रिश्तों के रेशमी धागे
( रक्षाबंधन पर कहानी - सुशील शर्मा)
शहर के ऊँचे-ऊँचे अपार्टमेंट्स में से एक के पंद्रहवें माले पर रहने वालीं शालिनी जी, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, अपनी बालकनी में बैठीं थीं। हाथ में गर्म कॉफी का मग था और नज़रें सामने की बिल्डिंगों के बीच कहीं खोई थीं। आज राखी का दिन था। उनके फ्लैट में कोई हलचल नहीं थी, न मिठाई की सुगंध, न ही राखी की थाली की खनक। बस एक गहरी, चुभती हुई खामोशी थी।शालिनी जी को अपने गाँव की हवेली याद आ गई, जहाँ उनका बचपन बीता था। उस हवेली में राखी का त्योहार एक उत्सव होता था। उनके बड़े भाई, राघवेंद्र, जो उस समय एक होनहार छात्र थे, शहर में रहकर पढ़ाई करते थे। पर राखी से एक दिन पहले, चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, वह घर लौट आते थे। उनकी वापसी की खबर पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ा देती थी। राखी की सुबह, शालिनी, जो उस समय दस साल की चुलबुली लड़की थीं, सबसे पहले उठकर नहातीं, नए कपड़े पहनतीं और राखी की थाली सजातीं। उनकी थाली में बेसन के लड्डू, चंदन, रोली, चावल और एक चमकदार राखी होती थी। राघवेंद्र भाई साहब, जो अक्सर पढ़ाई में खोए रहते थे, राखी के दिन बच्चों की तरह व्यवहार करते थे। शालिनी उन्हें प्यार से माथे पर तिलक लगाती, उनकी कलाई पर राखी बाँधती और उनके मुँह में मिठाई का टुकड़ा डालती। राघवेंद्र भी मुस्कुराकर एक छोटा सा उपहार उनकी हथेली पर रख देते। यह सिर्फ एक उपहार नहीं था, यह उनकी मेहनत, उनके स्नेह और उनकी जिम्मेदारियों का प्रतीक था। पर समय के साथ सब कुछ बदल गया। राघवेंद्र भाईसाहब ने गाँव से शहर आकर एक बड़ा बिजनेस खड़ा कर लिया। उनकी पत्नी, जिनका नाम सरिता था, एक पढ़ी-लिखी और आधुनिक महिला थीं। उनके दो बच्चे थे, रवि और नेहा, जो विदेश में पढ़ाई कर रहे थे। राघवेंद्र जी भी अब अपनी व्यस्त जिंदगी में इतने खो गए थे कि गाँव और पुराने रिश्तों को भूल गए थे।इस साल भी राखी से दो दिन पहले शालिनी ने राघवेंद्र को फोन किया। "भैया, राखी पर आप आ रहे हैं ना?" उनकी आवाज में एक मासूम उम्मीद थी। राघवेंद्र ने गहरी सांस ली। "शालिनी, तुम जानती हो कि मेरा कितना काम होता है। इस बार तो बच्चों के लिए भी समय निकालना मुश्किल है। तुम एक काम करो, इस बार राखी कूरियर से भेज दो।" शालिनी का दिल टूट गया। वह जानती थीं कि भाई साहब की यह व्यस्तता सिर्फ एक बहाना है, असली वजह तो दूरियाँ और बदलती हुई सोच थी। "भैया, राखी का धागा कूरियर से नहीं भेजा जाता," उनकी आवाज में एक गहरी पीड़ा थी। "वह तो हाथों से बाँधा जाता है, दिल से दिल को जोड़ा जाता है।"राघवेंद्र ने कुछ नहीं कहा और फोन काट दिया। राखी का दिन आ गया। शालिनी ने अपने फ्लैट में एक छोटी सी पूजा की। उनके पास एक पुरानी तस्वीर थी, जिसमें वह और राघवेंद्र भाईसाहब एक-दूसरे के बगल में खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने उस तस्वीर के सामने एक दीया जलाया और आँखों में आँसू लिए उस तस्वीर को देखने लगीं।तभी उनके फ्लैट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने दरवाज़ा खोला, तो सामने रवि और नेहा खड़े थे। रवि के हाथ में एक सुंदर सी राखी की थाली थी और नेहा के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी। "बुआ, हम आ गए," नेहा ने कहा। "पिताजी ने बताया कि आप बहुत दुखी हैं।" शालिनी हैरान रह गईं। "तुम दोनों... तुम कैसे आए?" रवि ने कहा, "बुआ, हम जानते हैं कि पिताजी व्यस्त हैं। पर हम भी तो आपके कोई हैं।" शालिनी ने दोनों को गले लगा लिया। उनकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे।"बुआ, पिताजी ने हमें बताया कि राखी का त्यौहार कितना महत्वपूर्ण होता है," नेहा ने कहा। "हम विदेश में हैं, पर हम अपनी संस्कृति को भूल नहीं सकते।"रवि ने कहा, "बुआ, आप पापा की बहिन हो तो हमारी भी तो बुआ हो। आप हमें राखी बाँधेंगी ना?"शालिनी ने मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिलाया। उन्होंने रवि के माथे पर तिलक लगाया, उसकी कलाई पर राखी बाँधी और नेहा के माथे पर भी एक तिलक लगाया।"यह राखी सिर्फ एक धागा नहीं है," शालिनी ने कहा। "यह हमारे परिवार की संस्कृति है, हमारी विरासत है।"तभी राघवेंद्र का फोन आया। "शालिनी, तुम दोनों से मिलकर खुश हुई ना?"शालिनी की आवाज भर्रा गई। "भैया, आप... आप कैसे?"राघवेंद्र ने कहा, "शालिनी, तुम सही कहती हो। राखी का धागा कूरियर से नहीं भेजा जाता। वह तो दिलों को जोड़ता है।"शालिनी ने कहा, "भैया, आप भी आ जाओ। हम सब आपका इंतजार कर रहे हैं।"राघवेंद्र ने गहरी सांस ली। "शालिनी, मैं आ रहा हूँ। बस कुछ देर में।"शालिनी ने खुशी से रवि और नेहा को गले लगा लिया। वह जानती थीं कि राघवेंद्र का आना सिर्फ एक खुशी की बात नहीं थी, बल्कि यह उनके परिवार का फिर से जुड़ना था।शाम को राघवेंद्र आए। उन्होंने शालिनी को गले लगाया। "शालिनी, मुझे माफ कर दो। मैं अपनी व्यस्तता में तुम्हें भूल गया था।"शालिनी ने कहा, "भैया, आप आ गए, यही मेरे लिए सबसे बड़ी राखी है।"राखी का त्यौहार खत्म हो गया, पर उसकी यादें सबके दिलों में हमेशा के लिए बस गईं। राघवेंद्र ने अपने बच्चों के साथ मिलकर राखी का महत्व समझा। उन्हें महसूस हुआ कि असली दौलत पैसा नहीं, बल्कि प्यार और रिश्ते हैं।शालिनी ने भी अपने भाई और उसके बच्चों के साथ मिलकर राखी का असली मतलब समझा। उसने महसूस किया कि राखी सिर्फ एक धागा नहीं, बल्कि एक अटूट बंधन है, जो हर भाई-बहन के दिल में हमेशा जिंदा रहता है।यह कहानी हमें सिखाती है कि आधुनिकता और व्यस्तता के बावजूद, हमें अपनी संस्कृति और अपने रिश्तों को नहीं भूलना चाहिए। राखी का त्यौहार एक ऐसा ही अवसर है, जो हमें हमारे परिवार और हमारी जड़ों से जोड़े रखता है। यह हमें सिखाता है कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ खून का नहीं, बल्कि प्यार और विश्वास का होता है।
बुआ की राखी
(रक्षाबंधन के रिश्तों को जोड़ती कहानी - सुशील शर्मा
) शहर के शोर-शराबे से दूर, एक शांत गली में बसा था रामनाथ का पुराना घर। घर क्या था, रिश्तों की एक जीती-जागती हवेली थी, जिसकी नींव में स्नेह और दीवारों पर यादों का प्लास्टर चढ़ा था। रामनाथ, सेवानिवृत्त हेडमास्टर, अपनी पत्नी सुमित्रा और दो बेटों, विवेक और अमित, के साथ रहते थे। उनके जीवन का केंद्र उनकी एकलौती बहन, रमा, थी। रमा, जो रामनाथ से दस साल छोटी थी, उनके लिए सिर्फ बहन नहीं, बेटी भी थी।रमा का विवाह एक छोटे से गाँव में हुआ था। गाँव और शहर की दूरियाँ, व्यस्त जीवनशैली और आर्थिक मजबूरियाँ, ये सब धीरे-धीरे रिश्तों की डोर को कमजोर कर रहे थे। एक समय था जब राखी के दिन रमा पूरे परिवार के लिए महीनों पहले से तैयारी करती थी। उसके हाथों की बनी मिठाइयों की सुगंध पूरे घर में फैल जाती थी और उसके लाड़-दुलार से भरा स्पर्श हर भाई को एक अलग ही खुशी देता था। लेकिन, समय के साथ सब कुछ बदल गया। इस साल भी राखी का दिन नजदीक था। सुमित्रा, रसोई में काम करते हुए रामनाथ से बोलीं, "जी, इस बार रमा आएगी न? विवेक और अमित तो अब बड़े हो गए हैं, पर रमा के बिना राखी का त्यौहार अधूरा लगता है।"रामनाथ की आँखों में एक उदासी तैर गई। "कहना तो मुश्किल है, सुमित्रा। अब गाँव में भी खेती का काम बढ़ गया है, उसके पति की तबीयत भी ठीक नहीं रहती। क्या पता आ पाए या नहीं।"अमित, जो अपने कमरे से बाहर निकला, बोला, "पिताजी, अब तो फोन का जमाना है। आप उन्हें फोन पर ही राखी बंधवा लीजिए। अब इतना भी क्या इंतजार करना।"विवेक, जो शांत स्वभाव का था, बोला, "अमित, बुआ की राखी सिर्फ एक धागा नहीं है। वह उनके प्रेम और त्याग का प्रतीक है। तुम नहीं समझोगे।"रामनाथ ने उदासी से सिर हिलाया। "विवेक सही कह रहा है। एक धागा ही तो है, पर उस धागे में पूरे साल का स्नेह, उम्मीद और इंतजार बंधा होता है।" उसी शाम रामनाथ ने रमा को फोन किया। "कैसी हो, रमा?" उनकी आवाज में एक अनकही व्यथा थी।"मैं ठीक हूँ, भैया। आप सब कैसे हैं?" रमा की आवाज में भी थकान और चिंता साफ झलक रही थी।"हम सब ठीक हैं। राखी आ रही है..." रामनाथ ने अटकते हुए कहा।"हाँ, भैया। मुझे याद है। पर इस बार..." रमा की आवाज भर्रा गई। "इस बार आना मुश्किल है। मेरे पति की तबीयत ठीक नहीं रहती और खेती का काम भी सर पर है। मैं आपकी भाभी और बच्चों से माफी चाहती हूँ।"रामनाथ का दिल टूट गया। वह जानते थे कि रमा के लिए यह फैसला कितना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा, "रमा, तुम चिंता मत करो। तुम वहाँ खुश रहो, यही हमारे लिए सबसे बड़ी राखी है।"परंतु, रामनाथ जानते थे कि यह झूठ था। उनकी आँखों में आँसू थे, जो उन्होंने रमा से छुपाए। रात भर उन्हें नींद नहीं आई। उन्हें अपनी बचपन की रमा याद आई, जो उनके पीछे-पीछे घूमती थी और उनकी हर बात मानती थी। उन्हें याद आया जब रमा की शादी हुई थी और वह रोते-रोते उनसे लिपट गई थी। राखी का दिन आ गया। घर में थोड़ी चहल-पहल तो थी, पर एक उदासी की चादर सब पर बिछी थी। सुमित्रा ने विवेक और अमित को राखी बाँधी। सबने आपस में कुछ मीठा खाया, पर दिल में एक खालीपन था।अचानक, घर के दरवाजे पर एक रिक्शा रुका। एक दुबली-पतली, साड़ी पहने महिला रिक्शा से उतरी। उसके चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी, पर आँखों में एक चमक थी। यह रमा थी।विवेक और अमित दोनों दौड़कर बाहर आए। "बुआ!" दोनों ने एक साथ पुकारा।रमा ने दोनों को गले लगाया। उसकी आँखें नम थीं। "तुम दोनों कितने बड़े हो गए हो।"रामनाथ और सुमित्रा भी बाहर आए। रामनाथ ने देखा, रमा के हाथ में एक छोटी सी पोटली थी।"रमा, तुम... तुम कैसे आ गई?" रामनाथ की आवाज में आश्चर्य और प्रेम दोनों थे।"भैया, मैं न आती तो क्या करती? राखी का दिन और मैं अपने भाइयों से दूर रहूँ, ऐसा कैसे हो सकता है?" रमा की आवाज में एक दृढ़ता थी। "मैंने बस में सीट नहीं मिली तो खड़ी होकर आई हूँ। पर मुझे कोई थकान नहीं है।" रमा अंदर आई। उसने सुमित्रा के पैरों को छुआ। "भाभी, मुझे माफ कर देना। आने में देर हो गई।"सुमित्रा की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने रमा को गले लगाया। "अरे पगली, तू आ गई, यही बहुत है। तेरे आने से घर में रौनक आ गई।"रमा ने पोटली खोली। उसमें दो राखियाँ थीं, जो उसने खुद अपने हाथों से बनाई थीं। एक रामनाथ के लिए, एक विवेक और अमित के लिए। उसने राखी की थाली सजाई, जिसमें चंदन, रोली, चावल और एक छोटी सी मिठाई का टुकड़ा था।सबसे पहले उसने रामनाथ को राखी बाँधी। "भैया," उसकी आवाज में भावनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। "यह सिर्फ एक धागा नहीं है। यह मेरे बचपन की यादें हैं, आपका मेरे लिए लाड़-दुलार है, आपका मुझ पर विश्वास है। यह एक बहन का प्रेम है, जो कभी नहीं मर सकता।" रामनाथ की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने रमा का माथा चूमा। "तू आ गई, मेरी बहन। तूने मेरा मान रख लिया।"फिर रमा ने विवेक और अमित को राखी बाँधी। "विवेक, अमित," उसने कहा, "तुम दोनों मेरे बच्चे हो। तुम दोनों हमेशा खुश रहो और एक-दूसरे का ख्याल रखना।"विवेक ने कहा, "बुआ, तुम हमारी माँ की तरह हो। तुम आज आई हो, अब हमें हर साल आना होगा। हम तुम्हारा इंतजार करेंगे।" अमित, जो शुरुआत में थोड़ा बेपरवाह था, अब उसकी आँखों में भी नमी थी। उसने बुआ के पैर छुए। "बुआ, मुझे माफ कर देना। मैंने आज तक राखी के महत्व को नहीं समझा था। पर आज समझ गया हूँ।" रमा मुस्कुराई। "अब तुम दोनों भी बड़े हो गए हो। अब तुम्हारी बारी है, इस राखी की परंपरा को आगे बढ़ाने की।" शाम को जब रमा जाने लगी, तो पूरे घर में एक अजीब सी शांति छा गई। रामनाथ ने उसे रिक्शे तक छोड़ा।रमा ने मुड़कर कहा, "भैया, इस राखी ने मुझे और आपसे ही नहीं, पूरे परिवार को जोड़ दिया है। यह सिर्फ एक धागा नहीं है, यह एक वादा है, एक विश्वास है कि हम चाहे कितने भी दूर हों, हमारा रिश्ता कभी नहीं टूटेगा।"रामनाथ ने हाँ में सिर हिलाया। रमा रिक्शे में बैठ गई। जैसे-जैसे रिक्शा आगे बढ़ा, रामनाथ को लगा कि उनकी आत्मा का एक हिस्सा भी उसके साथ जा रहा है। पर उनके दिल में एक सुकून था। एक सुकून जो वर्षों के इंतजार और स्नेह से मिला था। वह जानते थे कि बुआ की राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि अनगिनत भावनाओं, त्याग और अटूट प्रेम का प्रतीक है, जो हमेशा उनके और उनके परिवार के साथ रहेगा। सुशील शर्मा