: राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार 2025 चयन समिति में आशीष अग्रवाल व कुशलेंद्र श्रीवास्तव
Thu, Jun 5, 2025
राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार 2025 चयन समिति में आशीष अग्रवाल व कुशलेंद्र श्रीवास्तव
राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार 2025 हेतु जिला स्तरीय चयन समिति/जमीनी मूल्यांकन समिति के राज्य स्तर से माननीय मंत्री स्कूल शिक्षा द्वारा नामित सदस्यों में वरिष्ठ समाजसेवी आशीष अग्रवाल करेली एवं वरिष्ठ साहित्यकार कुशलेंद्र श्रीवास्तव गाडरवारा के नाम समिति में शामिल।
: नरसिंहपुर,कलेक्टर ने मलेरिया रथ को दिखाई हरी झंडी
Wed, Jun 4, 2025
नरसिंहपुर,कलेक्टर ने मलेरिया रथ को दिखाई हरी झंडी
नरसिंहपुर। कलेक्टर श्रीमती शीतला पटले ने मच्छरों की पैदावार, मलेरिया तथा अन्य वाहक जनित रोगों की रोकथाम के उद्देश्य से मलेरिया रथ को कलेक्ट्रेट परिसर से बुधवार को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस दौरान सीईओ जिला पंचायत श्री दलीप कुमार, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एसएस ठाकुर, जिला मलेरिया अधिकारी डॉ. राजकिशोर पटेल और अन्य अधिकारी- कर्मचारी मौजूद थे। उल्लेखनीय है कि मानसून के प्रारंभ के साथ ही मच्छरों की उत्पत्ति स्थल बढ़ जाने के कारण मलेरिया जन्य परिस्थितियां निर्मित होती हैं। अत: मच्छर व जन्य रोगों के प्रति जनजागरूकता के लिए माह जून मलेरिया निरोधक माह के रूप में मनाया जाता है। इस उद्देश्य से कलेक्टर ने उक्त मलेरिया रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। मलेरिया माह के दौरान जिले में जन जागरूकता के उद्देश्य से विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जायेंगी। ब्लॉक, सेक्टर एवं पंचायत स्तर पर कार्यशाला के सत्र आयोजित किये जायेंगे। इस माह में बुखार से पीड़ित व्यक्ति व मलेरिया रोगियों की खोज कर उनका उपचार किया जायेगा। ग्राम स्तर पर ग्राम स्वास्थ्य एवं तदर्थ समिति की बैठक आयोजन कर मच्छर जन्य परिस्थितियों के उन्मूलन के प्रयास किये जायेंगे। साथ ही मलेरिया नियंत्रण के लिए जिले में व्यापक प्रचार- प्रसार किया जायेगा व जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे। मलेरिया निरोधक माह के दौरान मलेरिया रथ नरसिंहपुर जिले में जून माह 2025 में सभी 06 विकासखंडों के प्रमुख हाट बाजारों व ग्रामों में जाकर मलेरिया एवं अन्य वाहक जनित रोगों के प्रति जागरूकक करेगा। मलेरिया रथ के भ्रमण के साथ फील्ड वर्कर एवं क्षेत्रीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी मौजूद रहेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचार रथ के माध्यम से लोगों को मलेरिया रोग से बचाव व नियंत्रण के लिए घरों में अनुपयोगी बर्तनों तथा कूलर आदि में जमा पानी सप्ताह में एक बार आवश्यक रूप से बदलने, घरों के आसपास जमा पानी हो तो पानी की निकासी की व्यवस्था करने, रात्रि में सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करने आदि की जानकारी दी जायेगी। यदि किसी व्यक्ति को बुखार आने पर शीघ्र खून की जांच कराने एवं मलेरिया होने पर मलेरिया रोधी दवा की पूर्ण खुराक लेने की समझाइश दी जायेगी। गर्भवती महिलाओं को बुखार आने पर मलेरिया की जांच अवश्य रूप से करायें, जिससे मलेरिया रोग की पहचान कर समुचित इलाज किया जा सके। मलेरिया जांच व उपचार की सुविधा शासकीय अस्पतालों, संस्थाओं एवं आशा के पास नि:शुल्क उपलब्ध है।
: वाह रे पर्यावरण दिवस (पर्यावरण दिवस पर एक व्यंग्य आलेख और कविता, सुशील शर्मा)
Wed, Jun 4, 2025
वाह रे पर्यावरण दिवस
(पर्यावरण दिवस पर एक व्यंग्य आलेख और कविता, सुशील शर्मा)
हर साल 5 जून आता है और अपने साथ लाता है एक खास दिन – पर्यावरण दिवस! यह वो दिन है जब हम सब अचानक से प्रकृति प्रेमी बन जाते हैं। सोशल मीडिया पर हरे-भरे कोट्स की बाढ़ आ जाती है, नेताजी एक पौधा लगाकर फोटो खिंचवाते हैं, और कुछ उत्साही लोग प्लास्टिक के खिलाफ भाषण देते हैं। लेकिन, जैसे ही 6 जून की सुबह होती है, हम फिर से वही पुराने 'पर्यावरण-दुश्मन' बन जाते हैं, अपनी आदतों के दलदल में धँसकर।
पर्यावरण की वर्तमान दशा: एक व्यंग्यात्मक समीक्षा
चलिए, एक नजर डालते हैं हमारे आज के पर्यावरण पर, जहाँ हम खुद ही 'पर्यावरण-संकट' के सूत्रधार हैं।
हवा में घुला ज़हर
हम हर साल दिवाली पर कहते हैं कि पटाखे नहीं जलाएँगे, पर जैसे ही नई गाड़ी आती है, उसकी नंबर प्लेट पर "पर्यावरण-अनुकूल" स्टिकर लगवाकर संतुष्ट हो जाते हैं। साँस लेने के लिए ऑक्सीजन नहीं, बल्कि प्रदूषित हवा मिल रही है, जिसकी कीमत हम अपनी फेफड़ों की बीमारी से चुका रहे हैं। और हाँ, "हवा शुद्ध करने वाले पौधे" तो बस घर के अंदर की सजावट के लिए हैं, बाहर फैक्ट्रियों का धुआँ तो चलता रहेगा!
पानी का रोना
नदियाँ, जो कभी जीवनदायिनी थीं, अब बड़े-बड़े नाले बन गई हैं। उद्योगपतियों के लिए यह "पानी नहीं, अपशिष्ट निकासी का मार्ग" है। घरों में आरओ फिल्टर लगाकर हम खुद को बचा लेते हैं, पर उन मछलियों का क्या जो प्लास्टिक और रसायन पीकर मर रही हैं? और समुद्र? वो तो हमारा सबसे बड़ा कचरादान है, जहाँ प्लास्टिक के पहाड़ तैर रहे हैं। "जल ही जीवन है" का नारा तो बस किताबों में अच्छा लगता है, असल में हम जल को 'जीवाणु का घर' बना रहे हैं।
धरती का बुखार
ग्लोबल वार्मिंग? अरे, यह तो बस विकसित देशों की साजिश है ताकि हम विकास न करें! हम तो एयर कंडीशनर चलाकर, फ्रिज में बोतलें ठंडी करके, और हर दूसरे काम के लिए बिजली फूँककर 'आधुनिक जीवन' जी रहे हैं। ग्लेशियर पिघल रहे हैं? समुद्र का स्तर बढ़ रहा है? कोई बात नहीं, हमारे पास तो ऊँची-ऊँची इमारतें बनाने के लिए और जमीन है! और हाँ, पेड़ों की कटाई पर कौन ध्यान देता है, जब हमें नए शॉपिंग मॉल और अपार्टमेंट बनाने हों?
कचरे का साम्राज्य
"रिड्यूस, रीयूज, रीसायकल" - ये तीन शब्द हमारे लिए केवल सोशल मीडिया के हैशटैग हैं। हर चीज सिंगल-यूज प्लास्टिक में पैक होकर आती है और हम उसे तुरंत कूड़ेदान में फेंक देते हैं। कूड़े के पहाड़ इतने ऊँचे हो गए हैं कि उनसे पर्यटक स्थल बनाने का विचार आ रहा है! और ई-कचरा? वो तो हमारे पुराने फोन और लैपटॉप का पुण्य-कर्म है जो धरती को प्रदूषित कर रहा है।
समाधान: क्या कोई आशा है?
तो क्या हम सिर्फ व्यंग्य करके बैठ जाएँ? नहीं, समाधान भी हैं, लेकिन उनके लिए थोड़ी मेहनत और बहुत सारी ईमानदारी चाहिए।
बदलें आदतें, सिर्फ बातें नहीं
हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण की रक्षा कोई सरकारी प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है। प्लास्टिक का उपयोग कम करें, बिजली बचाएँ, पानी बर्बाद न करें। यह छोटा सा कदम ही बड़े बदलाव की नींव रखेगा।
सरकारी नीतियाँ और उनका क्रियान्वयन
कानून तो बहुत हैं, लेकिन उनका पालन कहाँ होता है? प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों पर सख्त कार्रवाई हो, नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंडित किया जाए, और हाँ, उन अधिकारियों को भी जो रिश्वत लेकर पर्यावरण को बेचने में मदद करते हैं।
शिक्षा और जागरूकता
बच्चों को बचपन से ही पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाना होगा। उन्हें सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से पेड़ लगाना, पानी बचाना और कचरा प्रबंधन सिखाना होगा। हमें यह भी समझना होगा कि पर्यावरण दिवस सिर्फ एक दिन का नाटक नहीं, बल्कि हर दिन की जिम्मेदारी है।
नवीकरणीय ऊर्जा की ओर रुख
सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा - ये सिर्फ फैंसी शब्द नहीं हैं, बल्कि भविष्य हैं। सरकार और नागरिकों दोनों को जीवाश्म ईंधन से हटकर इन स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को अपनाना होगा।
सामुदायिक प्रयास
केवल सरकार या कुछ जागरूक लोग ही नहीं, बल्कि पूरा समाज जब एकजुट होकर काम करेगा, तभी बदलाव आएगा। अपने मोहल्ले में सफाई अभियान चलाएँ, स्थानीय स्तर पर पेड़ लगाएँ, और अपने आसपास के लोगों को जागरूक करें।आखिर में, यह पर्यावरण दिवस हमें एक बार फिर सोचने पर मजबूर करता है: क्या हम सिर्फ अपने लिए जी रहे हैं, या आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कुछ छोड़ना चाहते हैं? क्या हम सिर्फ "सेल्फी विद प्लांट" के लिए पर्यावरण प्रेमी बन रहे हैं, या वास्तव में बदलाव लाना चाहते हैं?पर्यावरण दिवस को सिर्फ एक रस्म अदायगी न बनाएँ, बल्कि इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएँ। क्योंकि अगर हमने आज प्रकृति का सम्मान नहीं किया, तो कल प्रकृति हमें अपना अपमान सहने पर मजबूर कर देगी। और तब, हमारे पास सिर्फ प्रदूषण, बीमारी और "काश" कहने के लिए कुछ भी नहीं होगा।क्या आप तैयार हैं, सिर्फ 5 जून को नहीं, बल्कि हर दिन पर्यावरण दिवस मनाने के लिए? "
मैं पर्यावरण बोल रहा हूँ..."
(पर्यावरण दिवस पर एक कविता - सुशील शर्मा)
मैं पर्यावरण हूँ।न तो पेड़ मात्र,न ही जल का प्रवाह,न केवल वायु की लय,न ही मिट्टी की गंध,मैं वह संतुलन हूँजो जीवन को सांस देता है। मैंने तुम्हें जन्मते देखा,तुम्हारे पहले कदम,तुम्हारा पहला हल जोतना,पहली आग जलाना,पहली नदी पार करना,और फिर धीरे-धीरेतुम्हारा स्वार्थ,तुम्हारी अधीरता,तुम्हारा अभिमान भी देखा। जब तुमने पहाड़ों को खोदा,मैं चुप रहा।जब तुमने नदियों को बाँधा,मैं मौन रहा।जब तुमने आकाश छू लिया,मैंने तुम्हें सराहा।लेकिन जब तुमने धरती को नोचना शुरू किया,तो मेरी साँसें भारी हो गईं। आज मैं टूट रहा हूँ,क्योंकि तुम भूल चुके होकि तुम्हारा अस्तित्वमेरे संतुलन पर टिका है। अब सुनोग्लेशियर पिघल रहे हैं,समुद्र उफान पर हैं,वर्षा चक्रीय नहीं रही,धूप में अब दया नहीं बची,साँस में ज़हर भर गया है। प्रजातियाँजिन्हें मैंने लाखों वर्षों मेंसहेजकर पाला था,वे अब संग्रहालयों मेंनाम मात्र हैं।हर मिनटएक पेड़ गिरता है,हर सेकेंडएक पक्षी खो जाता है,हर दिनमानवता की आत्माथोड़ी और खोखली हो जाती है। फिर भीमैं विरोध नहीं करता,मैं पलायन नहीं करता,मैं बदला नहीं लेता,क्योंकि मैं माँ हूँ।लेकिन अब,अब मुझे बोलना होगा। अब नहीं चलेगाकेवल भाषणों का झुनझुना,या पर्यावरण दिवस कीएकदिनी सजावट। तुम्हें बदलना होगाअपनी आदतें,अपनी विकास की परिभाषा,अपना लालच। समाधान कोई जादू नहीं,बस कुछ सच्चे कदम हैं। हर वृक्ष की जड़ में जीवन समझो।हर नदी को माँ कहो,और उसकी सेवा करो।हर प्लास्टिक के टुकड़े को अपराध मानो।हर जानवर को सहजीवी समझो,दया का पात्र नहीं। शहरों को नहींवनों को बढ़ाओ।ईंट-पत्थर की दीवारों सेज़्यादा ज़रूरी हैहरियाली की चादर। अपशिष्ट मत फैलाओ,अपनी ज़रूरतें सीमित करो।जल बचाओ,बिजली कम करो,मिट्टी को सांस लेने दो। यह मत भूलोपृथ्वी तुम्हारे बिना भीजी सकती है,पर तुम पृथ्वी के बिना नहीं। मैं पर्यावरण हूँ,अब भी जीवित हूँ,पर अब तुम्हारे निर्णयों परमेरा कल निर्भर करता है। क्या तुम सुन रहे हो?या अगली आपदा के आने तकफिर सो जाओगे? ✒️सुशील शर्मा✒️