
और जैव विविधता
अपना स्वर खो देगी।
धरती का हर नाग
एक कहानी है
प्रकृति की,
जीवन की रक्षा की,
संतुलन की।
उसकी जीभ का कंपन
हवा में लिखता है
एक अदृश्य श्लोक
"हम भी तुम्हारे साथ
इस संसार में हैं।"
आज नागपंचमी पर
सिर्फ दूध नहीं,
बल्कि एक संकल्प लेना है
कि उनके घर नहीं उजाड़ेंगे
उनकी देह का सौदा नहीं करेंगे,
और उनके रहस्यमय जीवन
को डर नहीं,
सम्मान देंगे।
क्योंकि नाग
सिर्फ लोककथाओं के पात्र नहीं,
वे इस धरती के
अनसुने प्रहरी हैं
जो मौन रहकर भी
जीवन की रक्षा करते हैं।
सुशील शर्मा
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