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: कुंडलपुर,माटी जैसी पद दलित वस्तु पर आचार्य श्री ने मूकमाटी महाकाव्य रच दिया,मुनि श्री योग सागर जी महाराज

Aditi News Team

Tue, Oct 12, 2021


कुंडलपुर। विश्व प्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में चातुर्मास कर रहे संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य जेष्ठ श्रेष्ठ निर्यापक मुनि श्री योग सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि नेमावर क्षेत्र में आचार्य श्री जी के सानिध्य में विभिन्न ग्रंथों की वाचना हुई। अब यहां कुंडलपुर में भी ग्रंथ वाचना चल रही है 2 दिन से मूक माटी पर चर्चा कर रहे हैं। मूक माटी के संबंध में आपके सामने कुछ बात रख रहा हूं मूक माटी महाकाव्य आचार्य श्री ने लिखा चार सर्गो अर्थात खंडों में मूक माटी की रचना की गई पहला खंड--- संकर नहीं वर्ण लाभ
खंड 2-- शब्द सो बोध नहीं --बोध सो शोध नहीं
खंड 3 --पुण्य का पालन-- पाप प्रक्षालन
खंड 4 --अग्नि की परीक्षा ---चांदी सी राख।
पहला खंड मैं बताया पतित को भी पावन बना सकते आत्मा जो पतित हुआ उसे पावन बनाना सत्संग से पतित को पावन बनाया जा सकता है। गटर का पानी फेंक दिया जाता जिसका उपयोग नहीं होता जब इस पर सूर्य का प्रकाश पड़ता तब पानी ऊपर चला जाता सूर्य के प्रताप से वह पानी भी पावन बन जाता ।इसी तरह यह आत्मा गटर के पानी की भांति पतित पड़ा है इसे पावन बनाना है इससे अवगुण हटाकर पावन बना सकते हैं ।संकर से कंकर निकाला जाए कंकर में शुभ --भले बनने की योग्यता है। प्रत्येक आत्मा से अवगुण हटाकर पावन बनाया जा सकता मुनि श्री ने दूसरे खंड में शब्द सो बोध नहीं --बोध सो शोध नहीं। इसकी व्याख्या करते हुए कहा आनंद की अनुभूति का नाम शोध है शब्द का संपूर्ण अर्थ समझना बोध है इस बोध को अनुभूति में आचरण में उतारना शोध है ।मुनि महाराज भी शोध करते हैं आत्मा का शोध ।आपकी आत्मा में भी वह शक्ती है। खंड 3 पुण्य का पालन-- पाप का प्रक्षालन ।मुनि श्री ने बताया पुण्य साबुन की भांति है उसका उपयोग करोगे तो पाप का प्रक्षालन होगा पाप रूपी मैल साफ होगा ।पाप का प्रक्षालन पुण्य का बंद है ।मन वचन काय की निर्मलता ,शुभ कार्यों, लोक कल्याण की भावना से पुण्य उपार्जित हो सकता है। खंड 4 अग्नि की परीक्षा --चांदी सी राख। इसकी व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने कहा कुंभकार ने कुंभ अर्थात घड़ा का रूप दे दिया पर अभी इसमें पानी डालकर नहीं पी सकते।इसे अग्नि की शरण में ले जाकर ही पकाया जावेगा ।चांदी जैसी आत्मा टिमटिमाती आ जाती ।सोने को तपाने पर सोना में किसी तरह की अशुद्धि नहीं रहती ।ध्यान रूपी अग्नि में तपना होगा ।ज्ञान को स्थिर करना ही ध्यान है ।जिसका मन शांत स्थिर हो चुका है तब अपने आप को जान सकोगे। अपने आप मैं आना ही अग्नि से प्रक्षालन है। इस अवसर पर मंगलाचरण श्रीमती मनीषा सिंघई कटंगी ने किया। कार्यक्रम का सफल संचालन जयकुमार जैन जलज हटा ने किया। धर्म सभा में नरेंद्र बजाज पत्रकार ,महेंद्र सोमखेडा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु भक्त गणों की उपस्थिति रही।

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