: सेना के शौर्य को सलाम, सिहोरा में निकाली गई भव्य यात्रा
Sat, May 24, 2025
सेना के शौर्य को सलाम, सिहोरा में निकाली गई भव्य यात्रा
ऑपरेशन सिन्दूर भारतीय सेना के शौर्य की सराहना करते हुए विधानसभा तेंदूखेड़ा के कौड़िया मण्डल में क्षेत्रीय विधायक विश्वनाथ सिंह जी पटेल के नेतृत्व में भाजपा जिला उपाध्यक्ष श्री हरीप्रताप सिंह ममार, वरिष्ठ नेता श्री रमाकांत शर्मा, जिला पंचायत सदस्य श्री धनंजय पटेल, मंडल अध्यक्ष श्री प्रताप कौरव, श्री ईश्वर पटेल सहित अन्य की उपस्थिति में तिरंगा यात्रा निकाली गई। इस दौरान ऑपरेशन सिंदूर की सफलता का जश्न मनाया गया है और जय जवान का नारा लगाया गया। इसके साथ ही शहीदों को श्रद्धांजलि भी दी गई। गौरतलब की भारतीय सशस्त्र सेनाओं द्वारा 6-7 मई की रात पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर (पीओके) में किए गए एक सैन्य हवाई अभियान था। भारत ने कहा कि इसका उद्देश्य पाकिस्तान और आतंकी संगठन से जुड़े पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी ढाँचे को निशाना बनाना था। तिंरगा यात्रा में बड़ी संख्या में नागरिकों ने यात्रा निकालकर देश की बहादुर सेना के जज्बे को सलाम किया। तिरंगा यात्रा में सभी नागरिकों द्वारा भारत माता के छायाचित्र पर माल्यार्पण कर यात्रा का प्रारंभ हुआ तिरंगा यात्रा पूरे नगर में देश भक्ति गीत एवं भारत माता के जयकारे लगाए गए।
रिपोर्टर सना खान
: मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँ,
Fri, May 23, 2025
मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँ
(जैव विविधता पर एक कविता)
सुशील शर्मा
मैं पृथ्वी हूँ।जिन पैरों से तुमने मुझे रौंदा,उनमें मेरी मिट्टी थी।जिस छाया में तुमने विश्राम किया,वह मेरे वनों से निकली थी।तुम्हारे फेफड़ों में जो साँस चल रही है,वह मेरी बनाई हवा है। मैं तुम्हारी जननी थी,मैंने तुम्हें जन्म दियाकेवल मनुष्य नहीं,हिरण को भी, बाघ को भी,तोते, मछली, चींटी को भी।मैंने किसी को कम नहीं दियाऔर किसी को अधिक नहीं छीना।सभी को संतुलन दिया,जीवन की एक विराट श्रृंखला दी,जहाँ एक का जीवन,दूसरे के जीवन की शर्त थी। लेकिन तुमने क्या किया? तुमने संतुलन तोड़ा।तुमने सोचा तुम सबसे श्रेष्ठ हो।तुमने नदियों को बाँध दिया,पहाड़ों को काट डाला,तुमने जंगलों को जला दियाऔर फिर कहा “यह विकास है।” तुम्हारा विकासकितना अलग है मेरे विकास से!मैंने तो बीज से वटवृक्ष बनाया,तुमने वटवृक्ष को कागज़ बना डाला।मैंने सागर रचा, उसमें जीवन बोया,तुमने उसे रसायनों से भर दिया।मैंने जैव विविधता रचीविविध रंग, आकार, वाणी, आचरण।हर जीव में मैंने एक कहानी बुनी,हर फूल में एक रहस्य रखा,हर पक्षी की उड़ान में एक स्वप्न छोड़ा। और तुमने? तुमने उन्हें विलुप्त कर दियाबिना पछतावे,बिना उत्तरदायित्व के।हर साल सैकड़ों प्रजातियाँतुम्हारी अनदेखी सेहमेशा के लिए इस धरती से चली जाती हैं। और फिर तुम शोक मनाते हो“बाघ अब दुर्लभ है,”“पानी अब खत्म हो रहा है,”“जलवायु बदल रही है।” नहीं!यह जलवायु नहीं,तुम बदल रहे होअपने स्वार्थ में, अपनी गति में,अपने अत्याचार में। तुम भूल गएकि तुम अकेले नहीं हो।तुम किसी विशाल जैविकताने-बाने का हिस्सा हो।जिसमें एक सूक्ष्म जीव भीतुम्हारे अस्तित्व के लिए आवश्यक है।एक मधुमक्खी के लुप्त हो जाने सेतुम्हारा पूरा भोजन-चक्र डगमगा सकता है। सतत विकास क्या है? क्या वह गगनचुंबी इमारतें हैंजो धूप को छीन लेती हैं?या वह सड़कें जो नदियों कीराह में दीवार बन जाती हैं? सतत विकास वह हैजो वृक्षों को काटे बिना छाया दे,जो धरती को बाँधे बिना ऊर्जा पैदा करे,जो नदी के गीत को रोके बिनातुम्हें गति दे सके।सतत विकास वह हैजहाँ मनुष्य भी बढ़ेऔर बाकी जीवन भी साँस ले सके। मैं पूछती हूँक्या तुम्हें याद है,जब तुम बच्चे थे,तब तुमने गिलहरी को देखा थाया तितली को हाथ में पकड़ने की चेष्टा की थी?क्या तुम्हारे भीतर आज भीउन लहरों की स्मृति हैजो बिना पूछे भी तुम्हें अपनाती थीं? प्रकृति तुम्हारा उपभोग नहीं चाहतीवह तुम्हारा सहभाग चाहती है।उसे पूजा मत बनाओ,उससे संवाद करो।उससे लड़ो मत,उसके साथ चलो। मुझे खेद है—कि आज जैव विविधता दिवसएक आयोजन बनकर रह गया है।कुछ भाषण, कुछ फोटो, कुछ पोधारोपणऔर फिर वापसउसी पुराने मार्ग परजो केवल विकास कीरफ्तार जानता है,दिशा नहीं। मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँकि तुम रुकोगे।अपनी मशीनों से,अपने अंधे प्रगति-पथ से,और एक बार फिरमेरी आँखों में झाँकोगे।जहाँ अब भी पक्षियों के घोंसले हैं,जहाँ हिरण अब भी डरते हैं,जहाँ झील अब भी सूखने से पहलेआकाश की छाया अपने भीतर सँजोती है। मैं पृथ्वी हूँअब भी जीवन देती हूँ।पर अब चाहती हूँसाझेदारी।तुमसे।तुम्हारे बच्चों से।तुम्हारे विकास से। क्या तुम तैयार हो?अपने भीतर की उस संवेदना कोफिर से जागृत करने के लिए,जो एक तितली के पंखों की थरथराहट मेंसृष्टि की कविता पढ़ सकती है? क्या तुम तैयार हो?विकास को फिर से परिभाषित करने के लिएजहाँ ‘आधुनिक’ होने का अर्थ‘निर्दयी’ होना न हो,बल्कि ‘सहजीवी’ होना हो। क्या तुम तैयार हो?प्रकृति से माफ़ी माँगने के लिएमुझे समझने के लिए,मेरे साथ चलने के लिए। मैं पृथ्वी हूँ,मैं क्षमा कर सकती हूँयदि तुम सचमुच बदल सको।मैं पुनः फूल खिला सकती हूँ,यदि तुम केवलतोड़ने की जगहसीखो सँजोना। अब समय नहीं हैकेवल भाषणों का,अब समय हैसंवेदनाओं को क्रिया में बदलने का। मैं अब भी प्रतीक्षा में हूँकिसी ऐसे मानव कीजो मनुष्य से आगे बढ़करफिर से ‘जीव’ बन सके। सुशील शर्मा
: डॉ. साहब का 'संतुलित' संसार ( सामयिक व्यंग्य - सुशील शर्मा)
Fri, May 23, 2025
डॉ. साहब का 'संतुलित' संसार
( सामयिक व्यंग्य - सुशील शर्मा)
डॉ. साहब, अपने नाम के आगे आयुर्वेद भूषण लगाए घूमते थे, मगर उनकी देहयष्टि देखकर कोई भी अनभिज्ञ व्यक्ति उन्हें तंदुरुस्ती के दुश्मन का तमगा दे सकता था। पेट उनका ऐसे बाहर निकला रहता था, जैसे उन्होंने अपने भीतर ब्रह्मांड का समस्त गुरुत्वाकर्षण केंद्र बना लिया हो, और चेहरे पर हमेशा एक तैलीय चमक, मानो कोई विज्ञापन ब्रेक चल रहा हो। आजकल डॉ. साहब ने एक नया मिशन पकड़ा हुआ था संतुलित भोजन। उनके क्लीनिक में घुसते ही अब दवाइयों की गंध से ज़्यादा, लेक्चर की गंध आती थी। दीवारों पर लगे चार्ट, जिनमें पत्ता गोभी का परिवारिक चित्र, और गाजर का वंशवृक्ष बना होता था, आने वाले मरीजों को पहले ही डरा देते थे। "तो, शर्मा जी," डॉ. साहब अपने विशाल डेस्क के पीछे से दहाड़े, "क्या बताया था मैंने आपको? मल्टीग्रेन की रोटी! हाँ! आपके पेट में जो गैसीय ब्रह्मांड घूम रहा है न, उसे सिर्फ यही शांत कर सकती है।" शर्मा जी बेचारे डगमग कुर्सी पर ऐसे बैठे थे, जैसे किसी स्कूल के प्रिंसिपल की क्लास में आ गए हों। "जी डॉ. साहब, पर वो...""पर क्या? परवल की सब्जी! परवल की सब्जी क्यों नहीं खा रहे आप? दाल तो घर में बनती ही होगी, पर कौन सी? अरहर, मूंग, मसूर – नाम गिनाएँ? नहीं, नहीं, नहीं! मैं बताता हूँ कौन सी दाल खानी है! और हाँ, सुबह-सुबह उठकर भीगे बादाम और अखरोट खाते हैं?" डॉ. साहब की आवाज़ में एक अजीबोगरीब 'पौष्टिकता' थी, जैसे वे खुद इन सारी चीज़ों को खाकर नहीं, बल्कि सिर्फ इनका नाम लेकर ही ऊर्जावान हो गए हों। मजा तो तब आता था, जब डॉ. साहब खुद अपने संतुलित भोजन का बखान करते-करते अचानक अपने सहायक को इशारा करते। सहायक तुरंत एक बड़े से थर्मस और एक स्टील के टिफिन के साथ प्रकट होता। डॉ. साहब बड़े ठाठ से थर्मस से अपनी हर्बल टी निकालते, जिसमें से घी की तेज़ गंध आती थी, और टिफिन खोलते, जिसमें एक मोटी-सी पराठे नुमा चीज़ और साथ में बेसन के लड्डू होते थे।"यह देखिए शर्मा जी," वे पराठे का एक निवाला तोड़ते हुए कहते, "यह है मेरा मल्टीग्रेन स्पेशल पराठा, इसमें मैंने खुद अपने हाथों से... खैर, आप नहीं समझ पाएँगे। और ये लड्डू... ये ऊर्जा के लिए हैं। आप भी खाइएगा।" वे इतना कहकर एक और लड्डू अपने विशाल मुँह में डालते, और उनके गालों पर संतुलित तेल की चमक और बढ़ जाती। उनकी सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि वे दूसरों को जो खाने की सलाह देते थे, खुद उसका पालन शायद ही करते हों। उनकी अपनी सुबह की मल्टीग्रेन रोटी अक्सर मैदे की कचौरी और छोले में बदल जाती थी, और परवल की सब्जी की जगह किसी तेज़ मिर्च वाले आलू-पनीर की सब्जी ले लेती थी। दाल का तो खैर क्या कहना, वह अक्सर किसी रेस्टोरेंट के बटर चिकन में बदल चुकी होती थी। और भीगे बादाम-अखरोट? वे शायद ही कभी उनकी जीभ तक पहुँच पाते थे, क्योंकि रात के खाने के बाद आइसक्रीम और गुलाब जामुन का सत्र शुरू हो जाता था। एक बार एक मरीज ने हिम्मत करके पूछ ही लिया, "डॉ. साहब, आप इतनी 'संतुलित' बातें करते हैं, तो आपकी सेहत..."डॉक्टर साहब ने तुरंत बात काटी, हाथ हिलाते हुए बोले, "अरे, मेरी बात छोड़िए! मैं तो शोध कर रहा हूँ। ये सब प्रयोग मैं अपनी देह पर कर रहा हूँ, ताकि आप लोगों को सही ज्ञान दे सकूँ। मैं जो सलाह देता हूँ, वह मेरे व्यक्तिगत जीवन के लिए नहीं, बल्कि मानव समाज के व्यापक कल्याण के लिए है!"और इतना कहकर, डॉक्टर साहब एक गहरी साँस लेते, जिसका उद्देश्य शायद अपने विशाल पेट को अंदर खींचना था, मगर वह प्रयास हमेशा की तरह असफल रहता। और फिर वे एक नई ऊर्जा के साथ अगले मरीज को संतुलित आहार का ज्ञान देने को तैयार हो जाते, जबकि उनका अपना शरीर चीख-चीखकर कहता "मुझे बचाओ, इस संतुलन से!" ✒️सुशील शर्मा✒️