: प्रथम सावन सोमवार पर सिहोरा के राम जानकी,बुढ़ानसागर के शिवदरबार में हुआ पूजन व अभिषेक
Mon, Jul 14, 2025
रिपोर्टर अनिल जैन
प्रथम सावन सोमवार पर सिहोरा के राम जानकी,बुढ़ानसागर के शिवदरबार में हुआ पूजन व अभिषेक
सिहोरा-सावन मास के प्रथम सोमवार से ही गांधीग्राम के मन्दिरों में धार्मिक अनुषठानों व रुद्राभिषेक किया गया।देवाधिदेव महादेव की पूजा-अर्चना और उनका आशीष प्राप्त करने के लिए गांधीग्राम के प्रसिद्ध राम जानकी मन्दिर में स्थापित अष्टधातु के शिव पार्वती, रामजानकी,पारद शिवलिंग का,बड़े हनुमानजी मन्दिर बुढ़ानसागर मन्दिर में शिवदरबार में भगवान्, शंकर-पार्वती, कार्तिकेय भगवान की,बंजारी माता मंदिर में स्थापित शिवलिंग व बड़ी मढ़िया में भगवान शिव पार्वती की मूर्तियों का पूजन अर्चन व अन्य शिव मंदिरों में रुद्राभिषेक,पार्थिव शिवलिंग निर्माण महिलाओं ने किये। पर्व पर दर्शन-पूजन एवं जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें मन्दिरों में सुबह से ही रही।मन्दिर समितियों की ओर से प्रमुख मंदिरों में श्रद्धालुओं की सुविधा के अलग-अलग व्यवस्था की गई थीं। शिव मंदिरों में महारुद्राभिषेक, शिव सहस्रार्चन, शिवस्रोत के पाठ के लिए भी मंदिरों में पुजारियों द्वारा किया गयाशिवालयों में शिव भजनों पर आधारित रात्रि भजन,अखण्ड रामायण पाठ भी किया जा रहा है। मंदिर में भी जलाभिषेक, महारुद्राभिषेक के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में जुट रहे हैं। राम जानकी मन्दिर के पुजारी पुनीत तिवारी, मुख्य पुजारी,बंजारी माता के पुजारी हरिप्रसाद,हनुमानजी मन्दिर बुढ़ानसागर शुभम त्रिपाठी, प्रकाश मिश्रा, रामधनी चौरसिया, भूपेंद्र चौरसिया के मुताबिक दर्शन के अतिरिक्त परिसर में महारुद्राभिषेक का धार्मिक कार्य जारी है।*सावन में शिव अभिषेक का महत्व-पौराणिक मनीष त्रिपाठी ने बताया कि सावन में शिव अभिषेक का विशेष महत्व है।धर्म ग्रंथों के अनुसार पार्थिव शिवलिंग के पूजन से शिवजी का आशीर्वाद मिलता है। समुद्र मंथन में निकले विष का पान करने के बाद जलन को शांत करने शिवजी का जलाभिषेक किया गया था। यह विधि अपनाई जाती है। इसके साथ ही आंक व बिल्व पत्र चढ़ाने से अनिष्ट ग्रह की दशा भी शांत होती है। दूध में काले तिल से अभिषेक करने से चंद्र संबंधित कष्ट दूर होते हैं।
: तीन दिवसीय धेनु रक्षा व्यास पूर्णिमा महामहोत्सव का ओंकारेश्वर में शुभारंभ
Thu, Jul 10, 2025
तीन दिवसीय धेनु रक्षा व्यास पूर्णिमा महामहोत्सव का ओंकारेश्वर में शुभारंभ
ओंकारेश्वर/10 जुलाई, 31 भगवान ओंकारेश्वर महादेव एवं ममलेश्वर महादेव की पावन सन्निधि एवं मां नर्मदा जी की पावन साक्षी में 31वर्षीय गो पर्यावरण एवं अध्यात्म चेतना पद यात्रा के प्रणेता ग्वाल सन्त पूज्य स्वामी गोपालानंद सरस्वती जी महाराज के मार्गदर्शन में भगवती गोमाता की पूजन से व्यास पूर्णिमा के पूर्व दिवस आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी से तीन दिवसीय धेनु रक्षा व्यास पूर्णिमा महामहोत्सव का गोपाल परिवार संघ के हजारों गो प्रेमियों की उपस्तिथि के साथ शुभारंभ हुआ ।महामहोत्सव के प्रथम दिवस की गो कृपा कथा में पूज्य स्वामी गोपालानंद जी सरस्वती ने बताया कि हम यात्री बन कर इस संसार में आएं है , लेकिन हम रास्ता भटक कर इस संसार में उलझ रहे है । हम लोगों को कन्हैया ने धरती पर गौसेवा के लिए भेजा है। अपने आप जीवन का एक एक क्षण ऐसा कर गुजरने के लिए है जिससे संसार तो सुंदर लगे ही लेकिन उससे भी बढ़िया संसार बनाने वाला लगे। संसार के किसी व्यक्ति से कोई उम्मीद कर रहे है तो वह कभी पूरी नहीं हो सकती। भौतिक आंखों से जो भी हमे नजर आता है उससे दुख के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। यही वास्तव में सुख चाहिए तो हमें गोमाता की शरण में जाना चाहिए। प्रभु से मिलन का साधन सिर्फ गोमाता ही है। गोमाता से देरी ओर दूरी दोनों नहीं होनी चाहिए। आज से ही हमे प्रभु ने जो सामर्थ्य दिया है उसके अनुरूप गौसेवा प्रारंभ कर देनी चाहिए। 24 घंटे में से 4 घंटे यदि हमने पूरी आत्मीयता से गौसेवा में लगा दिया तो वह सब कुछ हमे प्राप्त हो सकता है जो हम चाहते है। सन 2025 से 2030 के मध्य भगवान को प्राप्त करने का बहुत सही समय है। यह सही क्यों है क्यों कि इस समय लाखों गोमाताएं सड़कों पर है। हम चाहे तो कई गौमाताओं की सेवा कर सकते है। यदि कोई भगवान की भक्ति करते हो और कोई पूरे मनोभाव से गौसेवा करते हो तो निश्चित भगवान की कृपा उस पर पहले होगी जो गौसेवा में लगा है। यह स्वर्णिम समय गो सेवा करने का ओर भगवान को प्राप्त करने का।महोत्सव में रात्रि में भजन संध्या एवं श्री जीवन सूत्र पर पूज्य स्वामी जी ने 36 वें दिवस का प्रवचन दिया ।महामहोत्सव के द्वितीय दिवस पर ब्रह्ममुहूर्त से पूज्य गुरुदेव भगवान ब्रह्मलीन स्वामी राम ज्ञान तीर्थ जी महाराज की चरण पादुका के साथ द्वितीय दिवस का शुभारंभ हुआ ।तृतीय दिवस पर प्रातः 08 बजे से सायंकाल 04 बजे तक गोपाल परिवार संघ के माध्यम से युवाओं में कार्य करने वाले ग्वाल सेवा संघ एवं मातृशक्ति के माध्यम से कार्य करने वाले धेनु शक्ति संघ का शिखर सम्मेलन का आयोजन होगा जिसमें देशभर से हजारों युवा एवं मातृशक्ति भाग लेंगे ।
: गुरु अमृत की धार,गुरु पूर्णिमा पर आलेख, एवं कविता
Thu, Jul 10, 2025
गुरु पूर्णिमा पर आलेख, एवं कविता
गुरु अमृत की धार
( गुरु पूर्णिमा पर आलेख - सुशील शर्मा)
आज गुरु पूर्णिमा। यह वह दिन है जब हम उस महान परंपरा को नमन करते हैं, जो हमें अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाती है, जो हमें जीवन के सही मार्ग पर चलना सिखाती है। महर्षि वेद व्यास जी के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाने वाला यह पर्व, वास्तव में गुरु-शिष्य परंपरा के अमरत्व का प्रतीक है। गुरु निर्मित करते हमें, गढ़ते हैं व्यक्तित्व।मात-पिता से तन रहे, गुरु देते अस्तित्व।। यह पंक्ति गुरु की महिमा का सार है। माता-पिता हमें जन्म देते हैं, हमारा शरीर गढ़ते हैं, परंतु गुरु हमें व्यक्तित्व देते हैं, हमें जीवन का उद्देश्य देते हैं, हमें अस्तित्व का बोध कराते हैं। वे हमारे अंतस की यात्रा के लिए हमें तैयार करते हैं, हमें सद आचार की सीख देते हैं और हमारी आत्मा को आत्मबोध के लिए प्रेरित करते हैं।हम सभी जीवन में किसी न किसी रूप में शिक्षक और गुरु से जुड़े होते हैं। अक्सर हम इन दोनों शब्दों को एक ही मान लेते हैं, पर वास्तव में इनमें गहरा अंतर है।आइए इन अंतरों पर एक नज़र डालें: * शिक्षक शिष्य के विकास की जिम्मेदारी लेता है, जबकि गुरु शिष्य को विकास की जिम्मेदारी सौंपता है। शिक्षक हमें राह दिखाता है, पर गुरु हमें इतना सक्षम बनाता है कि हम अपनी राह खुद चुन सकें। * शिक्षक वह देता है जो शिष्य को चाहिए, जबकि गुरु वह लेता है जो शिष्य को नहीं चाहिए। गुरु हमारे अहंकार, हमारी कमियों, हमारी नकारात्मकताओं को दूर करता है, ताकि हम शुद्ध हो सकें। * शिक्षक शिष्य के प्रश्नों के उत्तर देता है, जबकि गुरु शिष्य के उत्तर पर प्रश्न खड़े करता है। गुरु हमें सोचने पर मजबूर करता है, हमारी जिज्ञासा को शांत करने के बजाय उसे और प्रज्वलित करता है। * शिक्षक शिष्य का अहंकार से परिचय कराता है, जबकि गुरु शिष्य के अहंकार को नष्ट करता है। गुरु हमें विनम्रता सिखाता है, हमें स्वयं को जानने की प्रेरणा देता है। * शिक्षक शिष्य से आज्ञापालन और अनुशासन चाहता है, जबकि गुरु शिष्य से विश्वास और विनम्रता चाहता है। गुरु-शिष्य का संबंध आज्ञा का नहीं, बल्कि अटूट विश्वास और श्रद्धा का होता है। * शिक्षक शिष्य को भौतिक यात्रा के लिए तैयार करता है, जबकि गुरु शिष्य को आंतरिक और आध्यात्मिक यात्रा के लिए तैयार करता है। शिक्षक हमें दुनियावी सफलताओं के लिए तैयार करता है, पर गुरु हमें जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने की दिशा में ले जाता है, हमें परमात्मा से जोड़ता है। * शिक्षक शिष्य को सफलता के मार्ग पर चलना सिखाता है, जबकि गुरु शिष्य को स्वतंत्रता के पथ पर चलना सिखाता है। गुरु हमें केवल सफल नहीं, बल्कि स्वतंत्र बनाता है, ताकि हम स्वयं अपने निर्णय ले सकें। * शिक्षक आपको दुनिया से परिचित कराता है, जबकि गुरु आपको स्वयं से परिचित कराता है। यह सबसे महत्वपूर्ण अंतर है। गुरु हमें हमारी आत्मा का दर्शन कराता है। * शिक्षक आपको निर्देशित करता है, जबकि गुरु आपको निर्मित करता है। शिक्षक दिशा देता है, पर गुरु हमें गढ़ता है, हमें एक नया स्वरूप देता है। * शिक्षक अपनी विद्वत्ता से शिष्य को प्रेरित करता है, जबकि गुरु अपने आचरण से शिष्य को प्रेरित करता है। गुरु का जीवन ही उसके शिष्य के लिए सबसे बड़ा उदाहरण होता है। * शिक्षक शिष्य को उपाधि दिलाता है, जबकि गुरु शिष्य को सम्मान दिलाता है। शिक्षक हमें डिग्री दिला सकता है, पर गुरु हमें वास्तविक सम्मान का पात्र बनाता है। * शिक्षक शिष्य के लिए पिता समान है, जबकि गुरु शिष्य के लिए माता समान है। माता का प्रेम निस्वार्थ होता है, और गुरु का प्रेम भी उतना ही पवित्र और निस्वार्थ होता है। * हम जीवन भर शिक्षक के आभारी रहते हैं, जबकि हम जीवन भर गुरु के ऋणी रहते हैं। शिक्षक का आभार व्यक्त किया जा सकता है, पर गुरु का ऋण कभी चुकाया नहीं जा सकता।इन अंतरों को समझकर हम गुरु की महत्ता को और अधिक गहराई से अनुभव कर सकते हैं। वे हमें भौतिकता से दूर कर अध्यात्म की ओर ले जाते हैं, हमारी सांसारिक बाधाओं को हरते हैं और हमें परमात्म से जोड़ते हैं। वे हमारे अहंकार का नाश कर आत्मबोध का संधान करते हैं, हमारे अंतस के कूड़े को साफ कर हमें एक नया विधान देते हैं। जीवन के अनजाने और कठिन पथों पर वे हमारे लिए मील का पत्थर होते हैं, अंधकार में एक दीप की तरह प्रकाशित होते हैं।आज इस पावन अवसर पर हम सभी अपने गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। उनके असीम ज्ञान, उनके मार्गदर्शन और उनके निस्वार्थ प्रेम के बिना हमारा जीवन अधूरा है। आइए, हम सब मिलकर अपने गुरुओं को नमन करें और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लें।गुरु पर दोहे( गुरु पूर्णिमा पर विशेष - सुशील शर्मा) गुरु ज्ञानी गुरु ब्रह्म हैं, देते सच्चा ज्ञान।दूर करें अज्ञान सब,गुरु की कृपा महान ।। गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु सम, गुरु हैं देव महेश।गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु ही हैं परमेश।। गुरु पद शीश नवाइए, गुरु पद सदा प्रणम्य।गुरु की कृपा कटाक्ष से, मिटते पाप अक्षम्य।। अंधकार ये जग सकल, गुरु दीपक की जोत।सही मार्ग दर्शित करें, जब मन विचलित होत।। संकट में यदि शिष्य हो, गुरु करते निर्वाण।मृत्यु निकट आती नहीं,गुरु रक्षित हों प्राण। गुरु वाणी ही ब्रह्म है, जो सुनता धर ध्यान।भवसागर से पार हो, मिलें उसे भगवान।। समझे जो गुरु ज्ञान को, उसका बेड़ा पार।बिना गुरु के ज्ञान के, व्यर्थ लगे संसार।। गुरु पोषक हैं शिष्य के , जो सींचे नित ज्ञान।शिष्य सुमन जैसे खिलें, करके गुरु का ध्यान।। गुरु श्री ब्रह्म समान हैं, गुरु ही मन के मीत।गुरु ही जीवन सार है, गुरु ही सच्ची जीत।। व्यास पूर्णिमा पर्व पर, गुरु को करो प्रणाम।जीवन हो सुखमय सदा, सफल बनें सब काम।।आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक मंगलकामनाएं। सुशील शर्मा