: स्वदेशी बनाम विदेशी और भारतीय आर्थिक एवं कृषि आत्मनिर्भरता पर विशेष लेख (पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर की कलम से)
अदिति न्यूज से सतीश लमानिया की विशेष रिपोर्ट
स्वदेशी बनाम विदेशी और भारतीय आर्थिक एवं कृषि आत्मनिर्भरता पर विशेष लेख (पद्मश्री डॉ सुभाष पालेकर की कलम से)
मेरे प्यारे साथियों और बहनों, डॉ सुभाष पालेकर का विनम्र नमस्कार
देशी, स्वदेशी, विदेशी और वैश्विक इन चार चक्राकार चक्रव्यूह में हम फंस गए हैं। यूरोप अमेरिका इन विकसित देशों की अर्थ व्यवस्थाएं पूंजी केंद्रित उद्योग प्रधान शोषण और भ्रष्टाचार आधारित होनेसे उनकी तुलना हम हमारे कृषि प्रधान सामाजिक दायित्व केंद्रित स्वदेशी अर्थ व्यवस्था से नहीं कर सकते। भारत जैसे विकासनशील कृषि प्रधान अर्थ व्यवस्था में सर्वोत्तम संपूर्ण स्वदेशी कृषि तकनीक का विशेष महत्व होता हैं। बारा हजार साल पहले स्थानांतरित कृषि shifting agriculture को खोज निकालने वाले अफ्रीकन आदिवासियों ने ग्यारा हजार साल पहले जंगली गोमाता को पालना माने गोपालन शुरू किया और आज से दस हजार साल पहले अफ्रीका में तत्कालीन आदिवासियों ने देशी गोमाता के गोबर से गोबर खाद पर आधारित गो आधारित खेती की शुरुआत की। बाद में उनके स्थलंतरण से वह गो आधारित खेती हमारे देश में मध्य एशिया ईरान अफगानिस्तान बलूचिस्तान सिंध प्रदेश गुजरात के मार्ग से आते आते अंत में पश्चिम एवं उत्तरी भारत में फैल गई। आज वह गो आधारित खेती दुनिया में कही भी किसानों के खेतों पर प्रारूप मॉडल के रूप में अस्तित्व में नहीं हैं। फिर आज गो आधारित खेती का जो प्रचार किया जा रहा है, क्या वह असल में गो आधारित खेती नहीं है ?.जी, जवाब है.. नहीं हैं। कैसे ?
भारत सरकार द्वारा जिस तथाकथित प्राकृतिक खेती का प्रचार किया जा रहा है, क्या वह ठीक है? जी , नहीं, ठीक नहीं हैं। क्योंकि प्राकृतिक खेती पूरे दुनिया में किसी भी किसान के खेत पर मॉडल प्रारूप के रूप में अस्तित्व में नहीं हैं। देश को गुमराह किया जा रहा है। कैसे ?.
गो आधारित खेती किसे कह सकते है?
साथियों, गो आधारित खेती माने जिसमें सिर्फ देशी गो वंश के गोबर से बना गोबर खाद ही डाला जाता है, दूसरा कोई भी भैंसों का, भेड़ बकरियों का ,गधे का, घोड़े का या ऊंट के गोबर का उपयोग गोबर खाद बनाने के लिए बिल्कुल नहीं होता था, इसीलिए उसे गो आधारित खेती कहते हैं। जिस गोबर खाद Farm Yard Manure में भैंसों का भेड़ बकरियों का गधे घोड़े का और विदेशी काऊ जर्सी हॉलस्टीन का गोबर डाला गया है, वह गो आधारित खेती कैसे हो सकती हैं? वह तो भैंस आधारित खेती, भेड़ बकरियों के आधारित खेती, गधे घोड़े आधारित खेती या ऊंट आधारित खेती हो गई । किस आधार पर आप उसे गो आधारित खेती कह सकते हो?.देश को गुमराह किया जा रहा है। फिर सवाल पैदा होता है कि असल में गो आधारित खेती क्या है ?
जिस परंपरागत गोबर खाद में सिर्फ देशी गाय का गोबर का उपयोग करते है, उसमें किसी भी हालत में कंपोस्ट वर्मी कंपोस्ट रासायनिक खाद और अन्य कृषि साधनों को डाला जाता नहीं है, साथ में जिसमें भूमि की जोताई सिर्फ देशी गाय से प्राप्त देशी बैल चलित औजारों से होती हैं, इसलिए देशी बैल पाले जाते है, किसी भी हालत में जोताई और अन्तर जोताई के लिए ट्रैक्टर या किसी अन्य उन स्वयं चलित यांत्रिक औजारों का उपयोग नहीं होता है, साथ में कृषि ऊपज को खेती से घर लाने के लिए या घर से कृषि ऊपज मंडी में या बाजार में बिक्री के लिए ले जाने के लिए या गोबर खाद को खेती में ले जाने के लिए सिर्फ देशी बैलों से चलने वाले बैल गाड़ी का ही उपयोग किया जाता है, ट्रैक्टर ट्रक या किसी भी यांत्रिक वाहन का उपयोग बिल्कुल नहीं होता
है।जिस में बीज बोआई के लिए सिर्फ देशी बैलों से चलने वाले बीज बोआई औजार का उपयोग किया जाता है, किसी भी हालत में ट्रेक्टर या पावर टीलर का उपयोग नहीं होता है। जिस में निराई गुड़ाई के लिए सिर्फ देशी बैलों से चलने वाले गुड़ाई औजार का और मानवी हाथों से चलने वाले हंसिया दरांती का उपयोग किया जाता है, उसके लिए किसी भी यांत्रिक ट्रैक्टर या पावर टीलर का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता हैं। जिस में कुवै well से सिंचाई का पानी निकाल ने के लिए सिर्फ बैलों से खींचने वाले चमड़े से बनी परंपरागत मोट का ही उपयोग किया जाता हैं, किसी भी हालत में डीजल पर चलने वाले इंजिन का उपयोग नहीं किया जाता हैं या बिजली पर चलने वाले मोटर पंप का या नल कूपों का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता हैं, जिस में सिर्फ देशी असल भारतीय गो वंश का ही उपयोग होता हैं, जिसमें विदेशी जर्सी हॉलस्टीन का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता हैं, जिसमें सिर्फ देशी बीजों का ही उपयोग किया जाता है, किसी भी हालत में उन्नत improved बीजों का, संकर बीजों का या जनुनुक रोपित बीजों genetically modified seed का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता, जिस गो आधारित खेती में भगवान श्री कृष्ण जी के आदेश पर देशी गोमाता का संपूर्ण उपलब्ध दूध दही मक्खन गांव के कुपोषित बच्चों मुफ्त में पिलाया खिलाया जाता है, जो प्रभु श्रीकृष्ण ने अपने युवा अवस्था में जन आन्दोलन के माध्यम से गांव से मथुरा शहरों के तरफ बिक्री के लिए जाने वाले दूध मक्खन घी को रोका और गांव के कुपोषित बच्चों को मुफ्त में पिलाया खिलाया, उन का अनुकरण करना और दूध सोसाइटी में किसी भी हालत में बेचा नहीं जाता है। भगवान बलराम जी के आदेश के अनुसार जिसमें देशी बैलों से चलने वाले लकड़ी के हल से ही भूमि की जोताई करना है, ट्रैक्टर पावर टीलर का उपयोग बिल्कुल नहीं होता है।
ब्रिटिश हमारे देश में आने के पहले माने भारत पर ब्रिटिश साम्राज्य प्रस्थापित होने के पहले हमारे देश में हजारों सालों से चली आ रही परंपरागत गो वंश के गोबर से बने गोबर खाद के आधारपार, देशी बैलों के और देशी बीजों के आधार पर चलती आ रही खेती माने... परंपरागत गो आधारित खेती।
अब मुझे बताइए पूरे दुनिया में इस तरह की गो आधारित खेती करने वाले कितने किसान है? कोई भी नहीं है। तो फिर जो अस्तित्व में ही नहीं है ऐसे गो आधारित खेती का झूठा प्रचार क्यों किया जा रहा है, उसके माध्यम से देश दुनिया को क्यों गुमराह किया जा रहा है?.
रासायनिक खेती करने वाले भी अपने खेती में रासायनिक खाद तो डालते ही है लेकिन रासायनिक खाद के साथ घर में उपलब्ध या अन्य किसानों से खरीदा या गो शालाओं से खरीदा गोबर का खाद भी डालते है। तब रासायनिक खेती भी गो आधारित खेती हो गई । तब सवाल पैदा होता है कि कौनसी खेती गो आधारित? रासायनिक गो आधारित खेती या जो अस्तित्व में नहीं हैं वह देशी गाय बैल आधारित खेती? इसका क्या जवाब देंगे ?
सुभाष पालेकर कृषि में गोबर खाद नहीं डाला जाता है । क्योंकि मेरा दावा जो मैने वैज्ञानिक कसौटियों पर सिद्ध किया है कि कोई भी गोबर खाद किसी भी पेड़ पौधे का भोजन नहीं है, इसलिए उसे डालने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। भूमि पर गोबर खाद डालने से उसको नमी मिलते ही actinomycetes एक्टिनोमायसिटीज , नाइट्रोसोमोनास, नाइट्रो कॉकस, नाइट्रो वैक्टर, पेनिसिलिन फफूंद, माइक्रो कॉकस डी नाइट्रीफिंग बैक्टीरिया इन सभी सूक्ष्म जीवाणु के द्वारा हुए उसके विघटन से विशाल मात्रा में कार्बन डाय ऑक्साइड वायु carbon di oxide, नाइट्रस nitrous ऑक्साइड oxide वायु और मिथेन Mithane वायु इन हरित गृह वायु green house gases का विशाल मात्रा में उत्सर्जन होता है, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि global warming और जल वायु परिवर्तन climate change को बढ़ावा मिलता हैं, जिनसे तेज बारिश, बादल फटना, लगातार तापमान बढ़ते रहना, अकाल बारिश पूरे साल शुरु रहना, जिससे खड़ी फैसले बर्बाद होना, अत्यधिक गर्मी से दाने छोटे होना , परिणाम स्वरूप उपज घटना, शीत काल में गर्मी के दिन बढ़ना, जिससे रबी फसलों का नुकसान होना, बाढ़ से नुकसान होना, अकाल स्थिति पैदा होना, और मानवी स्वास्थ्य पर गहरा नुकसान होना इन सभी विध्वंसक परिणाम हम भुगत रहे है, उन के लिए यह परंपरागत गो आधारित खेती जिम्मेदार हैं। इस जल वायु परिवर्तन से हमारी फसलों को और मानवी स्वास्थ्य को बहुत अधिक नुकसान हो रहा है। साथ में गोबर खाद डालने से भूमि में उर्वरा शक्ति को प्रदान करने वाले ह्यूमस का निर्माण ही रुक जाता है,भूमि बंजर बनने लगती हैं। गो आधारित खेती में अकाल में फसल सूखती है, कीटों के और बीमारी से फसल बरबाद होती हैं और भूमि में होने वाले जैविक कार्बन का बढ़ते मात्रा में हो रहे कार्बन उत्सर्जन से किसानों को कृषि उपज बहुत ही कम मिलती है।
इसलिए सुभाष पालेकर कृषि में गोबर खाद नहीं डाला जाता है, हम उसका कड़ा विरोध करते है। क्योंकि मैने सिद्ध किया है कि गोबर खाद फसलों का भोजन नहीं है, इसलिए उसे डालने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं हैं। माने परंपरागत गो आधारित अब काल बाह्य हो गई हैं।
अगर 80 करोड़ लोगों को पूरे साल मुफ्त अनाज देने से और लाडली बहना परियोजना से खेती में काम करने के लिए मजदूर नहीं मिलते और देशी बैल नहीं है, तब सुभाष पालेकर कृषि में छोटे ट्रैक्टर से जोताई की जाती हैं, कृषि ऊपज ट्रक ट्रैक्टर से मंडी में भेजी जाती है। तब सुभाष पालेकर कृषि गो आधारित खेती कैसे हो सकती है?
आपको रासायनिक खेती में प्रति एकड़ जितनी उपज मिलती हैं उतनी प्रति एकड़ उपज गो आधारित खेती में लेना है तब मेरे अनुसंधान के निष्कर्ष के अनुसार प्रति एकड़ बीस बैल गाड़ी माने दस मेट्रिक टन देशी गाय का गोबर खाद हर साल डालना ही पड़ेगा, जिसकी कीमत बीस हजार रुपए होती है। क्या यह किसानों को संभव है ? सपने में भी संभव नहीं है। इस सत्य को क्यों नहीं स्वीकार किया जा रहा हैं?
कुल मिलाकर पूरे दुनिया में असली गो आधारित खेती कही भी अस्तित्व में नहीं है। इस सत्य को क्यों नहीं स्वीकार किया जाता हैं?.
पाश्चात्य हरित क्रांति और जैविक खेती या गो आधारित खेती या अन्य सभी कृषि पद्धतियों के प्रशिक्षकों का और प्रचारकों का जो दावा है कि गोबर खाद, कंपोस्ट खाद, बर्मी कंपोस्ट खाद, रासायनिक खाद और अन्य सभी जैविक रासायनिक खाद पेड़ पौधोंका भोजन है, इसलिए उन्हें भूमि में डालना ही पड़ता है,.........उस दावे को सुभाष पालेकर कृषि जन आन्दोलन मान्य नहीं करता, उसका कड़ा विरोध करता है। क्योंकि मेरे अनुसंधान से यह सिद्ध हुआ है कि कोई भी जैविक खाद गोबर खाद या रासायनिक खाद बर्मी कंपोस्ट खाद या अन्य कोई भी खाद किसी भी पेड़ पौधे का भोजन नहीं है। यह मैने वैज्ञानिक कसौटियों पर सिद्ध किया है। इसलिए हमारा उन सभी कृषि पद्धतियों को कड़ा विरोध है।
सुभाष पालेकर कृषि में कोई भी खाद डाला नहीं जाता है। इसलिए सुभाष पालेकर कृषि गो आधारित खेती नहीं है, उसने कंपोस्ट खाद बर्मी कंपोस्ट खाद डाला नहीं जाता है इसलिए वह जैविक खेती organic farming नहीं है, और प्राकृतिक खेती का अस्तित्व पूरे दुनिया में कही भी नहीं हैं, इसलिए सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती कहना माने दुनिया को गुमराह करना है।
प्राकृतिक खेती माने प्रकृति में माने घने जंगलों में अस्तित्व में हैं वह खेती। सुभाष पालेकर कृषि में भूमि की जोताई है, बीज बोआई है, पौध रोपण है , लेकिन प्रकृति में जोताई नहीं है, बीज बोआई नहीं हैं,पौध रोपण नहीं है,तब सुभाष पालेकर कृषि प्राकृतिक खेती कैसे हो सकती हैं?
सुभाष पालेकर कृषि में सिंचाई है, निराई गुड़ाई माने खरपतवारो का नियंत्रण है, जीवामृत का छिड़काव है, ... लेकिन प्रकृति में सिंचाई नहीं है, निराई गुड़ाई नहीं है, जीवामृत का छिड़काव नहीं है। तो फिर सुभाष पालेकर कृषि प्राकृतिक खेती कैसे हो सकती हैं? किस आधार पर ?
सुभाष पालेकर कृषि में जंगली जानवरों के द्वारा होने वाले फसल नुकसान को टालने के लिए लोहे के तारों की बाड लगाते है, फसल कटाई होती है, फसल बिक्री होती हैं ...लेकिन प्रकृति में बाड नहीं लगाई जाती, सभी जंगली जानवरों को मुक्त है, प्रकृति में फसल कटाई नहीं होती, कृषि ऊपज की बिक्री नहीं होती, ...तब फिर सुभाष पालेकर कृषि प्राकृतिक खेती कैसे हो सकती हैं? किस आधार पर?
दुनिया में अपने कृषि पद्धति को प्राकृतिक खेती कहने वाले जापान के डॉ मसानोबू फुकुओका और भारत के भास्कर दावे गुरुजी थे । वे मेरे मित्र थे, हम तीनों दो दिन भास्कर दावे गुरुजी के घर में एकसाथ बैठकर पूरा चिंतन मंथन कर रहे थे, उन दोनों के खेतों में से सावे गुरुजी के खेत में गोबर खाद डाला जाता और फुकुओका अपने संतरे के बगीचे में मुर्गी पालन करते थे उनका खाद का उपयोग करते थे। प्रकृति में गोबर खाद और मुर्गी पालन नहीं है, तब डॉ मासानोबू फुकुओका की और भास्कर दावे गुरुजी की खेती प्राकृतिक खेती कैसे हो सकती हैं?
तब सवाल पैदा होता हैं कि मानवी इतिहास में कभी भी और कही भी प्राकृतिक खेती का अस्तित्व ही नहीं रहा हैं तब मेरे सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती कहना झूठ बोलना छल कपट नहीं है तो क्या है ?
अगर जिसमें बिजमृत जीवामृत घन जीवामृत आच्छादन वाफ़सा और जैव विविधता ये जिसके दर्शन है मूल सिद्धांत है उन मूलभूत सिद्धांतो का शतप्रतिशत पालन सुभाष पालेकर कृषि में किया जाता है, जो प्राकृतिक खेती नहीं नहीं हैं, तब भी अगर कोई उसे जबरन प्राकृतिक खेती कहता है, इसका सुस्पष्ट अर्थ है की वह सौ प्रतिशत झूठ बोल रहा है, असत्य वचन कह रहा हैं, झूठ बोलकर दुनिया को देश को सरकारों को गुमराह कर रहा है । और अगर झूठ बोलने की अनुमति हमारा देश का संविधान नहीं देता है तब यह झूठ बोलने वाला सुभाष पालेकर कृषि को प्राकृतिक खेती कहकर संविधान की ऐसी तैसी कर रहे है, तब भी संवैधानिक पद पर रहकर असंवैधानिक कृत्य कर रहे है, तब क्या उनका विरोध नहीं होना चाहिए? देश संविधान पर चलता है, किसी के मनमानी पर नहीं चलता है। देश के प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र भाई मोदी जी स्वयं घोषणा करते हैं कि देश में पद्मश्री सुभाष पालेकर जी की खेती का अमल किया जाएगा और उसके लिए इस साल के बजेट में भारत सरकार ने दो हजार चार सौ करोड़ रुपयों का प्रावधान किया है। इससे यह सिद्ध होता हैं के वे इस बारे में बहुत गंभीर है। लेकिन, सरकारी निर्णय को अमल में लाने वाली प्रशासकीय व्यवस्था, उस व्यवस्था का हिस्सा बनने वाले गैर सरकारी संगठन, कृषि वैज्ञानिक पूरी तरह भ्रमित है, भ्रम फैला रहे है कि सुभाष पालेकर कृषि ही गो आधारित खेती है, प्राकृतिक खेती है, जैविक खेती है। पूरा देश गुमराह हो रहा हैं। सभी तरफ अज्ञान फैलाने की अफरातफरी मची हुईं हैं। जिन्होंने मेरा शिबीर कभी सुना नहीं, मेरे सोशल मीडिया पर अपलोड किए वीडियो देखे नहीं, मेरे द्वारा सभी भाषाओं में लिखी मेरी किताबें पढ़ी नहीं है, जिन्होंने हमारे सुभाष पालेकर कृषि के खड़े प्रारूप मॉडल खेत कभी देखे नहीं हैं, वे मेरे तकनीक के महान अग्यानी अनपढ़ सलाहकार बने है, प्रचारक बने है। जिन्होंने अपने जीवन में कभी खेती की नहीं, भूमि हीन है, जिनको खेती जैसे करना है इसका कोई भी कृति ज्ञान practical experience बिलकुल नहीं हैं, जिन्हें भूमि की जोताई कैसे करना है मालूम नहीं, बीज बोआई निराई गुड़ाई कैसे करना है मालूम नहीं, सिंचाई या फसल कटाई कैसे करना है मालूम नहीं, ऐसे कृषि अग्यानी लोग कृषि विशेषज्ञ बने हैं। क्या होगा हमारे देश का ?
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